विधायकों को अनसुना कर रहे अफसर
देहरादून। उत्तराखण्ड में पिछले एक दशक से इस बात को लेकर आवाम के मन में बडी नाराजगी पनपती आ रही है कि राज्य के काफी प्रशासनिक और पुलिस अफसर उनका फोन नहीं उठाते। उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री व हरिद्वार से सांसद ने अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में शपथ लेते ही मीडिया के सामने यह हुंकार भरी थी कि अगर किसी भी अफसर ने आम जनमानस का फोन नहीं उठाया तो उसके खिलाफ कार्यवाही की जायेगी। हालांकि उनकी इस हुंकार के बाद कुछ समय तक तो अफसरों के मन में पूर्व मुख्यमंत्री का डर दिखा लेकिन बाद में यह डर हवा-हवाई हो गया था। मुख्यमंत्री ने राज्य के अफसरों को भी दो टूक अल्टीमेटम दे रखा है कि अगर उनके सरकारी फोन पर कोई फोन आये तो उसे सुने और अगर ऐसा नहीं किया गया तो उस अफसर पर कार्यवाही की जायेगी। गजब की बात यह है कि जहां आम आदमी के मन में एक दर्द झलकता है कि बहुत अफसर उनका फोन नहीं उठाते तो वहीं कांग्रेस के एक विधायक ने सदन के अन्दर यह खुली हुंकार लगा दी कि जो अफसर विधायकों का न तो फोन उठाते हैं जो उनका जवाब देना उचित नहीं समझते हैं ऐसे अधिकारियों के खिलाफ विशेषाधिकार हनन में सदन मे बुलाकर उन्हें दण्डित किया जाना चाहिए। विधायक ने पिथौरागढ़ के पूर्व डीएम को लेकर जो अपना दर्द विधानसभा अध्यक्ष को बताया उससे यह बात तो और प्रबल हो गई कि राज्य के काफी अफसर आम जनमानस तो क्या विधायकों के फोन भी नहीं उठाते?
उत्तराखंड विधानसभा में धारचूला से विधायक हरीश धामी ने राज्य के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विधानसभा में बोलते हुए उन्होंने कहा कि प्रदेश में हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि कई अधिकारी सरकार के एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं और विपक्ष के जनप्रतिनिधियों की अनदेखी कर रहे हैं। उनका आरोप है कि विपक्ष के विधायकों द्वारा किए गए फोन कॉल तक अधिकारी उठाना जरूरी नहीं समझते, जिससे जनसमस्याओं के समाधान में बाधा उत्पन्न हो रही है। विधायक हरीश धामी ने विशेष रूप से पिथौरागढ़ के पूर्व जिलाधिकारी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का मुद्दा उठाते हुए अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधि जनता की समस्याओं को लेकर अधिकारियों से संपर्क करते हैं, लेकिन कई बार अधिकारी फोन तक नहीं उठाते। यदि किसी कारणवश फोन नहीं उठाया जाता तो बाद में वापस कॉल करना भी आवश्यक नहीं समझा जाता, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक संकेत नहीं है।
हरीश धामी ने कहा कि जब किसी क्षेत्र में आपदा की स्थिति होती है या जनता से जुड़ा कोई गंभीर मुद्दा सामने आता है, तब जनप्रतिनिधियों को अधिकारियों से तत्काल संवाद करना पड़ता है। लेकिन कई बार ऐसा देखने में आता है कि बार-बार कॉल करने के बावजूद भी अधिकारी फोन नहीं उठाते। इससे न केवल जनप्रतिनिधियों को परेशानी होती है बल्कि जनता की समस्याओं के समाधान में भी देरी होती है। उन्होंने विधानसभा में यह भी कहा कि यदि अधिकारी जनप्रतिनिधियों से संवाद नहीं करेंगे तो फिर जनता की समस्याएं अधिकारियों तक कैसे पहुंचेंगी। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधि और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय होना बेहद जरूरी है। यदि यह समन्वय कमजोर पड़ता है तो इसका सीधा असर जनता पर पड़ता है।
विधायक हरीश धामी के इस बयान ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर एक नई बहस भी खड़ी कर दी है। राज्य में अक्सर यह शिकायत सामने आती रही है कि कुछ अधिकारी फोन उठाने या जनप्रतिनिधियों से संवाद करने में रुचि नहीं दिखाते। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब अधिकारी ही जनप्रतिनिधियों की बात सुनने को तैयार नहीं होंगे तो जनता की समस्याओं का समाधान कैसे होगा।राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में अब इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है। कई लोगों का मानना है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर संवाद और समन्वय से ही शासन व्यवस्था प्रभावी बन सकती है। वहीं विधायक हरीश धामी द्वारा विधानसभा में उठाए गए इस मुद्दे के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और प्रशासन इस विषय पर क्या रुख अपनाते हैं और भविष्य में जनप्रतिनिधियों तथा अधिकारियों के बीच संवाद को बेहतर बनाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
