पर्यावरणविद के मुकदमा लिखाने पर भी छिडे़गी बहस?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड के अन्दर अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर सडकों पर संग्राम मचा हुआ है और हर तरफ उस कथित वीआईपी को सजा दिलाने का शोर मच रहा है जिसके नाम का खुलासा कर पूर्व भाजपा विधायक की पत्नी ने सोशल मीडिया पर बडा बवाल मचा रखा है। अंकिता भंडारी हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने और सुप्रीम कोर्ट जज की देखरेख में उसकी मॉनिटिरिंग को लेकर कांग्रेस से लेकर काफी संगठन आक्रामक रूख दिखा रहे हैं। हत्याकांड में कथित वीआईपी को लेकर जांच सीबीआई से कराये जाने को लेकर रविवार को उत्तराखण्ड बंद का आह्वान भी हो रखा है जिसके चलते मुख्यमंत्री ने मामले की जांच सीबीआई से कराने की संस्तुति की तो बहस चल पडी कि जांच सुप्रीम कोर्ट के जज की मॉनिटिरिंग में जब तक नहीं होगी तब तक उन्हें जांच पर कोई भरोसा नहीं। इधर सीबीआई जांच के आदेश और उधर अचानक पर्यावरणविद ने अंकिता भंडारी हत्याकांड में कथित वीआईपी के खिलाफ मुकदमा कायम कराने को लेकर डीजीपी को पत्र दिया और यह पत्र इतनी तेजी से आगे बढ़ा कि रात को बंसत विहार थाने में मुकदमा भी दर्ज हो गया। अब इस एफआईआर को लेकर भी एक बहस छिड़ उठी है कि जिस एफआईआर को लिखवाने के लिए अंकिता के माता-पिता को आगे रखना चाहिए था वो एफआईआर कैसे पर्यावरणविद अचानक लिखवाने के लिए डीजीपी को पत्र दे आये और उसके बाद कथित वीआईपी के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज हो गया?
उत्तराखण्ड में तीन साल से अंकिता भंडारी हत्याकांड में कथित वीआईपी को लेकर एक बडा भूचाल मचता रहा है और यह बहस चलती रही है कि आखिर उस वीआईपी के चेहरे से पर्दा क्यों नहीं उठाया जाता जिसके चलते हत्यारों ने अंकिता को मौत की नींद सुला दिया था? अंकिता हत्याकांड के तीन गुनाहगारों को न्यायालय ने आजीवन कारावास दे दिया लेकिन अंकिता के माता-पिता का दर्द आज भी जस का तस है कि वो चीआईपी आखिर कहां है जिसके कारण हत्यारों ने उसकी बेटी को मौत की नींद सुला दिया था। गुनाहगारों को आजीवन कारावास हुआ तो मामला शांत हो गया लेकिन अचानक भाजपा के पूर्व विधायक सुरेश राठौर की कथित पत्नी उर्मिला सनावर ने सोशल मीडिया पर आकर कथित वीआईपी के नाम का खुलासा कर पहाड से लेकर मैदान तक में एक बार फिर अंकिता भंडारी हत्याकांड की चिंगारी सुलगा दी?
कथित वीआईपी का नाम सामने आने के बाद से ही कांग्रेस, उक्रांद, महिला मंच से लेकर कुछ संगठन कथित वीआईपी को सलाखों के पीछे पहुंचाने के लिए मामले की जांच सीबीआई से कराने और जांच सुप्रीम कोर्ट जज की देखरेख में कराने का जो ऐलान किया हुआ है उससे सरकार कहीं न कहीं बेचैन नजर आ रहे थी और आखिरकार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मामले की जांच सीबीआई से कराये जाने की संस्तुति का ऐलान करके एक मास्टर स्ट्रोक खेला था। हालांकि अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने के लिए आगे आने वाली कांग्रेस व सभी संगठन एक राय होकर यह कह रहे हैं कि मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के जज की देखरेख में सीबीआई करेगी तो ही वह इस जांच पर अपना विश्वास दिखायेंगे। मुख्यमंत्री ने इस मामले की जांच सीबीआई से कराने का ऐलान किया तो कल अचानक पदमश्री अनिल जोशी ने राज्य के डीजीपी को एक पत्र दिया जिसमें कहा गया कि वर्तमान में चल रही मीडिया रिपोर्टस, सोशल मीडिया पर चल रहे ऑडियो, वीडियो एवं प्रकरण के सम्बन्ध में आमजन के मध्य चल रही चर्चाओं में अंकिता भंडारी हत्याकांड में कुछ अज्ञात व्यक्तियों जिन्हें वीआईपी के रूप में संदर्भित किया जा रहा है, के विरूद्व एक स्वतंत्र अपराध में संलिप्त होने का आरोप लगाया जा रहा है। यद्यपि, अंकिता भंडारी हत्याकांड में संलिप्त अपराधियों को सजा हो चुकी है, तथापि सोशल मीडिया आदि में ऐसा कहा जा रहा है कि प्रकरण में कतिपय साक्ष्यों को छुपाया और नष्ट किया गया है। अतः वीआईपी कहे जा रहे किसी अज्ञात व्यक्ति, व्यक्तियों से सम्बन्धित इस स्वतंत्र अपराध की जांच किया जाना पूर्ण न्याय सुनिश्चित किये जाने हेतु आवश्यक है। चूंकि यह सम्पूर्ण प्रकरण अज्ञात वीआईपी से सम्बन्धित है, अतः इसके तथ्यों को उजागर करने के लिए एक पृथक एवं स्वतंत्र निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है। अतः मै आपसे अनुरोध करता हंू कि इस शिकायत को एफआईआर के रूप में पंजीकृत करें एवं निष्पक्ष जांच एजेंसी से जांच करायें।
इस मामले में एफआईआर पदमश्री द्वारा कराये जाने पर एक बार फिर नहीं बहस छिडने की आशंका प्रबल हो गई है। सवाल तैर रहे हैं कि सीबीआई को जांच देने से पहले एक एफआईआर हो गई, जो देहरादून में बसंत विहार थाने मे हुई, वो भी पदमश्री अनिल जोशी की तहरीर पर। सवाल खडे हो रहे हैं कि जोशी अंकिता भंडारी के मां-बाप, भाई-बहन के किसी भी रिश्ते मे नहीं हैं। सवाल खडा हो रहा है कि जब सीबीआई जांच अंकिता के माता-पिता के कहने पर हुई, तो फिर मुकदमे के लिए तहरीर पदमश्री ने कैसे दे दी? सवाल यह भी खडे होंगे कि आखिर जोशी को अचानक कैसे इस मामले में एफआईआर कराने के लिए आगे आना पडा जबकि उसके माता-पिता तो चंद दिन पूर्व ही मुख्यमंत्री से मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज की देखरेख में सीबीआई से कराने के लिए पत्र दे गये थे? सवाल खडा हो रहा है कि अगर अंकिता के माता-पिता की तहरीर पर मुकदमा कायम होता तो उनके हाथ में इस लडाई को लडने का पूरा अधिकार रहता? हालांकि अब बहस चल रही है कि न तो यह केस उनका है, न वो पैरवी उनकी? सबसे अहम सवाल यह भी है कि अंकिता भंडारी हत्याकांड में जिस पदमश्री ने आज इस मामले मे कोई आवाज नहीं उठाई वह अचानक कैसे मुकदमा दर्ज कराने के लिए डीजीपी की चौखट पर पहुंच गये?

