सरकार कब खंगालेगी गैंगेस्टर की कुंडली?

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जमीनों के ध्ंाधे का बादशाह किसकी शह पर बना था विक्रम
राजनेताओं-अफसरों की आंखों का तारा था डॉन!
देहरादून। सरकार ने उत्तराखण्ड को अपराधियों और माफियाओं से मुक्त कराने का दावा किया था और 2025 तक राज्य को इनसे आजादी दिलाने का भी संकल्प लिया गया लेकिन यह संकल्प आज तक पूरा नहीं हो पाया। हैरानी वाली बात तो यह है कि बार-बार मुख्यमंत्री ने घर-घर में सत्यापन अभियान चलाने का पुलिस अफसरों को संदेश दिया जिससे कि कोई भी संदिग्ध अपनी पहचान छुपाकर न रह सके। पुलिस के सत्यापन अभियान की उस समय धज्जियां उड़ गई थी जब झारखंड के एक गैंगेस्टर को शहर के व्यस्तम राजपुर रोड में स्थित सिल्वर सिटी के जिम की सीढ़ियों पर पेशेवर हत्यारों ने ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर मौत की नींद सुला दिया था और वह आराम से शहर से हरिद्वार तक पहुंच गये और उसके बाद वह कहां गायब हो गये इसकी आज तक पुलिस गुत्थी नहीं सुलझा पाई। राजधानी में झारखंड का कुख्यात डॉन आजादी से रह रहा था और उसने किस राजनेता और अफसरों से याराना निभाते हुए पिस्टल का लाइसेंस तो लिया ही साथ में क्रशर का लाइसेंस लेने में भी कामयाबी हासिल कर ली थी। कुख्यात डॉन का कत्ल हुये कई दिन बीत गये लेकिन सरकार ने अभी तक गैंगेस्टर की कुंडली खंगालने के लिए कोई बडी जांच कराने का हुक्म तक नहीं दिया जिससे कई सवाल खडे हो रहे हैं?
झारखंड के डॉन विक्रम सिंह की जब राजपुर रोड में सिल्वर सिटी के जिम की सीढ़ियों पर गोलियों से भूनकर हत्या हुई तो उससे उत्तराखण्ड से लेकर झारखंड तक की पुलिस में हडकम्प मंच गया था। सवाल खडे हुये कि आखिरकार वो कौन भाडे के पेशेवर हत्यारे थे जिन्होंने डॉन को जिम के बाहर ही मौत की नींद सुलाकर उसके डॉन होने के अध्याय को बंद कर दिया था? डॉन कबसे राजधानी में रह रहा था और उसका क्या धंधा चल रहा था इससे जब पर्दा उठा तो यह मामला एक फिल्मी पटकथा की तरह सामने आया और हर कोई हैरान रह गया कि झारखंड का कुख्यात डॉन अपने ऊपर दर्ज पचास से अधिक मामले होने के बाद भी पिस्टल और क्रशर का लाइसेंस लेने में कामयाब हुआ था। मामले में अगर देखा जाए तो चाहे क्रशर का लाइसेंस हो या पिस्टल का बिना पूरी जांच पड़ताल के कैसे विक्रम के हवाले कर दिया गया। अगर मामले से जुडे़ अफसरान गहनता से इसकी जांच पड़ताल कराते तो शायद उसी वक्त इस गैंगस्टर को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया होता, लेकिन ऐसा कुछ भी करने की जहमत न तो तो तत्कालीन सरकार द्वारा किया गया और न ही उन अधिकारियों द्वारा जो इस मामले को देख रहे थे। विक्रम एक नाम ही नहीं था, बल्कि झारखंड सूबे का वह नाम था, जिसकी धमक से ही वहां की अवाम थर-थर कांपती थी। ऐसा नहीं है कि अफसरों ने जांच करने की जहमत न उठाई हो, लेकिन पैसों की धमक के आगे सब कुछ दबा दिया गया। इस मामले की अब तक न तो वर्तमान सरकार के मुखिया ने कोई बारीकी से जांच कराने की जहमत उठाई और न ही शासन में बैठे आलाधिकारियों ने।
राजधानी के अन्दर अब एक बहस छिडी हुई है कि आखिरकार झारखंड में अपराध की दुनिया में अपने नाम का डंका बजाने वाले विक्रम ने कुछ ही वर्षों में इतना बड़ा साम्राज्य राजधानी दून में खड़ा कर लिया और अकूत संपत्ति का मालिक बनकर अपनी हुकूमत चलाने लगा। विक्रम के मर्डर को अगर छोड़ दिया जाए तो अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि उसने राजधानी में कहां-कहां पर अपनी संपत्तियां बनाईं और कितनी अकूत संपत्ति हासिल कर ली थीं। ये भी पड़ताल होनी चाहिए कि विक्रम की संपत्तियों में उससे जुडे़ ब्यूरोक्रेट का कितना हिस्सा है और कितने अधिकारी इस मामले से जुडे़ हुए हैं?
सवाल यह भी पनप रहे हैं कि आखिरकार झारखंड के कुख्यात डॉन विक्रम शर्मा ने किन राजनेताओं और अफसरों को अपना हमराज बनाया था जिसके चलते उन्होंने कुख्यात को जहां पिस्टल का लाइसेंस दिलाने में अपना याराना जरूर निभाया होगा इसमें भी कोई शंका नहीं है? वहीं उधमसिंहनगर जैसे बडे जनपद में कुख्यात की स्टोन क्रशर वाली फाइल पर किन अफसरों के हस्ताक्षर से उसे वहां अपना साम्राज्य खडा करने के लिए किसने आगे रखा था यह एक पहेली बना हुआ है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि आखिर सरकार कब इस गैंगेस्टर के साम्राज्य की कुुंडली खंगालेगी और यह पता लगाने के लिए आगे आयेगी कि राज्य के किन राजनेताओं और अफसरों की आंखो का तारा यह डॉन बना था और उसने अपना एक ऐसा साम्राज्य खडा कर दिया था जिसकी कल्पना फिल्मी कहानी जैसी ही नजर आ रही है?

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