उत्तराखण्ड में उठने लगी आवाज कहां हो हमारी सरकार!

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उद्घाटन, हरी झण्डी देने का समय नहीं हुजूर?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड के अधिकांश जनपदों में कोरोना मरीज के परिवार अपनों की सांसे चलती रहें इसके लिए अपना सबकुछ लुटाने के लिए भी आगे आ रखे हैं लेकिन उनके मरीजों को जीवनदान देने के लिए सरकार नाम की कोई चीज उन्हें नजर नहीं आ रही? अब तो राज्य के अन्दर चारो ओर यह आवाज उठने लगी है कि हमारी प्रचंड बहुमत की सरकार आखिर कहां गायब हो गई जिसे अपने राज्यवासियों की कोरोना में हो रही मौतों के बाद उनके परिवारों की रोने का मातम सुनाई ही नहीं पड रहा? गजब बात है एक ओर तो देहरादून हरिद्वार में कोरोना मरीजों की मौत का आंकडा हर राज्यवासियों के मन में चौबीस घंटे डर बनाये हुये है वहीं सरकार के हाकिम सरकारी अस्पताल में कोरोना बैड लगाये जाने का उद्घाटन व एम्बुलेंस को रवाना करने के लिए हरी झण्डी दिखाकर फोटो सेशन कराकर ही ऐसा मान रहे हैं मानो उन्होंने कोरोना से लडने के लिए कितनी बडी जंग की शुरूआत कर दी हो? उत्तराखण्ड में विकराल होते कोरोना काल में जिस तरह से सरकार घृतराष्ट्र बन चुकी है उससे राज्यवासियों के मन मे सरकार को लेकर दर्द की जो ज्वाला जलने लगी है उसकी चिंगारी प्रचंड बहुमत की सरकार को 2022 में देखने को मिल सकती है?
आज जब चारो ओर कोरोना से त्राहिमाम-त्राहिमाम मंचा हुआ है।तो हर कोई यह पूछ रहा है? कहां हे जो थोड़े-थोड़े दिनों बाद आम आदमी को अपना भाग्यविधाता, मायबाप,सर्वेसर्वा और न जाने क्या नही बना देने पर उनके दरवाजे पर अपना माथा रगड़ते नही थकते। ओहो!अभी चुनाव थोड़े हैं,जो अनगिनत रंगे सियार नजर आएंगे।फिर भी ऐसे भयावह समय में चुने हुए सरकारी सिस्टम भी केवल खानापूर्ति या अधिकतर अंश प्रचार और प्रसार में ही दिखाई दे तो किसको कहें।आज इस महामारी में सरकारी तंत्र तो पूरी तरह से लाचार और असहाय नजर आ ही रहा है,और मुखिया भी लाचार नजर आ रहे हैं,अस्पतालों की ओर भागती पब्लिक,रोती बिलखती,बदहवास जनता जिन डाक्टरों को भगवान का दर्जा देते हैं,वह भी खाली तरकश लिए हुए योद्धा की तरह पर्ची,टेस्ट लिखने तक सीमित।क्योंकि न तो अस्पतालों में टेस्ट के साधन है, न ही दवाइयां,ऑक्सीजन और बेड ही पर्याप्त मात्रा में है,क्योंकि कोई धरातल पर ध्यान देने वाले हैं नही या यूं कहें ध्यान देना ही नही चाहते। लाखों के समान खरीद कर उनको उद्घाटन की राह में या आपसी लापरवाही से गौदमों में धूल फांकने के लिए छोड़ दिया है।बाजार से जरूरी उपकरण और दवाइयां गायब है,और अगर मिल भी रही है तो कालाबाजारियों के अहसानों से वह भी 10 से 50 गुना दामों पर क्या सारा सिस्टम अभी भी कुंभकर्णी नींद से नही जाग रहा है,जब रोज हजारों लोग धीरे -धीरे मौत के मुंह में जा रहे हैं। कहां है,छापामार विभाग,गुप्तचर विभाग और जब मेडिकल ऑक्सीजन जैसी चीज भी हजारों पार जाएं। तो किसको कहा जाए।क्या जिस सरकारी मशीनरी का इन सब अव्यवस्थाओं पर नियंत्रण होना चाहिए था।वह क्या केवल जनता के टैक्स की कमाई से केवल तनख्वाह पाने तक ही सीमित है।
जब तक सांस है,तब तक तो संघर्ष है ही,मरने के बाद भी श्मशान पहुंचना भी मंहगा हो गया है,और अंतिम संस्कारध्तिरस्कार की भी लंबी कतार है। किसका शव ,किसके नाम कोई हिसाब रखने वाला है क्या?
सरकार अपनी मशीनरी को थोड़ा सर्विस कर एक्शन मुड़ में लाइए।
ऑक्सीजन के सिलेंडर तक भी बाजार में जिन छोटे-बड़े वर्कशॉप वालों द्वारा मदद की जा रही थी, वह भी स्थानीय पुलिस द्वारा उनसे ले लिए गए क्या वह अब आम आदमी के काम आ पाएंगे,या वह भी इस महंगी और वीआईपी व्यवस्था की भेंट चढ़ जायेंगे।
सरकार आम आदमी तो भगवान के भरोसे ही चलता है,आपका सिस्टम उसे और भगवान से मिलाने पर आमादा है। हर तरफ भगदड़ मची है,साथ ही इंसानियत भी कुछ ही समाज सेवको और समाज सेवी संस्थाओं के कारण बची हुई है।
ऐसे मै हर व्यक्ति की आस अपनी सरकार और उसके मुखिया पर आकर टिकी है।कृपया अभी भी अपने माननीयों और सहयोगियों का उचित मार्गदर्शन कर जनता को इस महामारी से बचाएं।

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