सिल्वर जुबली उत्तराखंड को डंडी-कंडी का सहारा!

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सांखाल महिला को डंडी-कंडी के सहारे पहुंचाया अस्पताल
पुरोला/उत्तरकाशी(शैलेन्द्र सिंह भंडारी)। रजत जयंती का पीट रही ढोल, स्वास्थ्य सुविधाओं में ‘होल ही होल’ उत्तराखंड में मौजूदा समय में एक ही बात का हल्ला मचा हुआ है, जन जन की सरकार – जन जन के द्वार। इस अभियान को लेकर सरकार से लेकर अधिकारी भी खूब इतरा रहे हैं यह कहकर कि उन्होंने न जाने कितनी अनगिनत समस्याओं का निस्तारण करके जनता को कितनी राहत पहुंचाई है। हालांकि सरकार जो छवि दिखाना चाह रही है वास्तव में छवि उससे काफी अलग है। राज्य स्थापना की रजत जयंती पर कथित उपलब्धियों का ढोल पीटने वाली सरकार आज तक राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था ठीक नहीं कर पाई है और प्रत्यक्ष प्रमाण उस समय देखने को मिल गया जब पुरोला विधानसभा के सांखाल की एक महिला को डंडी-कंडी के सहारे अस्पताल पहुंचाने का दृश्य सामने आया। इस घटना से यह बात साफ को गई है कि सरकार के स्वास्थ्य सुविधाओं की बातों ‘होल ही होल’ है और लोग सवाल पूछ रहें हैं कि क्या सरकार, आज भी जनता है लाचार?
जनपद के पुरोला विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम सांखाल में एक गंभीर रूप से बीमार महिला को ग्रामीणों द्वारा डंडी-कंडी के सहारे करीब पांच किलोमीटर पैदल सड़क तक पहुंचाने की घटना ने क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं और सड़क संपर्क को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला ग्राम सांखाल का है जहां श्रीमती इन्द्रि देवी, पत्नी स्वर्गीय बादरु, की अचानक तबीयत बिगड़ गई। गांव में सड़क संपर्क न होने के कारण परिजनों और ग्रामीणों के सामने उन्हें अस्पताल तक पहुंचाने की सबसे बड़ी चुनौती थी सड़क की स्थिति की गंभीरता को देखते हुए ग्रामीणों ने तत्काल डंडी-कंडी की व्यवस्था की और महिला को करीब पांच किलोमीटर पैदल घेडिया बैंड तक जैसे तैसे पहुंचाया। सड़क से निजी वाहन की सहायता से उन्हें बर्नीगाड पहुंचाया गया। इसके बाद 108 एम्बुलेंस सेवा के माध्यम से महिला को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) नैगांव ले जाया गया। चिकित्सकों ने प्रारंभिक परीक्षण के बाद उनकी हालत को गंभीर बताते हुए बेहतर उपचार के लिए देहरादून रेफर कर दिया।
ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र के कई गांव आज भी सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। आपातकालीन स्थिति में मरीजों को डंडी-कंडी या चारपाई के सहारे कई किलोमीटर तक ढोकर सड़क मार्ग तक पहुंचाना मजबूरी बन जाता है। इससे पूर्व मोरी विकास खंड के सटूड़ी गांव से भी इसी प्रकार की घटना सामने आई थी, जहां एक बीमार महिला को ग्रामीणों ने पैदल सड़क तक पहुंचाया था। स्थानीय लोगों ने कहा कि समय-समय पर जनप्रतिनिधियों द्वारा क्षेत्र में व्यापक विकास के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कई गांव अब भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सांखाल, सर बढ़ियार, नाड़ा, धौला, सेवा और अन्य दूरस्थ गांवों में सड़क संपर्क और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है। ग्रामीणों ने यह भी सवाल उठाया कि आपातकालीन परिस्थितियों में हेली एम्बुलेंस जैसी सुविधाएं कुछ स्थानों पर उपलब्ध कराई जाती हैं, तो अन्य दुर्गम गांवों में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की जाती। उनका कहना है कि गंभीर मरीजों को समय पर उपचार न मिल पाने से अनहोनी की आशंका बनी रहती है।
घटना के बाद क्षेत्र में स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने और सड़क निर्माण कार्यों में तेजी लाने की मांग उठने लगी है। स्थानीय प्रशासन का कहना है कि दुर्गम क्षेत्रों में सुविधाएं पहुंचाने के लिए चरणबद्ध प्रयास किए जा रहे हैं। फिलहाल महिला का उपचार देहरादून में जारी है। घटना ने एक बार फिर पहाड़ी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति पर गंभीर चर्चा छेड़ दी है। जिससे पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन का मुख्य कारण सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं का आभाव है।

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