प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में पत्रकारों की एक लम्बीचौडी फौज ऐसी खडी हो चुकी है जिसका पत्रकारिता से कोई नाता नहीं है लेकिन वह अफसरों और राजनेताओं के सामने जिस अंदाज में अपने आपको ढाले हुये हैं उससे काफी राजनेताओं और अफसरों को यह इल्म हो चुका है कि पत्रकारों की यह फौज उनसे क्या चाहती है? गजब की बात यह है कि होली, दीवाली पर पत्रकारों की एक लम्बी फौज बस इसी जुगत में रहती है कि बस उन्हें कहीं से कोई मिठाई का डिब्बा या शराब की बोतल गिफ्ट में मिल जाये। ऐसे कथित पत्रकारों ने पत्रकारिता जगत को जो दाग लगा रखे हैं उससे आज पत्रकारों की कीमत सिस्टम के कुछ अफसरों और राजनेताओं ने दो बोतल शराब तय कर ली है। यह कोई हवा-हवाई नहीं है बल्कि सच में ऐसा राजधानी में भी सुनने को मिल रहा है और कुछ पत्रकारों को एक महकमे की ओर से संदेश आया कि वह एक शॉप से जाकर दो शराब की बोतलें ले लें। गजब की बात है कि पत्रकारों की कीमत सिस्टम के कुछ अफसरों ने अगर दो बोतल शराब तय कर ली है तो उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज गली-मौहल्ले के सडे सिस्टम में रहने वाले पत्रकारों ने चौथे स्तम्भ की मर्यादा को किस तरह से मिट्टी मे मिला रखा है।
उत्तराखण्ड के अन्दर आज चौथे स्तम्भ पर कोई विश्वास करने को तैयार नहीं है क्योंकि आज के इस दौर में उत्तराखण्ड के हर जनपद में जिस तरह से सैकडों ने अपने आपको चौथे स्तम्भ का धुरंदर मानने का जो शोर मचा रखा है वह यह बताने के लिए काफी है कि अब चौथे स्तम्भ की मर्यादा ऐसे पत्रकारों ने मिट्टी में मिलाकर रख दी है। सैकडो ऐसे कथित पत्रकार है जिनका पत्रकारिता जगत से कोई लेना देना नहीं है और वह जिस अंदाज में एक गिरोह बनाकर सडकों पर आवाम को डराने से लेकर ब्लैकमेलिंग करने का खेल खेलने में जुटे हुये हैं उसकी गूंज हमेशा उत्तराखण्ड के कुछ जनपदों में बडी तेजी के साथ सुनाई देती आ रही है। सवाल खडे होते हैं कि आखिरकार कुकरमुत्तों की तरह पनप रहे यह हवाबाज कथित पत्रकारों पर नकेल लगाने के लिए कौन आगे आयेगा क्योंकि उन्होंने अपनी कीमत एक से दो बोतल शराब की तय कर रखी है और इस शराब को हासिल करने के लिए वह जो-जो हथकंडे अपना सकते हैं वो आये दिन अपनाते हुए नजर आ रहे हैं। आज राज्य के काफी नेताओं और अफसरों को इस बात का इल्म हो चुका है कि चंद बोतलों में बिकने वाले कथित पत्रकारों को वह कभी भी अपने हाथ की कठपुतली बनाकर उनके दम पर किसी का भी चीरहरण करा सकते हैं और ऐसा करते हुए वह लम्बे समय से दिखाई भी दे रहे हैं।
दीपावली पर एक महकमे की ओर से कुछ पत्रकारों को फोन पर कहा गया कि आप शहर की एक दुकान से दो बैगपाइपर की बोतलें ले लें। ऐसा संदेश जब एक पत्रकार के पास आया तो उसने पूछा कि उसका नम्बर किसने दिया है तो उसने बताया कि लिस्ट में उनका नम्बर लिखा हुआ है इसलिए वह उन्हें कॉल कर रहे हैं। पत्रकार ने कॉल करने वाले को दो टूक कहा कि यह शराब की बोतलें किसी भिखारी पत्रकार को वह दे दें जिसे इसकी जरूरत हो। सवाल उठता है कि आखिरकार सिस्टम के वो कौन लोग हैं जो यह तय करने लगे हैं कि पत्रकारों की कीमत शराब की दो बोतल हैं? उत्तराखण्ड के अन्दर आज कुछ राजनेताओं और कुछ अफसरों ने यह मान लिया है कि जिन्हें वह कुछ पैसे और शराब की बोतल देंगे तो वह उनके हाथों की कठपुतली बनकर उनके आगे पीछे नाचेगी और वह इनके जरिए किसी को भी अपना निशाना बनाने में कामयाब हो जायेंगे।

