रघुनाथ दहाडे़ः नाकाम मंत्री दो इस्तीफा

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सहकारिता मंत्री मस्त और कर्मचारी रो रहे खून के आंसू
न्यायालय में ही सबकुछ होना है तो मंत्री की क्या जरूरत
विकासनगर(संवाददाता)। मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड को एक नई उडान पर ले जाने के लिए चार साल से रात-दिन एक किये हुये हैं और वह राज्य के सभी अफसरों को दो टूक संदेश दे चुके हैं कि सरकारी फाइलों को रोका न जाये और यह फाइलें तेजी के साथ आगे बढाई जायें जिससे विकास का पहिया न थमे। मुख्यमंत्री की विकास को लेकर दिखती आ रही उडान आवाम के मन में एक नई ऊर्जा भर रहा है तो वहीं सरकार के कुछ मंत्रियों की कार्यशैली पर विपक्ष लगातार हमले बोल रहा है और सवाल खडे कर रहा है कि जब मंत्री सरकारी फाइलों को आगे बढाने के लिए खामोश हैं तो राज्य में विकास की बातें सिर्फ हवा-हवाई ही नजर आयेंगी। जन संघर्ष मोर्चा ने एक बार फिर दहाड लगाते हुए कहा है कि सहकारिता मंत्री मस्त हैं और उनके महकमे के कर्मचारी खून के आंसू रो रहे हैं इसलिए नाकाम मंत्री को इस्तीफा देना चाहिए। मोर्चा अध्यक्ष ने मंत्री को कटघरे मे खडा करते हुए कहा कि सातवे वेतनमान एवं विभागीय ढांचे की पत्रावली चार साल से शासन में धूल फांक रही हैं और मंत्री को इससे कोई लेनादेना नहीं रह गया है। मोर्चा अध्यक्ष ने यहां तक अल्टीमेटम दे दिया कि अगर जरूरत पडी तो आने वाली दिनों में मंत्री के पुतले की शव यात्रा सडकों पर निकाल कर यह संदेश देंगे कि सहकारिता मंत्री खामोश हैं।
जन संघर्ष मोर्चा अध्यक्ष एवं उत्तराखंड राज्य भंडारागार निगम कर्मचारी संगठन के संरक्षक रघुनाथ सिंह नेगी ने पत्रकारों से वार्ता करते हुए कहा कि भंडारागार निगम के कार्मिकों को सातवें वेतनमान का लाभ प्रदान किए जाने के मामले में चार साल से अधिक समय से पत्रावली शासन में धूल फांक रही है तथा इसी प्रकार विभागीय ढांचे से संबंधित पत्रावली भी रद्दी का ढेर बनने की और अग्रसर है, लेकिन विभागीय मंत्री धन सिंह रावत गहरी निंद्रा में हैं। आलम यह है कि मंत्री सिर्फ और सिर्फ अपने निजी हित साधने में लगे हैं तथा इन कार्मिकों के हितों से इनका कोई लेना-देना नहीं है। सरकार अब आठवें वेतनमान की बात कर रही है, लेकिन यहां तो मंत्री सातवें वेतनमान का लाभ भी नहीं दिला पाये।
नेगी ने कहा कि सातवें वेतनमान के मामले में कर्मचारियों को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी तथा इसी प्रकार विभागीय ढांचे में परिवर्तन, पद सृजन व अन्य मामले में भी कार्मिक न्यायालय की शरण में जा रहे हैं, ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब हर काम न्यायालय से ही होना है तो फिर विभागीय मंत्री की आवश्यकता क्या है। प्रश्न यह उठता है कि क्या मंत्री कभी अपने विभाग के कार्यों, कार्मिकों की पीड़ा, कार्यों में प्रगति व विभागीय हितों के बारे में मंथन करते हैं ! कर्मचारी अपने परिवार का गुर्जर बसर कैसे कर रहे हैं, मंत्री को इससे कोई लेना देना नही है। यही हाल अन्य विभागों में भी है, जो इनके पास हैं। आखिर जो लाखों रुपया इनके ऐशो-आराम में खर्च हो रहा है, उसका क्या औचित्य है ! जब किसी को न्याय ही नहीं दिला पा रहे हैं तो घर बैठना ही बेहतर होगा। मोर्चा सहकारिता मंत्री से मांग करता है कि अगर विभाग नहीं संभाल पा रहे हो तो इस्तीफा देकर इस प्रदेश पर एहसान क्यों नहीं करते ! अगर जरूरत पड़ी तो सहकारिता मंत्री के पुतले की शव-यात्रा बहुत जल्दी निकली जाएगी। पत्रकार वार्ता में मोर्चा महासचिव आकाश पंवार व प्रवीण शर्मा पिन्नी मौजूद थे।

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