‘मुर्दों में जान’ बताकर वेंटिलेटर में रखकर राजधानी के निजी अस्पताल खुलेआम लोगों की जेब पर डाल रहे डाका
देहरादून(संवाददाता)। राजधानी देहरादून में निजी अस्पताल खुलेआम आम नागरिकों की जेब में ‘मुर्दों में जान’ बता जान… जान का खेल-खेल कर खुलेआम परिजनों की जेब में डाका रहे हैं। इस खेल में दून के नामी-गिरामी निजी अस्पताल ही नहीं शामिल, बल्कि गली कूचों में खड़ी बड़ी बड़ी बिल्डिंगों में खुले अस्पतालों के ‘सफेदकॉलर’ की आड़ में डकैती डाली जा रही है।
इन सबके बावजूद शासन प्रशासन चुपचाप तमाशा देख रहा है। ऐसा नहीं है कि शासन प्रशासन के बड़े अफसरान इस खेल को नहीं समझ रहे हो, लेकिन सब कुछ जानने और समझने के बावजूद गरीब हो या अमीर सभी की कट रही जेब को यूं ही कटने दिया जा रहा है। दून में पूरी तरह से बेलगाम हो चुके ‘सफेदकॉलर’ वालों के आगे ये शासन के अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं। एक तरफ मुर्दों के परिजन इन ‘सफेदकॉलर’ वालों के सामने गिड़गिड़ाकर मुर्दे में जान डालने की फरियाद करते हैं , वहीं ये ‘सफेदकॉलर’ बस पैसे बनाने की जुगत में लगे हुए हैं और अपने बेपरवाह अंदाज में काम को अंजाम देकर लाखों करोड़ों रुपये का आवारा न्यारा कर रहे हैं ।
वैसे तो राजधानी के कई कथित अस्पतालों ने अपने को चैरिटी के रूप में घोषित कर गरीबों का आयुष्मान हो या अन्य योजनाओं के तहत फ्री में इलाज करने का ढिंढोरा पीट रहे हैं, लेकिन वास्तविकता इससे पूरी तरह से उलट है। इन ‘सफेदकॉलर’ वाले अस्पतालों में भले ही मरीज मुर्दे के रूप में ही क्यों न आया हो, लेकिन यह बेलगाम हो चुके अस्पताल उसमें जान डालने का स्वांग रचकर सबसे पहले उसे वेंटिलेटर में रखकर इलाज की औपचारिकता शुरू करते हैं। इसके बाद दो-तीन दिन बाद यह कहकर कि इस मरीज की मौत हो गई है। और… इसके बाद शुरू होता है बिल-बिल का खेल। इस खेल में हजारों से लगाकर लाखों रुपये तक बिल-बिल का खेल पहुंच जाता है। इस दौरान जब मरीज के परिजन इस बिल को देने में असमर्थता जताते हैं तो यह लोग श्गुंडईश् में उतर आते हैं और पूरा पैसा जमा करने का दबाव डालते हुए जमा करने का और प्रेशर डालने को पुलिस तक को अस्पताल में बुलाने से पीछे नहीं रहते। अगर कोई गरीब भी है और उसका परिजन चार मीटर कफन के लिए वेंटिलेटर में पड़ा है तो यह ‘सफेदकॉलर’ उससे कफन तक का पैसा छीनने की कोशिश करते हैं।
हाल ही में राजधानी देहरादून में कई नामी गिरामी अस्पतालों में ऐसी कई घटनाएं हुईं, जिसमें मरीज तो पहले से मरा हुआ आया, लेकिन उसको वेंटिलेटर में डालकर बिल बनाने के चक्कर में दो से तीन दिन तक का भी इंतजार करवाया और बाद में ‘ब्राड डेथ’ बताकर या हार्ट अटैक से मौत कहकर इस दौरान दवाओं का पूरा खर्चा मुर्दे के परिजनों के ऊपर ठोक दिया जा रहा है। ऐसा ही एक मामला अभी एक दिन पूर्व आया, जिसमें एक नामी गिरामी अस्पताल के ‘सफेदकॉलर’ ने भारी भरकम बिल उस शख्स को पकड़ा दिया, जिसकी जीवनसाथी ने दम तोड़ा था। कहा तो यहां तक जाता है कि इस मामले में अस्पताल आने से पहले ही उस महिला की मौत हो चुकी थी, लेकिन अस्पताल ने महिला को वेंटिलेटर में डालकर इलाज शुरू किया और बाद में जब भारी भरकम बिल हो गया तो बिल को गामजदा पति को थमा दिया। इस मामले में महिला के साथ अन्य परिजनों ने जब विरोध किया तो अस्पताल प्रशासन ने पुलिस को भी बुला लिया। पुलिस कर्मियों ने परिजनों को बिल देने का दबाव डाला, लेकिन जब परिजनों ने साफ मना कर दिया तो पुलिसकर्मियों ने अपने हिसाब से हड़काना शुरू कर पूरा बिल जमा करने का दबाव डाला। इस मामले में परिजनों का साफ कहना था कि जब हम महिला को लेकर आए थे तो उसमें जान नहीं थी, लेकिन फिर भी अस्पताल के डॉक्टरों ने जिंदा बताकर भर्ती कर लिया और वेंटिलेटर में डालकर इलाज शुरू किया। उधर, नोकझोंक के दौरान डॉक्टरों का कहना था कि इलाज के बाद ही महिला की मौत हुई।
