‘लुभावनी’ योजनाओं से कहीं वंचित न रहे पहाड़ की नारी शक्ति
डबल इंजन के ट्रंपकार्ड का लाभ क्या उत्तराखण्ड को मिलेगा?
अमन वर्मा
देहरादून। पिछले लोेकसभा चुनाव में भाजपा ने पूरे देश में एक नारा दिया था, ‘‘अबकी बार, 400 पार’’। इस नारे को लेकर कई राजनीतिक विशलेषकों ने अपनी-अपनी अलग-अलग राय दी थी। कोई इसे एक साकारात्मक सोच बता रहा था, तो कोई इस नारे को अतिउत्साह पूर्ण कह रहा था। चुनाव परिणाम आने के बाद जब भाजपा के विजय रथ मात्र 240 सीटों पर आकर रूक गया लेकिन इसके बावजूद भाजपा ने अपने घटक दलों के साथ मिलकर केन्द्र एनडीए की मजबूत सरकार बनाई। अपनी गलतियों से सबक सीखकर उन गलतियों को दोबारा न दोहराने के लिए भाजपा को जाना जाता है और इसी का परिणाम है कि लोकसभा चुनाव के बाद हुए कुछ राज्यों जैसे कि महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और हाल ही में संपन्न हुए बिहार के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने गलतियों को न दोहराते हुए इन सभी राज्यों में मजबूत सरकारों का निर्माण किया। इन चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि भाजपा का सबसे ज्यादा फोकस आधी आबादी पर रहा यानि कि नारी शक्ति पर। महिलाओं के लिए लुभावनी योजनाओं और आर्थिक रूप से उन्हें मजबूत करने का भाजपा का दांव सफल रहा। अगले साल पश्चिम बंगाल और असम जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं और उसक अगले साल उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में। बात करें उत्तराखण्ड के सीनारियों की तो यहां तो ऐसा लग रहा है कि भाजपा के समक्ष कोई विपक्षी दल मजबूती के साथ खड़ा ही नहीं दिखाई दे रहा है। उत्तराखण्ड कांग्रेस में हाईकमान ने भले ही नेतृत्व परिवर्तन कर दिया हो लेकिन पार्टी के अंदर का अंतर्कलह फिर भी शांत होता नजर नहीं आ रहा है। कांग्रेस मुख्य क्षत्रपों के बीच टकराव साफ देखने को मिल है। इन बीच चल रहे वाकयुद्ध में व्यंग्यों के तीक्षण बाण छोड़े जा रहे हैं। माना जा रहा है कि कांग्रेस का यह अंतर्कलह आधी आबादी की दुश्मन बन सकता है और सरकार की लुभावनी योजनाओं से उत्तराखण्ड की नारी शक्ति वंचित भी रह सकती है? महिलाओं के लिए विशेष योजनाओं को घोषित करना डबल इंजन सरकारों के लिए एक ट्रंपकार्ड रहा है। अब सवाल यह उठता है कि क्या इस ट्रंपकार्ड का लाभ उत्तराखण्ड को मिलेगा?
उत्तराखण्ड में डबल इंजन की सरकार का दूसरा कार्यकाल चल रहा है जोकि एक ऐतिहासिक वाक्या है। जहां पांच साल सरकार चलाने के बाद कोई भी राजनीतिक दल एंटी-इंकम्बेंसी का शिकार हो जाती है, वहीं कई भाजपा शासित राज्यों में प्रो-इंकम्बेंसी की लहर देखने को मिल रही है और इन्हीं राज्यों की सूची में उत्तराखण्ड भी शुमार है। उत्तराखण्ड में पिछले कुछ समय से यह देखने को मिल रहा है कि भाजपा के समक्ष कोई भी विपक्षी दल मजबूती से साथ खड़ा नहीं हो पा रहा है। हालांकि कांग्रेस कोशिश तो बहुत करती है लेकिन उनके सामने दो सबसे बड़ी दिक्कतें आ जाता है। पहली तो राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की हरदिल अजीज वाली छवि और दूसरी उनकी खुद की पार्टी में लगातार जल रही अंतर्कलह की आग। सुनने में आया है कि कांग्रेस हाईकमान ने इस अंतर्कलह को शांत करने के लिए पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन किया और एक बार फिर प्रदेश कांग्रेस की कमान पूर्व विधायक गणेश गोदियाल को सौंपी। वहीं, पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत को चुनाव प्रबंधन समिति और विधायक व पूर्व नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह को चुनाव प्रचार समिति की कमान दी गई है। हाईकमान के इस फैसले ने उत्तराखण्ड में एक नई बहस को जन्म दे दिया है और अब बात फिर से पार्टी के अंदर ने वर्चस्व की जंग शुरू हो गई है। हरक सिंह रावत के फ्यूज कारतूसों वाले बयान ने जहां उत्तराखण्ड कांग्रेस में हलचल मचा रखी है, वहीं हरीश रावत के विष पुरुष वाले बयान ने भी पार्टी हाईकमान को अपने फैसले पर सोचने पर जरूर मजबूर किया होगा।
राजनीति के जानकारों का मानना है कि उत्तराखण्ड कांग्रेस में जो यह अंतर्कलह चल रहा है उसका खामियाजा पहाड़ की नारी शक्ति को भुगतना पड़ सकता है। इस संदर्भ में उनका तर्क यह है कि जब उत्तराखड कांग्रेस में चल रही यह उठापठक कहीं न कहीं आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में एक रूप से भाजपा का वॉकओवर देने का काम कर सकती है। यदि ऐसा होता है कि यह भी संभव है कि भाजपा हाईकमान अपने स्पेशल ट्रंपकार्ड यानि कि महिलाओं के लिए लुभावनी योजनाएं और आर्थिक रूप से उन्हें मजबूत बनाने की घोषणा पर दांव संभवतः नहीं लगाएगी? अगर ऐसा हुआ तो यह उत्तराखण्ड की नारी शक्ति के लिए अच्छी खबर नहीं होगी। हालांकि चुनाव में अभी लगभग डेढ़ वर्ष का समय बचा है, तो देखने वाली बात यह होगी कि क्या कांग्रेस अपने अंतर्कलह को शांत करके मजबूती के साथ चुनाव में कूदेगी या नहीं?

