जनरल से जननेता तक

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और फिर कोटद्वार की सियासी साजिश में घिर गए थे खंडूरी
खण्डूरी को हरवाने वाले कभी नहीं हो पाये बेनकाब
देहरादून। उत्तराखण्ड के अन्दर जब एक दशक पूर्व भाजपा की सरकार बनी थी तो सेना में अपनी धमक दिखाने वाले भुवन चंद खण्डूरी को जब मुख्यमंत्री की कमान सौंपी गई थी तो उन्होंने सियासत में भी सेना की तर्ज पर अपने आपको ढाल कर रखा और वह समय के इतने पाबंद थे कि अधिकांश सियासतदारों को उनका यह रूप नहीं भाता था। खण्डूरी ने अपने शासनकाल में कडक अंदाज में सियासत चलाई और उन्हें भ्रष्टाचार से बेहद नफरत हुआ करती थी और वह इस भ्रष्टाचार को राज्य के लिए नासूर मानते थे और भ्रष्टाचारी चेहरों से वह हमेशा दूर रहा करते थे लेकिन उनका यह अंदाज उन भ्रष्ट नेताओं और अफसरों को कभी रास नहीं आता था जो हमेशा भ्रष्टाचार की मलाई चाटने में ही विश्वास रखते थे। सियासत में उन्हें एक आदर्श माना जाता था और गढवाल के लोग उन्हें बेहद पसंद करते थे लेकिन सियासत के सियारों ने कोटद्वार में खण्डूरी को चुनाव हरवाने के लिए जो चाल चली थी उस चाल में वह सफल हुये थे और उसी के चलते खण्डूरी के सियासी औरे पर ग्रहण लग गया था और उसके बाद वह सियासत की इन चालबाजियों से बेहद खफा नजर आते थे क्योंकि उन्होंने उत्तराखण्ड को भ्रष्टाचारमुक्त बनाने का जो सपना देखा था उनका वह सपना कभी पूरा नहीं हो पाया था?
उत्तराखंड की राजनीति में ईमानदारी, सख्त प्रशासनिक छवि और अनुशासन का पर्याय रहे भुवन चंद्र खंडूरी का राजनीतिक सफर जितना गौरवशाली रहा, उतना ही अंत में विवादों और सियासी उठापटक से घिरा नजर आया। सेना की पृष्ठभूमि से निकलकर राजनीति में आए खंडूरी ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि जिस प्रदेश की जनता के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित किया, उसी प्रदेश में उनके अपने ही उन्हें राजनीतिक तौर पर घेरने की रणनीति बना लेंगे। भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट जनरल के पद तक पहुंचने वाले खंडूरी जब राजनीति में आए, तो उन्होंने साफ-सुथरी छवि और सख्त निर्णयों के दम पर उत्तराखंड में अपनी अलग पहचान बनाई। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई, जिससे उनकी छवि एक कड़क प्रशासक की बनी।
लेकिन साल 2012 के विधानसभा चुनाव में कहानी अचानक बदल गई। खंडूरी के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही पार्टी को प्रदेश में बहुमत के करीब सफलता मिली, लेकिन सबसे बड़ा झटका खुद खंडूरी को लगाकृवे अपनी ही सीट कोटद्वार विधानसभा से चुनाव हार गए। राजनीतिक गलियारों में उस वक्त यह चर्चा तेज रही कि यह हार केवल विपक्ष की रणनीति का नतीजा नहीं थी, बल्कि अंदरखाने की खींचतान और गुटबाजी ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई। कहा गया कि पार्टी के भीतर ही कुछ नेताओं को खंडूरी की सख्त कार्यशैली और ईमानदार छवि रास नहीं आ रही थी, जिसके चलते चुनावी समीकरण उनके खिलाफ मोड़ दिए गए। कोटद्वार की हार सिर्फ एक सीट की हार नहीं थी, बल्कि यह उत्तराखंड की राजनीति में एक बड़े और ईमानदार चेहरे के साथ हुई सियासी विडंबना भी थी। जिस नेता ने प्रदेश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने का सपना देखा, उसी को राजनीतिक चालों के बीच हार का सामना करना पड़ा। हालांकि, इस हार के बावजूद खंडूरी की छवि और कद में कोई कमी नहीं आई। आज भी उत्तराखंड की राजनीति में उनका नाम ईमानदारी, अनुशासन और जनसेवा के प्रतीक के रूप में लिया जाता है।

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