अब सिर्फ ‘गणेश’ का सहारा

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गोदियाल पर कांग्रेस ने फिर से खेला दांव
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में राजनीतिक आपदा से झूझ रही कांग्रेस पिछले लंबे समय से एक सहारे को खोज रही थी। लगातार चुनावों में मिल रही हार से ऐसा लगने लगा था कि कांग्रेस पहाड़ी राज्य मंे निष्क्रिय होती जा रही है। पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल भी धीरे-धीरे टूटता हुआ नजर आ रहा था। ऐसी असमंजस की स्थिति में कांग्रेस हाईकमान ने कुछ ऐसा कदम उठाया है जिसे ‘नई बोतल में पुरानी शराब’ की संज्ञा देना गलत नहीं होगा। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने कल अपने नए प्रदेश अध्यक्षों की सूची जारी की, जिसमें उत्तराखण्ड के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में एक बार फिर गढ़वाल क्षेत्र के दिग्गज कांग्रेसी नेता गणेश गोदियाल को बागडोर सौंपी है। माना जा रहा है कि आगामी 2027 के विधानसभा को मद्देनजर रखते हुए कांग्रेस ने यह निर्णय लिया है क्योंकि उसका मानना है कि उत्तराखण्ड कांग्रेस को अब सिर्फ गणेश गोदियाल का ही सहारा है। राजनीतिक आपदा के भंवर में फंसी उत्तराखण्ड कांग्रेस को गणेश का यह सहारा कितना पार लगा पाएगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन गणेश गोदियाल पर खेले गए इस दांव ने यह बात तो साफ कर दी है कि प्रदेश कांग्रेस के पास इतने वर्षों के बाद भी कोई ऐसा चेहरा नहीं है जिसे कि फ्रेश चेहरा कहा जा सके। ऐसा नहीं है कि कांगेेस में काबिल नेताओं की कमी हो लेकिन बावजूद उसके उनको संभवतः तरजीह नहीं मिल पाती और इसका प्रमुख कारण यह माना जाता है कि कांग्रेस गढ़वाल और कुमाऊं मंडल में संतुलन बनाने की चेष्टा करने की जुगत में ऐसे कदम उठाती है। जहां पिछली बार कुमाऊं क्षेत्र से आने वाले करन सिंह माहरा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था वहीं इस बार एक बार फिर से गढ़वाल से आने वाले गणेश गोदियाल को यह पद दिया गया है। अब जबकि कांग्रेस ने गणेश गोदियाल पर दांव खेल ही दिया है तो यह सवाल उठने भी शुरू हो गए है कि नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष क्या राज्य के अंदर पार्टी में नई ऊर्जा भर पाएंगे या फिर आगामी चुनाव में भी कांग्रेस का हश्र ठीक वैसा ही होगा जैसा की वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में हुआ था?
अंतर्कलह यदि किसी राजनीतिक पार्टी में घर कर जाए तो उस पार्टी के उत्थान का अंदाजा लगाया बहुत मुश्किल हो जाता है। उत्तराखण्ड कांग्रेस में यह अंतर्कलह पिछले लंबे समय से अलग-अलग अंतराल में देखने को मिलता रहा है। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष करन सिंह माहरा की ताजपोशी के बाद भी यह अंतर्कलह शांत न हुआ और पार्टी के कई दिग्गज नेताओं ने संगठन में बड़े बदलाव के राग छेड़ दिए थे। अंतर्कलह के मुख्य कारणों में से क्षेत्रवाद एक बड़ी समस्या बनता रहा है। गढ़वाल मंडल और कुमाऊं मंडल के बीच का टकराव कांग्रेस में हमेशा से देखने को मिला है। हालांकि कांग्रेस हाईकमान का मानना है कि क्षेत्रवाद की समस्या को हल करने के लिए करन माहरा की जगह गणेश गोदियाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है और करन को संगठन कुछ और मजबूत जिम्मेदारी दी गई है। जानकारों का मानना है कि कांग्रेस हाईकमान के इस निर्णय से ज्यादा कुछ बदलाव देखने को नहीं मिलेगा। बता दें कि हाल ही में संपन्न हुआ पंचायत चुनावों में राज्य अन्य जिलों में कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन भले ही उतार चढ़ाव वाला रहा हो लेकिन राजधानी देहरादून में कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत बेहतर रहा और जिसका नतीजा यह हुआ कि राजधानी की जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर कांग्रेस ने विजयश्री प्राप्त की। इस सफलता के दौरान पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष करन सिंह माहरा थे। ऐसी सफलता के बाद करन माहरा को हटाना पार्टी में भी अधिकांश लोगो के गलेे नहीं उतर रही है। वहीं लोगों का यह भी कहना है कि गणेश गोदियाल को पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के करीबियों में शुमार किया जाता है और संभवतः यहीं कारण है कि कांग्रेस हाईकमान ने गोदियाल पर दांव खेला है क्योंकि दस जनपथ में हरीश रावत की पैंठ काफी तगड़ी हैं। बताया यह भी जा रहा है कि हरीश रावत लंबे समय से कांग्रेस में ब्राह्मण चेहरे को प्रदेश की कमान देने के पक्ष में थे और गोदियाल को कमान मिलने के बाद उनके इस पक्ष पर मुहर भी लग गई। अब राजनीति के गलियारों में यह चर्चाएं उठनी शुरू हो गई है कि जो दांव कांग्रेस हाईकमान ने गणेश गोदियाल पर खेला है क्या वह दांव सफल हो पाएगा क्योंकि ऐसा ही दांव वर्ष 2022 के विधानसभा से पूर्व भी उन पर खेला गया था और सफल नहीं हो पाया था। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या हरीश रावत ने हाईकमान के सामनेे अपने प्रभुत्व का इस्तेमाल करते हुए गणेश को यह पद दिलाया है ताकि वह यह साबित कर सके कि प्रदेश कांग्रेस में और साथ ही साथ कुमाऊं मंडल में वह आज भी सबसे बड़ा चेहरा हैं?

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