सरकार को किया ‘गुमराह’

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अधिकारियों ने बांट दिए आसन कंजर्वेशन में स्टोन क्रेशर के लाइसेंस -मोर्चा
आरोपः भारत सरकार-उच्च न्यायालय के निर्देशों को किया तार-तार
आसान कंजर्वेशन की 10 किलोमीटर की परिधि में है बिल्कुल मनाही
विकासनगर(संवाददाता)। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री राज्य को आदर्श राज्य बनाने की दिशा में आगे बढ रहे हैं और वह राज्य के अन्दर घोटाले, भ्रष्टाचार, माफियागिरी पर नकेल लगाने के लिए आर-पार की जंग लड रहे हैं। मुख्यमंत्री के आदेश के बावजूद भी कुछ जिलों में अवैध खनन का काला कारोबार बंद नहीं हो पा रहा है और उसी के चलते मुख्यमंत्री के विजन पर सिस्टम के कुछ अफसर ग्रहण लगाते हुए नजर आ रहे हैं? अभी अवैध खनन के मामले को लेकर सिस्टम पर सवालिया निशान लग ही रहे थे कि जनसंघर्ष मोर्चा ने खुला आरोप लगा दिया कि सरकार को अधिकारियों ने गुमराह करते हुए आसन कंजर्वेशन में स्टोन क्रेशर के लाइसेंस बांटकर भारत सरकार व उच्च न्यायालय के निर्देशों को तार-तार कर दिया है। मोर्चा का साफ कहना है कि आसन कंजर्वेशन की दस किलोमीटर की परिधि में क्रेशर पर बिल्कुल मनाही है लेकिन सरकार को गुमराह करते हुए अधिकारियों ने स्टोर क्रेशर के लाइसेंस बांटकर सरकार को गुमराह करने का काम किया है। मोर्चा ने राजभवन से मांग की है कि इस गंभीर मामले का संज्ञान लेकर कार्यवाही करें अगर ऐसा न हुआ तो मोर्चा न्यायालय में दस्तक देगा।
जन संघर्ष मोर्चा अध्यक्ष एवं जीएमवीएन के पूर्व उपाध्यक्ष रघुनाथ सिंह नेगी ने पत्रकारों से वार्ता करते हुए कहा कि अधिकारियों की मिलीभगत के चलते सरकार को गुमराह कर आसन कंजर्वेशन जैसे अति संवेदनशील क्षेत्र में किलो किलोमीटर की परिधि के भीतर ही स्टोन क्रेशर लाइसेंस जारी कर क्रशर स्थापित करवा दिए। नेगी ने कहा कि भारत सरकार के वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 2(24क) के तहत आसन कंजर्वेशन रिजर्व को बहुत ही संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया है तथा मा. उच्च न्यायालय द्वारा जनहित याचिका संख्या 66/2014 5 मई 2014 में उक्त संवेदनशील क्षेत्र में 10 किलोमीटर की परिधि के भीतर बिना नेशनल वाइल्ड लाइफ बोर्ड की अनुमति के किसी भी प्रकार की खनन से संबंधित गतिविधियों पर पूर्णतया लगा चुका है यानी रोक लगाई गई है, लेकिन बावजूद इसके नीचे से ऊपर तक अधिकारियों ने भारी भरकम रकम हासिल कर सकारात्मक रिपोर्ट लगा दी, जिसके तहत सरकार ने छह-सात स्टोन क्रेशर आवंटित कर दिए। उक्त के अतिरिक्त यह भी प्रावधानित है कि उक्त क्षेत्र में दूनघाटी (वर्तमान में एमडीडीए) से भी अनुमति जरूरी है, लेकिन कोई पूछने वाला नहीं। आलम यह है कि अधिकारी आमजन की पत्रावलियां यानी उनके आवेदनों पर कार्यवाही करना तो दूर, उसमें आपत्तियां लगाकर परेशान करते हैं,लेकिन माफियाओं के लिए इनके दिल में बड़ा रहम है। मोर्चा राजभवन से मांग करता है कि उक्त गंभीर मामले में संज्ञान लेकर कार्रवाई करें। अगर कार्रवाई नहीं होती है तो मोर्चा मा. न्यायालय में दस्तक देगा। पत्रकार वार्ता में- मोर्चा सचिव दिलबाग सिंह व प्रवीण शर्मा पिन्नी मौजूद थे।

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