नेतृत्व परिवर्तन के सूरमा हरीश ने छोड़ा नया शिगूफा
बहुगुणा से कुर्सी छीनने जितना आसान नहीं यह ‘टास्क’
राजनीतिक महत्वत्ता हो रही कम, अपना रहे नए हथकंडे
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। आपदा को अवसर में कैसे बदलते हैं इसका एक बहुत ही सटीक राजनीतिक उदाहरण उत्तराखण्ड में उसे समय देखने को मिला था जब वर्ष 2013 में केदारनाथ में भयानक दैवीय आपदा आई थी। इस आपदा में असंख्य लोगों की जान गई थी। इस कालखंड के दौरान उत्तराखण्ड राज्य की बागडोर कांग्रेस के हाथों में थी और विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री थी। आपदा के उस दौर में एक मुख्यमंत्री के तौर पर जो राहत कार्य संभव हो सकते थे, वह उन्होंने किए थे। हालांकि तत्कालीन विजय बहुगुणा सरकार के ही कुछ लोगों को इस आपदा में एक अवसर नजर आया और उन लोगों ने एक गुट बनाकर विजय बहुगुणा के खिलाफ लाबिंग शुरू कर दी थी। परिणाम यह हुआ कि दस जनपथ को उत्तराखण्ड में नेतृत्व परिवर्तन करने का फैसला लेना ही पड़ा और विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा। नेतृत्व परिवर्तन की इस सियासी बिसात के सबसे बड़े सूरमा के तौर पर जो नाम सामने आया वह नाम था, हरीश रावत। वह हरीश रावत ही थे जिनके अचूक सियासी दांव पेंचों की वजह से विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा और इसके बाद खुद हरीश रावत उत्तराखण्ड के मुखिया बन गए। नेतृत्व परिवर्तन के सूरमा कहे जाने वाले हरीश रावत मौजूदा समयं भी कुछ ऐसे ही दांव पेंच चलने की दिशा में कदम उठाते हुए नजर आ रहे हैं। हालांकि फर्क यह है कि इस बार वह धरातल पर नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर अपने दांव पेंच चल रहे है। हरीश रावत ने एक वीडियों जारी किया है जिसमें कि वह यह कहते हुए सुनाई दे रहे है कि मौजदा उत्तराखण्ड सरकार में चेहरा बदलने की तैयारी हो रही है। अपने कथन पर थोड़ा और मसाला लगाते वह यह भी कह रहे है कि चेहरा बदलने से कुछ नहीं होगा, अब आगामी चुनाव में जनता ही सत्ता भाजपा को सत्ता से बाहर करेगी? उत्तराखण्ड की राजनीति को समझने वाले जानकारों यह मानना है कि हरीश का यह विचार उनका एक ख्याली पुलाव से अधिक और कुछ नहीं है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि नेतृत्व परिवर्तन के सूरमा माने जाने वाले हरीश ने भले ही यह नया शिगूफा छोड़ दिया हो लेकिन उनके लिए यह टास्क इस बहुगुणा की कुर्सी छीनने जितना आसान नहीं होगा? चर्चाएं तो इस बात को लेकर भी हो रही है कि पार्टी और प्रदेश में अपनी राजनीतिक महत्वत्ता की कमी को देखते हुए, हरदा ऐसे नए हथकंडे अपना रहे हैं? अब ऐसे हथकंडे भविष्य में उनके कितने काम आएंगे, यह तो देखने वाली बात होगी।
राजनीति की खूबसूरती एक मनोरम दृश्य उस समय देखने को मिला था जब उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत से शिष्टाचार भेंट की थी और उन्हें अपने खेत के चावल को कट्टा भेंट में दिया था। दो चिरप्रतिद्वंदी राजनीतिक दलों के दिग्गजों नेताओं का यह मिलन, अपने आपमें कई सवालों को जन्म दे दिया था। सुगबुगाहट होने लगी कि क्या अब हरदा की रसोई में पुष्कर सिंह धामी के चावलों से कोई सियासी बिरयानी पकने वाली है? हालांकि बिरयानी तो नहीं पकी, अगर कुछ पका तो वह है हरदा के मन में ख्याली पुलाव। सोशल मीडिया के माध्यम से संदेश देकर हरीश रावत ने राज्य में जो नेतृत्व परिवर्तन का शिगुफा छोड़ा है, वह उनके लिए कोई नई बात नहीं है। इसके तो वह पहले से सूरमा रहे हैं और अपने राजनीतिक दल की सरकार के दौरान तो उन्होंने ऐसे शिगूफों को हकीकत तक में बदला है। अब सवाल उठता है कि एकाएक ऐसा क्या हुआ कि जिनके हाथों से हरीश कुछ दिन पहले चावल का कट्टा भेंट के रूप में ले रहे थे और उनकी शान में कसीदे पड़ रहे थे, सोशल मीडिया में उन्हें हवाला देकर नेतृत्व परिवर्तन (चेहरा बदलने) की बात कह रहे हैं? जानकारों का मानना है कि किसी भी इंसान की महत्वकांक्षा कभी खत्म नहीं होती और राजनीतिक में तो खास तौर से महत्वकांक्षा खत्म होने का सवाल ही नहीं उठता और इसी वजह से हरीश रावत ने अपने तरकश से फिर वही पुराना तीर निकालकर सोशल मीडिया के माध्यम से छोड़ है और इस ओर संकेत दिए हैं कि उनकी महत्वकांक्षाओं ने अभी दम नहीं तोड़ा है। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि मौजूदा दौर में उत्तराखण्ड के अंदर हरीश रावत उतने प्रासंगिक नहीं रह गए है जितना की किसी दौर में हुआ करते थे। यहीं कारण है कि राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चाएं आम हो गई है कि सोशल मीडिया पर जो हरीश रावत ने जो एक शिगूफा छोड़ा है, वह किसी ख्याली पुलाव से अधिक कुछ और नहीं है?
