तिवारी की राह पर पुष्कर

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उद्योग खडे करने में धामी की धमक
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में उद्योगों का साम्राज्य खडा करने के लिए आज भी राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी को याद किया जाता है तो वहीं उन्हीं की राह पर आगे बढते हुए मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड के अन्दर उद्योग लगाने के जिस विजन को अपनाकर आगे बढ रहे हैं उसके चलते आज राज्य के कुछ जिलों में उद्योगों का इतना बडा किला खडा होता जा रहा है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। देश के प्रधानमंत्री के विजन को धरातल पर उतारने के लिए मुख्यमंत्री रात-दिन एक करते हुए राज्य के अन्दर छोटे उद्योग से लेकर बडे उद्योग तक स्थिापित कराने के जिस एजेंडे पर आगे बढ रहे हैं उसको देखते हुए आज राज्य की युवा पीढी और बेरोजगार यह समझ चुके हैं कि उत्तराखण्ड के अन्दर विकास की नई बयार बहाने के लिए मुख्यमंत्री तेजी के साथ आगे बढ रहे हैं।
उत्तराखंड के अंदर विकास की नई अलख जगाने वाले युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य के बेरोजगार युवाओं को रोजगार का बडा तोहफा देने की दिशा में जिस तरह से इंवेस्टर्स समिट में आये उद्योगपतियों को उत्तराखंड में उद्योग लगाने के लिए आमंत्रित किया था और उन्हें हर सुविधा देने का वचन देकर उनके दिलों में यह संदेश पहुंचा दिया था कि सरकार उनके साथ खडी है इसके चलते उत्तराखंड के अंदर बडे बडे उद्योगपति उद्योग लगाने के लिए आगे आने लगे है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सबसे बडी चिंता यह है कि वह पहाडों में उद्योगों का बडा किला खडा करें जिससे की पहाड के युवा पलायन करके दूसरे राज्यों में न जा पाये। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड के अंदर बडे बडे उद्योग लगाने के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी साथ लिया है और उसी के चलते आने वाले समय में उत्तराखंड के पहाड और मैदान में उद्योगों का बडा अंबार लगेगा ऐसी उम्मीद राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को है। कुल मिलाकर कहा जाये तो उत्तराखंड के अंदर उद्योग लगाने के लिए जिस तरह से स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी एक बडे मिशन के साथ काम करते हुए दिखाई दिये थे उसी राह पर अब पुष्कर सिंह धामी भी आगे बढते जा रहे है जिसे देखकर साफ आभास हो रहा है कि आने वाला कल उत्तराखंड का होगा।
उत्तराखंड के एक मात्र पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी ने अपने शासनकाल मंे उद्योगों का जो किला खडा किया था वह किसी से छुपा नहीं है और राज्य के युवा आज भी नारायण दत्त तिवारी को विकास पुरूष के नाम से पुकारते है क्योंकि उन्होंने उद्योगों को लगाने की दिशा में जितना बडा काम किया था उसी का परिणाम है कि आज राज्य के कुछ मैदानी जिलों में उद्योगों का अंबार लगा हुआ है। नारायण दत्त तिवारी के बाद जितने भी पूर्व मुख्यमंत्री आये उन्होंने राज्य के अंदर उद्योग लगाने की दिशा में कोई पहल नहीं की और अगर कुछ बडे उद्योगपतियों ने राज्य में अपने उद्योग लगाने की मंशा पर काम किया तो चंद पूर्व मुख्यमंत्रियों के साथ जुडे अफसरों ने उनके साथ जो खेल खेलने का प्लान बनाया था वह प्लान उद्योगपतियों को रास नहीं आया और उन्होंने उद्योग लगाने से अपने कदम पीछे खींच लिये थे। वहीं उत्तराखंड के युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी उद्योग लगाने में तिवारी की राह पर तेजी के साथ चलते हुए नजर आ रहे है जिससे उत्तराखंड की युवा पीढी को विश्वास हो चला है कि मुख्यमंत्री के कार्यकाल में अब पहाडों पर भी उद्योगों का साम्राज्य दिखाई देगा जिसके लिए आये दिन मुख्यमंत्री चिंतित नजर आते है।
उत्तराखंड में विकास पुरूष के नाम जाने जानने वाले स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री की कमान मिली थी तो उन्होंने उधम सिंह नगर, हरिद्वार और देहरादून में उद्योगों का बडा अंबार खडा करने की दिशा में बडी पहल की थी और उसी के चलते वहां हजारों उद्योगों की स्थापना हुई थी जिससे की उस समय मैदानी जिलों से पलायन पर ब्रेक लग गया था और उत्तराखंड के हजारों बेरोजगार व आवाम को इन उद्योगों में नौकरी मिली और वह अपने परिवार का पालन पोषण करके नारायण दत्त तिवारी को उत्तराखंड का विकास पुरूष मानते रहे। तिवारी शासनकाल के बाद राज्य में कई पूर्व मुख्यमंत्री सत्ता पर काबिज रहे लेकिन किसी ने भी उत्तराखंड के मैदान और पहाडों में उद्योग लगाने की दिशा में कोई बडी पहल नहीं की जिससे राज्य के अंदर से युवाओं का पलायन होता चला गया और पहाडों में तो गांवों के गांव पलायन की वजर से खाली होती चले गये। पहाडी इलाकों में रहने वाले परिवारों के मन में यह दर्द था कि सरकारें पहाडों में उद्योग लगाने के लिए गंभीर होती तो उनके अपने उन्हें छोडकर दूसरे राज्यों में नौकरी करने के लिए न जाते। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने राज्य में इंवेस्टर्स समिट कराकर दावा किया था कि हजारों करोड का उद्योग लगायेंगें और इसके लिए उद्योगपतियों के साथ एमओयू भी साईन हुए थे लेकिन सवाल आज भी यही खडा है कि आखिर ऐसा क्या हुआ था की जिन उद्योगपतियों ने उत्तराखंड में उद्योग लगाने का इरादा दिखाया था वह अपने इरादों से पीछे हट गये और त्रिवेन्द्र सरकार पर हमेशा उंगुलियां उठती रही की आखिर उद्योगों को लगाने के लिए एमओयू पर साईन करने वाले उद्योगपतियों ने उत्तराखंड के अंदर उद्योग लगाने से क्यों इंकार कर दिया था?

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