फैसले से पहले मीडिया में होता रहा ट्रायल

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प्राधिकरण की कार्यवाही पर पहले ही आईपीएस ने जताई थी आशंका
दोषी पांच लेकिन केवल एक आईपीएस पर कार्यवाही की संस्तुति
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में राजधानी के तत्कालीन पुलिस कप्तान के खिलाफ न्यायिक प्राधिकरण में एक सुनवाई चल रही थी और इस सुनवाई के दौरान ही आईपीएस ने आशंका व्यक्त कर दी थी कि समस्त प्रक्रिया आंतरिम एवं विभागीय राजनीति का परिणाम है क्योंकि प्राधिकरण के एक सदस्य जो प्रकरण की सुनवाई कर रहे थे उनके स्वयं के अनुज भाई पीडिता के वकील थे। हालांकि आईपीएस की आपत्ति के बाद उन्होंने अपने आपको कार्यवाही से पृथक किया था। हैरानी वाली बात यह है कि न्यायिक प्राधिकरण का फैसला आने से पहले ही मीडिया में जिस तरह से इस मामले को लेकर ट्रायल चल रहा था उसने प्राधिकरण की कार्यशैली पर एक बडा प्रश्नचिन्ह लगाकर रख दिया है? गजब की बात तो यह है कि प्राधिकरण ने इस मामले में पांच अधिकारियों को दोषी पाया लेकिन एक आईपीएस के विरूद्व ही कार्यवाही की संस्तुति की गई जो प्राधिकरण पर उंगली उठा रहा है? आईपीएस के प्रतिनिधि ने भी दो टूक कहा कि उन्हें भी मीडिया से जानकारी मिली है, आश्चर्यजनक बात यह है कि किसी भी पीडित पक्ष को प्राधिकरण से न तो आदेश की सत्यप्रति प्राप्त हुई है न ही इसकी कोई औपचारिक सूचना है।
उल्लेखनीय है कि चंद दिन पूर्व मीडिया में खबर प्रसारित हुई कि चार साल पहले क्लेमंटाउन सुभाष रोड स्थित एक कोठी पर जेसीबी चलाकर भूमाफियाओं द्वारा कब्जा करने के प्रयास मामले में राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने एक बडा फैसला दिया है। इस बहुचर्चित मामले में प्राधिकरण ने तत्कालीन एसएसपी जन्मेयजय खण्डूरी, तत्कालीन थाना प्रभारी नरेन्द्र गहलावत के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की संस्तुति कर रिपोर्ट शासन को भेजी है। तत्कालीन एसएसपी जन्मेयजय खण्डूरी के प्रतिनिधि वरिष्ठ अधिवक्ता योगेश सेठी ने बताया कि हमे आदेश की जानकारी मिली है वह मीडिया में प्रसारित समाचारों से मिली है। उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि किसी भी पीडित पक्ष को प्राधिकरण से न ही सत्यप्रति प्राप्त हुई है और न ही इसकी कोई औपचारिक सूचना है। उन्होंने कहा कि निर्णय के सभी पहलुओं का अध्ययन किया जा रहा है। इसमें अग्रिम कार्यवाही की जायेगी। प्रथम दृष्टता आदेश विधिक एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के प्रतिकूल है उन्होंने कहा कि न्यायिक प्राधिकरण के किसी भी आदेश को लेकर स्वयं साक्षात्कार बयान देना न्याययिक प्रक्रिया एवं परम्परा दोनो के विरूद्व है।
विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार तत्कालीन पुलिस कप्तान जन्मेयजय खण्डूरी द्वारा प्रथम अवसर पर ही यह आशंका व्यक्त कर दी गई थी कि समस्त प्रक्रिया आंतरिम एवं विभागीय राजनीति का परिणाम है क्योंकि प्राधिकरण के एक सदस्य जो प्रकरण की सुनवाई कर रहे थे उनके स्वंय उनके अनुज भाई पीडिता के वकील थे हालांकि आपत्ति के बाद उन्होंने कार्यवाही से स्वयं को अलग किया था। आईपीएस के प्रतिनिधि योगेश सेठी का कहना है कि निर्णय की प्रति प्राप्त होने के बाद आगे की कार्यवाही अवश्य की जायेगी क्योंकि सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं। सबसे हैरान करने वाली बात है कि इस मामले में पांच अधिकारियों को दोषी होने की बात कही जा रही है लेकिन कार्यवाही की संस्तुति अगर एक आईपीएस के विरूद्व की गई है तो यह कई सवालों को जन्म जरूर देगा? सवाल यह भी है कि इस मामले में आदेश पारित होने के काफी पहले से इसका मीडिया ट्रायल आखिर कौन और कैसे कर रहा था यह भी कई आशंकाओं को जन्म दे रहा है। उत्तराखण्ड के अन्दर एक बार फिर यह बहस छेड दी है कि जिस तरह से राज्य के कुछ आईपीएस अधिकारियों के बीच आपसी टकरार होने की चर्चाएं लम्बे समय से उठती आ रही हैं कहीं यह सारी कार्यवाही उसी तकरार का कोई हिस्सा तो नहीं है?
आईपीएस जन्मेयजय खण्डूरी के प्रतिनिधि योगेश सेठी का कहना है कि वह प्राधिकरण का आदेश मिलने के बाद इसका पूरा अध्ययन करेंगे और न्यायिक प्राधिकरण का यह फैसला कई शंकाओं को जन्म दे रहा है इसलिए वह इस आदेश को पढने के बाद अपने अगले कदम को आगे बढ़ायेंगे।

