नासूर है वामपंथ

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लेफ्टिस्ट मानते, ‘वे सरकार से बड़े’
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। देश की राजधानी दिल्ली की एक विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में में कुछ वर्ष पूर्व बड़ी जोरदार नारेबाजी थी। बताया गया था कि यह नारेबाजी कथित रूप से देशविरोधी थी? खबरों से जब परतें हटती गई तो पता चला की नारेबाजी करने वाले वामपंथी छात्र नेता थे। वामपंथ एक नासूर है जोकि दीमक की तरह समाज को धीरे-धीरे खोखला कर देता हैं। देश के विख्यात गीतकार, संगीतकार, पाश्र्वगायक और प्रसिद्ध कवि पीयूष मिश्रा का भी यहीं मानना है। बता दें कि पीयूष मिश्रा, जो कभी वामपंथी विचारधारा से जुड़े थे, अब इसके सबसे मुखर आलोचकों में से एक बन गए हैं, और बताते हैं कि कैसे 2० साल तक इसमें शामिल रहने के कारण उनका निजी जीवन नष्ट हो गया। एक मीडिया हाउस से बातचीत के दौरान उन्होंने अपने इस दु:ख का व्यक्त किया था और बताया था कि इसी वामपंथ विचारधारा की वजह से उन्होंने अपने ही परिवार का एक समय में कितना नुकसान किया था। उत्तराखण्ड में वामपंथी विचारधारा का जनाधार न के बराबर है। बावजूद इसके इस वामपंथी विचारधारा से जुड़ मुठ्ठी भर लोग खुद को इतना बलशाली मानते हैं कि मानो वह राज्य में कितना बड़ा बदलाव ला सकते हैं। कितनी हास्यास्पद बात हैं कि एक ओर तो लेफ्टिस्ट समूह के लोग ज्ञान पेलते फिरते हैं कि सरकार को किस दिशा में काम करना चाहिए और अपने विकास कार्यों का प्रसार किस माध्यम से और किसके द्वारा करना चाहिए और किसके द्वारा नहीं करना चाहिए और वहीं अपनी बिना सिर पैर की विचित्र मांगों को लेकर जब देखो तख्तियां उठाकर हल्ला मचाना शुरू कर देते हैं। तख्तियों के सहारे अपनी राजनीति चमकाने वाले लेफ्टिस्ट खुद को सरकार से बड़ा मानने लगे हैं क्योंकि उनका मानना है कि सरकार में बैठे बड़े मंत्रियों और अधिकारियों से सरकार चलानी ही नहीं आाती। इन वामपंथियों को आज तक यह बात समझ में नहीं आई है कि इस देश में लोकतंत्र है जहां जनता अपनी सरकार खुद चुनती है न कि वामपंथी विचारधारा से। चुनाव लोकसभा का हो या विधानसभा का या फिर किसी निकाय का, हर चुनाव में वामपंथ से जुड़ राजनीतिक दल को उत्तराखण्ड में हमेशा ही मुंह की खानी पड़ी है क्योंकि उत्तराखण्ड की जनता ने यह साफ कर दिया है कि उन्हें अर्बन नक्सल पसंद ही नहीं है।
इतिहास के पन्नों को खंगाला जाए तो यह साफ पता चलता है कि भारत में एक सभय, स्वच्छ और समरसता से पूर्ण समाज का सपना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था। हर बड़े-छोटे को साथ में लेकर चलने की विचारधारा के साथ देश को आगे बढ़ाने के लिए अपना विशेष योगदान देने वाले महात्मा गांधी ने वामपंथ की मूल विचारधारा को हमेशा ही नाकारा था। कल्पना करना भी मुश्किल है कि जब वे परलोक में बैठकर यह दृश्य देखते होंगे कि जिस वामपंथ की विचारधारा को उन्होंने अपने जीवनकाल में हमेशा ही नाकारा था आज उसी वामपंथ की विचारधारा के ध्वजवाहक, उनकी स्मृति में बने पार्क के बाहर हो हल्ला मचा रहे हैं। वामपंथ की विचारधारा कितनी खतरनाक है इस बात अंदाजा इससे ही साफ लग जाता है कि जब पूर्व में नक्सलवादियों द्वारा किए जाने वाले बम ब्लास्ट की चपेट मेें आकर हमारे देश जवान शहीद हो जाते थे और देश की जनता इस दुखद घटना पर शोक व्यक्त करती थी तो यह वामपंथी, नक्सलियों के इस कुकृत्य पर जश्न मनाते थे। पिछले लंबे समय से देश के पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण क्षेत्र तक समाज को दीमक की तरह इन वामपंथियों ने खाने का काम किया है। लेकिन मौजूदा समय में इनका समाज को नष्ट करने यह सपना अब टूटता जा रहा है। देश के कई प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में अपनी वामपंथी विचारधारा को प्रसारित करने में एक समय पर लेफ्टिस्ट खूब सफल हुए थे लेकिन अब हालात बिलकुल अलग हैं। एक समय में रेड कॉरिडोर को स्थापित करने की दिशा में सफल हो रहे वामपंथियों पर अब मौजूदा सरकार ने नकेल कस दी हैं। अपने सपने को टूटता देख बड़े वामपंथियों दिग्गजों से अब रहा नहीं जा रहा है और अब वह सीधा केन्द्र सरकार को निशाना न बनाते हुए राज्य की सरकारों को निशाना बनाने के मिशन में जुट गए हैं।
उत्तराखण्ड की जनता के साथ छल करने के लिए इन वामपंथियों ने ‘झूठ के शरबतÓ से भरी बोतल में ‘सच का स्टीकरÓ लगकर परोसना शुरू कर दिया है। ऐसा करने में इनका साथ चंद लेफ्टिस्ट पत्रकार भी दे रहें हैं, जिन्होंने आज तक अपनी पत्रकारिता के माध्यम से भले ही जनता का कभी भला न किया हो, लेकिन जनहित में ठोस कदम उठाने वाली सरकार के खिलाफ अपनी झूठ की स्याही से भरी कलम चलाने से वह कभी भी पीछे नहीं हटते। लोकतंत्र में ऐसे झूठों के लिए कोई जगह नहीं होती और यह जवाब इन वामपंथियों को और कोई नहंी बल्कि उत्तराखण्ड की जनता ही देते है, जब वहा हर चुनाव में इन वामपंथियों को सिरे से नकार देती है।

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