कहां जा रहा मोदी के सपनों का उत्तराखण्ड?

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अपराधियों के मन में नहीं दिखता ‘खाकी का डर’
आम जनमानस में अब अपराधियों का दिखने लगा भय!
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड की जनता विश्व के ताकतवर प्रधानमंत्री पर अभेद भरोसा करके राज्य के अन्दर भाजपा की बहुमत वाली सरकार बनाने के लिए इसलिए आगे आई थी क्योंकि उन्होंने आवाम से वायदा किया था कि उत्तराखण्ड को सजाना सवारना उनका जिम्मा रहेगा। उत्तराखण्ड को एक नया उत्तराखण्ड बनाने के लिए उन्होंने मंचो से ऐलान किया था कि अगला दशक उत्तराखण्ड का होगा। प्रधानमंत्री के इस संकल्प से राज्य की जनता गदगद थी और उन्हें इस बात का इल्म था कि उनका राज्य अब विकास की राह पर तो आगे बढेगा ही साथ ही राज्य के अन्दर माफिया और अपराधियों का नेटवर्क नेस्तनाबूत हो जायेगा। उत्तराखण्डवासियों को मुख्यमंत्री ने वचन दिया था कि 2025 तक उत्तराखण्ड अपराधमुक्त हो जायेगा जिससे राज्यवासी गदगद नजर आ रहे थे। लेकिन आज के इस दौर में अपराधियों ने जिस तांडव का आईना आवाम को दिखा रखा है उससे सवाल खडे हो रहे हैं कि आखिरकार मोदी के सपनों का उत्तराखण्ड कहां जा रहा है? अपराधियों के मन में खाकी का डर देखने को नहीं मिल रहा है और यही कारण है कि आम जनमानस में एक बार फिर अपराधियों का भय दिखने लगा है क्योंकि कुछ महीनों के भीतर जो चंद बडे अपराध राज्य के कुछ जिलों में घटित हुये हैं उससे उत्तराखण्ड पुलिस के इकबाल पर सवालिया निशान लग गया है?
उत्तराखण्ड को माफिया, अपराधी, भ्रष्टाचारियों, रिश्वतखोरों से आजादी दिलाने के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शपथ लेने के बाद एक बडा संकल्प लिया था। मुख्यमंत्री ने ऐलान किया था 2025 तक उत्तराखण्ड को वह भ्रष्टाचार, माफिया, नशा व अपराधमुक्त कर देंगे। मुख्यमंत्री के इस संकल्प पर आम जनमानस को एक बडा विश्वास था कि अब उनका उत्तराखण्ड माफिया तंत्र से आजाद हो जायेगा। सबसे अहम बात यह है कि आम जनमानस उत्तराखण्ड को अपराधमुक्त करने का सपना देख रहा है और उसका मानना है कि राज्य तभी गुलजार हो सकता है जब माफिया और अपराधियों को लेकर किसी के मन में कोई भय न रहे। उत्तराखण्ड में छोटे अपराधियों पर तो पुलिस शिकंजा कसने के लिए आगे रही लेकिन बडे अपराधियों पर वह उस तरह से नकेल नहीं लगा पाई जिसकी उसने अपने मन के अन्दर एक कल्पना की थी? उत्तराखण्ड के इतिहास में पहली बार ऐसा देखने को मिला जब रूडकी जेल से एक अपराधी को लक्सर न्यायालय में पेशी पर पुलिस अभिरक्षा में ले जाया जा रहा था तो हाईवे पुल पर मोटर साइकिल सवार दो बदमाशों ने पुलिस अभिरक्षा में ले जाये जा रहे अपराधी को गोलियों से भूनकर मौत की नींद सुला दिया था और उसके बाद पुलिस ने इतना साहस नहीं दिखाया था कि वह भागते बदमाशों पर गोलियां दाग देती? इस सनसनीखेज घटना ने आम जनमानस को झंझोर कर रख दिया था और बहस चली थी कि जब पुलिस अभिरक्षा में ही कोई अपराधी सुरक्षित नहीं रहा तो फिर पुलिस से कोई क्या उम्मीद कर सकता है?
वहीं उधमसिंहनगर के काशीपुर में वहां के विधायक तिलकराज बेहड के पुत्र पार्षद सौरभ बेहड पर तीन नकाबपोशों ने जानलेवा हमला कर सिस्टम को चुनौती दी तो उससे सवाल खडे हो गये कि आखिरकार बदमाशों के हौसले इतने बुलंद कैसे हो रहे हैं कि वह जहां चाहे वारदात करने से नहीं चूक रहे हैं? अपराध के बाद अपराधियों को पकडना कोई मायने नहीं रखता क्योंकि अपराधी को तो पकडा जाना ही है, सवाल यह खडा होता है कि अपराधियों के मन में पुलिस का इतना भय होना चाहिए कि वह कोई अपराध करने का दुसाहस किया तो उन्हें इसका बडा खामियाजा भुगतना पडेगा? उधमसिंहनगर के काशीपुर में पार्षद पर हुये जानलेवा हमले ने कई सवालों को जन्म दे दिया है। पुलिस मुख्यालय के आला अफसर क्या राज्य में हो रही घातक वारदातों को लेकर ंिचतित हैं यह हर किसी के जहन में एक बडा सवाल पनप रहा है? उत्तराखण्ड को अपराधमुक्त करने का संकल्प तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक बडे-बडे अपराधियों के नेटवर्क को नेस्तनाबूत करने के लिए पुलिस के आला अफसर एक बडी रणनीति के तहत कोई बडा ऑपरेशन न चला दें?

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