उत्तराखंड में तीसरी बार विजय रथ हांक रही भाजपा

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फिलहाल कलह और मनोवैज्ञानिक दबाव में है कांग्रेस
देहरादून। वेस्ट बंगाल और असम के विधानसभा चुनाव परिणामों से उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी की बाछें खिल उठी हैं। बंगाल की अप्रत्याशित जीत और असम में लगातार तीसरी बार सत्ता वापसी ने भाजपाइयों को राज्य में हैट्रिक लगाने के लिए नई ऊर्जा के साथ उकसा दिया है। पुष्कर सिंह धामी को एक बार फिर मुख्यमंत्री का चेहरा पेश करते हुए बीजेपी अपना विजय रथ हांकना शुरू कर चुकी है। देखा जा रहा है कि कांग्रेस मनोवैज्ञानिक दबाव में है। राजनीति के लालबुझकड़ मानते हैं कि उत्तराखंड में इस बार फिर कमल खिले बिना नहीं रहेगा। हालांकि पक्के तौर पर अभी से कुछ नहीं कहा जा सकता। यह तो वक्त बताएगा कि कौन कितने पानी में है।
यह बताने की जरूरत नहीं कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की बंपर जीत और असम में तीसरी बार कमल खिलने से सबसे बड़ा और तात्कालिक असर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में दिखाई दे रहा है। दरअसल यहां पर 2027 में विधानसभा चुनाव होने वाला है। इसमें दो राय नहीं कि राष्ट्रव्यापी लहरें राज्य के चुनावी व्यवहार को गहराई तक प्रभावित करती हैं। याद कीजिए, 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में आई लहर ने 2017 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के साथ उत्तराखंड के माथे पर विजय तिलक लगा दिया। इसी के मनिंद 2019 के लोकसभा चुनावों की गूंज भी उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में लंबे समय तक सुनाई देती रही। ऐसे में पश्चिम बंगाल में मिली जीत एक बड़े नैरेटिव का निर्माण करती है। और वह यह कि बीजेपी जीतने वाली पार्टी है। यही नैरेटिव उत्तराखंड में भी चुनावी मनोविज्ञान को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इस संदर्भ में अगर हम बात मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की करें तो पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने खुद को कुशल प्रशासनिक मुखिया के रूप में स्थापित किया है। वैचारिक और राजनीतिक चेहरे के तौर पर उनकी स्थापना कुछ इस तरह है कि जैसे कभी गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी की थी। धामी उत्तराखंड के इकलौते मुख्यमंत्री हैं जिनकी राष्ट्रीय प्रोफाइल अन्य किसी लीडर के मुकाबले बहुत ज्यादा मजबूत है। समान नागरिक संहिता लागू करने से लेकर उन्होंने राज्य में विकास के कई ऐसे काम किए हैं, जिनके सुखद परिणाम आने शुरू हो गए हैं। यह भी बता दें कि पूरा चुनावी अभियान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह के इर्द-गिर्द केंद्रित होने की संभावना है। यह भी एक तथ्य है कि सन 27 के चुनाव में भाजपा के करीब एक दर्जन से ज्यादा विधायकों के टिकट कट सकते हैं। इसमें एकाध मंत्री भी हो सकते हैं।
सियासी पंडितों का मानना है कि असम में हिमंता की तरह, जहां चुनाव एक हद तक ‘चेहरे’ पर लड़ा गया, उसी तरह उत्तराखंड में भी धामी बनाम विपक्ष का सीधा मुकाबला दिखाई देगा। उल्लेखनीय है कि बंदूकों से प्रेत नहीं मारे जाते। चुनाव भी केवल आंकड़ों का खेल नहीं होता। कई बार वह धारणा और विश्वास का भी खेल होता है। पिछले कुछ वर्षों में धामी के नेतृत्व में भाजपा कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बढ़ा हुआ देखा जाता है। धामी ने मतदाताओं के बीच यह धारणा बना दी है कि भाजपा जीतने वाली पार्टी है। यह कोई मामूली बात नहीं है। अब कुछ भी हो सन 27 के चुनाव के लिए भाजपा के लड़ाके बख्तरबंद होने लगे हैं। कांग्रेस और उसके मनसबदार भी अपनी तलवारों को म्यान से बाहर निकाल कर सियासी जंग के लिए जंग छुड़ाने लगे हैं। अब मैदान में छक्का कौन छुड़ाएगा यह तो बाद में ही पता चलेगा।

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