कांग्रेसी नेताओं को बेचैन कर गये हरक
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं की जुबान फिसलने से उनकी राजनीति पर जो संकट खडा हुआ था वह किसी से छिपा नहीं है और इसी के चलते उत्तराखण्ड के अन्दर सभी दलों के राजनेता नापतोल करके अपने शब्द बाण चलाने में ही विश्वास रख रहे हैं लेकिन कांग्रेसी नेता हरक के बिगडे बोल से सिक्ख समुदाय में जो बडा आक्रोश पनपा और राजधानी से लेकर सभी जनपदों में एक बडी नाराजगी का आलम सडकों पर दिखाई दिया उसने कहीं न कहीं कांग्रेस की चुनावी रफ्तार पर ब्रेक लगाकर उसे थाम दिया है। हालांकि हरक की माफी के बाद यह आक्रोश अब खामोश हो चला है लेकिन जिस तरह से हरक सिंह रावत आये दिन सरकार और उसके नेताओं को अपने निशाने पर लेने के लिए मीडिया के सामने कुछ भी बोलने के लिए अगली पक्ति में खडे हुये नजर आ रहे हैं उससे कांग्रेस के अधिकांश दिग्गज राजनेता बेचैन नजर आ रहे हैं कि आखिर हरक सिंह रावत इतनी तेज रेस क्यों लगा रहे हैं जबकि अभी चुनाव में काफी समय बचा हुआ है।
पंद्रहवीं सदी के महान संत, कवि और समाज सुधारक कबीरदास (1398-1518 ईस्वी) जी ने ऐसे ही नहीं इस दोहे की रचना की होगी।
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप
इसका अर्थ है कि न तो बहुत ज्यादा बोलना सही है और न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही अच्छा है। बहुत ज्यादा बोलने से नुकसान हो सकता है, और जरूरत के समय चुप रहने से भी नुकसान हो सकता है।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप इसी तरह, बहुत ज्यादा बारिश से बाढ़ आ जाती है, जो अच्छी नहीं है। ठीक उसी तरह, बहुत ज्यादा धूप से सूखा पड़ जाता है, जो हानिकारक है। यह दोहा हमें सिखाता है कि जीवन में किसी भी चीज में अत्यधिकता हानिकारक हो सकती है और संतुलन बनाए रखना ही सबसे अच्छा है। इस समय कबीरदास का यह दोहा कांग्रेस के चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हरक सिंह रावत पर सटीक बैठ रहा है। वकीलों के प्रदर्शन में सिख समुदाय पर अवांछित टिप्पणी के बाद हरक सिंह के पुतले जल गए। हरक सिंह ने सिख समुदाय से माफी भी मांग ली है लेकिन विवाद जारी है।
हरक ने सिख समुदाय पर अनर्गल टिप्पणी की। मौके पर मौजूद सिख वकील ने तत्काल विरोध दर्ज कराया। कांग्रेस नेता हरक सिंह ने तत्काल माफी मांग ली और हरक के इस बिगडे बोल से कांग्रेस की चुनावी रफ्तार कहीं न कहीं थम गई है। जुबान से निकले हरक के तीर ने सिख समेत अन्य समुदायों को घायल कर दिया। शनिवार को पुतला दहन व नारेबाजी जारी रही। सिख समुदाय (सभी नहीं )की मौजूदगी में हुई एक बैठक में हरक को माफी देने का वीडियो भी वॉयरल हुआ। लेकिन विरोध अब भी जारी है। दरअसल, चुनाव प्रबन्धन समिति के अध्यक्ष बनने के बाद हरक सिंह के सीने में दबा वर्षों पुराना लावा फुट पड़ा। उपनल कर्मी, वकीलों व अन्य प्रदर्शनों में समर्थन देने पहुंचे हरक सिंह ने भाजपा के सभी बड़े नेताओं से जुड़ी वर्षों पुरानी बातों को रोचक अंदाज में पेश करना शुरू कर दिया।
हरक के बोल उत्तराखण्ड के अलावा देश भर में चर्चा का विषय बन गए। उनके वीडियो धड़ाधड़ वॉयरल किये जाने लगे। हरक सिंह की जुबान की तेज पकड़ती रफ्तार ने नेताओं से जुड़े कई पुराने राज भी खोल दिए। हंसी ठट्टा भी शुरू हो गया। हरक सिंह ने विशेषकर पूर्व सीएम निशंक,त्रिवेंद्र व तीरथ से जुड़े मामलों को अपने अंदाज में पेश किया। उन्होंने सीएम, स्पीकर ऋतु खण्डूड़ी, मंत्री सतपाल महाराज,धन सिंह रावत, गणेश जोशी, सांसद अजय भट्ट,विधायक विनोद चमोली समेत अन्य भाजपा नेताओं पर किए अपने ‘अहसान’ व उनसे जुड़े ‘राज’ खोलकर खूब सुर्खियां बटोरी। प्रदेश की जनता हर रोज नए बयान का इंतजार करने लगी। हरक की बुलेट ट्रेन की स्पीड के आगे भाजपा के नेता विशेष पलटवार तो नहीं कर पाए। उधर, कांग्रेस के अंदर भी 56 छुरी की तरह चल रही हरक की जुबान पर भी दबी-खुली जुबान पर मंथन होने लगा। अन्य नेताओं से मीडिया का फोकस हटकर हरक पर ही केंद्रित हो गया।
बीते 25 साल में हरक ने जनता को ढकी छुपी सच्चाई से भी रूबरू कराया। नतीजतन, राजनीतिक गलियारों में हरक सिंह की डिमांड रातों रात बढ़ गयी। एक पल को कांग्रेस के अन्य बड़े नेताओं का आभामंडल निस्तेज होता नजर आया। वैसे भी हर चीज की अति भी कब तक चलती। और एक दिन हरक की स्पीड पकड़ चुकी जुबान नियंत्रण नहीं रख पाई। और लड़खड़ा गयी। हरक ने तुरन्त इमरजेंसी ब्रेक लगाए। लेकिन दुर्घटना को नहीं टाल सके। सिख समुदाय ने हरक के बोल पर सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया। भाजपा से जुड़े सिख नेता बलजीत सोनी भी मैदान में उतर गए। यही नहीं,कांग्रेस से जुड़े सिख नेताओं ने भी हाईकमान से कार्रवाई की मांग की। यही नहीं, 1984 के दंगे की यादें भी ताजा हो गयी। कहा जाने लगा कि कांग्रेस सिख समुदाय की विरोधी रही है। मामला फुलटुस पॉलिटिकल हो गया। हरक अपनी ही बिगड़ी जुबान में फंस गए।
गौरतलव है कि फिसली जुबान की वजह से ही तीरथ सिंह रावत व प्रेमचंद अग्रवाल की कुर्सी असमय ही चली गयी। कई अन्य नेता भी अपनी फिसलती जुबान में फंसे। तभी तो कहते हैं ..जुबान संभाल के.. सीएम बनने के बाद पुष्कर सिंह धामी ने अपने तोल-मोल के बोल से फिलहाल मीडिया को कोई मौका नहीं दिया। इधर, कांग्रेस हाईकमान के अलावा हरदा, गोदियाल व प्रीतम सिंह भी इस नुकसानदायक हरक -सिख एपिसोड से सकते में है? कल की हरदा की माल्टा पार्टी में भी सिख समुदाय की नाराजगी की कानाफूसी होती रही। 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा पर हमलावर हो चुके हरक सिंह की रफ्तार इस ब्रेक के बाद भी कितनी स्पीड पकड़ती है,यह देखना भी कम दिलचस्प नहीं होगा।

