देहरादून(प्रमुख संवाददाता)। उत्तराखण्ड के अन्दर पिछले कुछ वर्षों में सड़कों पर आंदोलन का कोई भी बिगुल बजता हुआ नहीं दिखाई देता था लेकिन पिछले कुछ अर्से से सडकों पर अपनी मांग को लेकर कुछ संगठन जहां अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने के लिए आगे आ रहे हैं तो वहीं अंकिता भंडारी हत्याकांड मे कथित वीआईपी के नाम उछलने के बाद उत्तराखण्ड की सियासत में एक बडा तूफान मचा हुआ है? सरकार ने जन दबाव मे आकर सीबीआई जांच के आदेश दिये और सीबीआई ने इस मामले मे मुकदमा भी दर्ज कर लिया लेकिन अंकिता हत्याकांड में कथित वीआईपी को लेकर सीबीआई जांच की शुरूआत के बाद भी सड़कों पर आंदोलन का बिगुल बजता हुआ नजर आ रहा है जिससे यह साफ नजर आ रहा है कि अंकिता के माता-पिता से लेकर महापंचायत में आये राजनीतिक दल और संगठन सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज की देखरेख में ही सीबीआई जांच कराये जाने की मांग पर आगे बढ़ रहे हैं जिससे कहीं न कहीं सरकार के माथे पर भी चिंता की लकीरें दिखाई दे रही हैं?
उत्तराखण्ड में भले ही अभी चुनावी दौर शुरू नहीं हुआ है लेकिन कहीं न कहीं विधानसभा चुनाव को नजदीक आता देख कांग्रेस, उक्रांद, सपा और कुछ संगठन ने अपनी तैयारी चुनाव को लेकर कहीं न कहीं करनी शुरू कर दी है और वह कुछ मुद्दों पर सरकार को अकसर कटघरे में खडा करने के लिए आगे बढते जा रहे हैं जिससे आम जनमानस को भी यह दिखाई दे रहा है कि अब राज्य के अन्दर कहीं न कहीं चुनावी महासंग्राम का बिगुल बज गया है? पौडी मे रहने वाली अंकिता भंडारी हत्याकांड ने उत्तराखण्ड से लेकर देश के अन्दर बेटियों की सुरक्षा को लेकर एक बडा तूफान मचा दिया था और यह बात उठी थी कि जब अंकिता ने कथित वीआईपी को स्पेशल सर्विस देने से इंकार किया था तो उसके चलते उसका कत्ल कर दिया गया था? अंकिता भंडारी हत्याकांड में गिरफ्तार किये गये तीनों गुनाहगारों को उम्रकैद की सजा होने तक उक्रांद के कुछ नेता इस हत्याकंाड में कथित वीआईपी के नाम को लेकर अपनी आवाज बुलंद करते आ रहे थे लेकिन सरकार का दो टूक कहना था कि इस हत्याकांड में किसी भी कथित वीआईपी का कोई रोल नहीं था? सरकार की इस दलील को कभी भी उक्रांद ने स्वीकार नहीं किया और उसका दो टूक यही कहना था कि आखिरकार हत्या का जब कोई मोटिव ही नहीं था तो उसकी हत्या किन कारणों से हुई यह आत तक सामने नहीं आ पाया?
अंकिता भंडारी को पूर्ण न्याय दिलाने के लिए कांग्रेस, उक्रांद, माकपा और काफी संख्या में उत्तराखण्ड आंदोलन से जुडे रही महिला नेत्री और महिलायें आगे आ रखी हैं और उनका दो टूक कहना है कि इस हत्याकांड में उस कथित वीआईपी का चेहरा बेनकाब होना चाहिए जिसके कारण अंकिता भंडारी की हत्या की गई थी। अंकिता भंडारी हत्याकांड में कथित वीआईपी का नाम सोशल मीडिया पर उजागर होने के बाद से ही उत्तराखण्ड की सियासत में एक नई तपिश देखने को मिल रही है और यही कारण है कि पहाड़ से लेकर मैदान तक जब कथित वीआईपी की सीबीआई जांच कराने को लेकर जनदबाव बढता गया तो उसके बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कथित वीआईपी की जांच सीबीआई से कराने के लिए अपनी हरी झंडी दे दी और उसके बाद पदमश्री अनिल जोशी ने जब इस मामले में अपनी रहस्यमय एंट्री करके कथित वीआईपी की जांच सीबीआई से कराने को लेकर डीजीपी को पत्र दिया था तो उसके कुछ घंटो बाद ही बसंत विहार थाने में अनिल जोशी की शिकायत पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया था और इस मुकदमे को शासन ने सीबीआई के पास भेजा था जिसके बाद सीबीआई ने अनिल जोशी की शिकायत पर मुकदमा दर्ज किया हुआ है। अनिल जोशी के द्वारा इस मामले मे मुकदमा दर्ज होते ही एक बार फिर अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने की लड़ाई लडने वाले राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने अपनी नाराजगी दिखाई और साफ कहा कि अंकिता भंडारी प्रकरण में अंकिता के माता-पिता की शिकायत पर मुकदमा दर्ज होना चाहिए। अंकिता भंडारी को पूर्ण न्याय दिलाने के लिए परेड ग्राउंड के समीप हुई महापंचायत में शामिल हुये अंकिता के पिता ने मंच से ऐलान किया कि वह बिकाऊ नहीं हैं और वीआईपी की जांच तथा जिनके आदेश पर रिजॉट का कमरा तोडा गया उनके नाम भी जांच में शामिल किये जायें। महापंचायत में यह आवाज भी बुलंद हुई कि जिन कथित वीआईपी के नाम सोशल मीडिया पर सामने आये हैं उन्हें भी जांच के दायरे में लाया जाये और जब तक सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज की देखरेख में सीबीआई जांच नहीं होती तब तक इस जांच का कोई महत्व नहीं है। अंकिता भंडारी को पूर्ण न्याय दिलाने के लिए महापंचायत में जिस तरह से हुजूम उमड़ा और उनके मन में एक टिस दिखाई दी कि पदमश्री अनिल जोशी की एफआईआर को रद्द करके अंकिता के माता-पिता की शिकायत पर एफआईआर दर्ज हो और इस मामले में जिनके नाम उछल रहे हैं उन्हें भी जांच के दायरे में लाया जाये तथा जांच सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज की देखरेख मे ही सीबीआई करे इसको लेकर अब एक बार फिर आंदोलन का बिगुल बजता हुआ नजर आ रहा है?