राज्य का एक और आईपीएस निशाने पर?
देहरादून। राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण के हालिये फैसले ने प्रदेश में चल रहे आईपीएस बनाम पीपीएस विवाद को हवा दे दी है? पांच साल पुराने प्रकरण में प्राधिकरण ने जहां अपने निर्णय में सभी अधिकारियों को कार्य में अपचार का दोषी माना परंतु कार्यवाही केवल एक आईपीएस के विरूद्व की जाने की सिफारिश की गई व जो समस्त प्रकरण पर गहरा प्रश्नचिन्ह लगा रहा है?
गौरतलब है कि इससे पहले भी प्रदेश में कुछ आईपीएस अधिकारियों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है? शिकायतकर्ता द्वारा अपनी शिकायत में आरोप लगाया गया था कि स्थानीय थाना प्रभारी की मिलीभगत के चलते उसका भवन कुछ व्यक्ति द्वारा ध्वस्त कर दिया गया तथा पुलिस द्वारा इस पर प्रभावी कार्यवाही नहीं की गई। तत्कालीन पुलिस कप्तान जन्मेयजय खण्डूरी द्वारा अपने उत्तर में बारह जनवरी 2022 को प्रेषित रिपोर्ट तेरह जनवरी 2022 को प्राप्त होने व उसी दिन सम्बन्धित क्षेत्राधिकारी को कार्यवाही निर्देश जारी करने का कथन किया था व जिसके क्रम में सत्रह जनवरी को अभियुक्तगण के विरूद्व एफआईआर दर्ज हो गई थी। इसके अतिरिक्त तत्कालीन पुलिस कप्तान द्वारा न केवल तत्कालीन थाना प्रभारी को निलम्बित कर दिया गया था अपितु उसके स्थानान्तरण हेतु चुनाव आयोग की अनुमति हेतु आवेदन भी दिया गया था क्योंकि उस समय राज्य में चुनाव आचार संहित लागू थी। बता दें कि जन्मेयजय खण्डूरी वर्तमान में आईजी पद पर केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर हैं इस प्रकरण में उनका प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता योगेश सेठी कर रहे हैं जिन्होंने सम्पर्क करने पर बताया कि अभी आदेश की प्रति प्राप्त नहीं हुई है व केवल मीडिया में प्रसारित खबरों से उक्त आदेश संज्ञान में आया है और मीडिया में ही उक्त आदेश प्रसारित होने के चलते पडा है। उन्होंने कहा कि खेद का विषय है कि किसी भी पीडित पक्ष को प्रति प्राप्त होने से पूर्व आदेश मीडिया में प्रसारित हो रहा है तथा प्राधिकरण के एक पीठासीन अधिकारी द्वारा एक अंग्रेजी दैनिक को भी निर्णय के सम्बन्ध में ब्रीफिंग की गई है जो कि विधिक एवं परम्परागत रूप से अपवाद है।

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