पच्चीस साल से खलीफा भ्रष्टाचारी खेलते रहे भ्रष्टाचार का खेल!
लोकायुक्त बनाने से क्यों घबराती रहीं हैं सरकारें?
देहरादून(संवाददाता)। उत्तराखण्ड में पच्चीस सालों से भ्रष्टाचारियों की नाक में नकेल डालने का दम भरा जा रहा है लेकिन हैरानी वाली बात है कि इन सालों में सिर्फ भ्रष्टाचार की छोटी-छोटी मछलियां ही विजिलेंस के शिकंजे में सिर्फ इसलिए फंसती चली गई क्योंकि राज्य के विजिलेंस को वो पॉवर नहीं मिली हुई है जिसके चलते वह भ्रष्ट नेताओं और भ्रष्ट अफसरों पर सीधा एक्शन करने के लिए आगे बढ जाये? बडों पर एक्शन लेने के लिए पहले विजिलेंस को शासन से अनुमति लेनी पडेगी और उसके बाद ही बडो पर कोई एक्शन सम्भव है इसलिए आज तक के इतिहास मंे भ्रष्टाचार के बडे-बडे मगरमच्छ बेनामी सम्पत्ति कमाने की जिस रेस में आगे बढे हैं वह किसी से छिपा नहीं है और उन पर कार्यवाही न होने से वह बडे मगरमच्छ आज भी आजादी के साथ धुमते हुए नजर आ रहे हैं जिससे सवाल खडा हो रहा है कि आखिरकार भ्रष्टाचार के इन बडे मगरमच्छो पर फंदा डालने के लिए सरकार कभी राज्य के अन्दर लोकायुक्त का गठन करने का साहस दिखायेगी जिसके चलते भ्रष्टाचार करने वाले बडे मगरमच्छ उनके फंदे में फंस कर उससे बाहर न निकल पायें?
उत्तराखण्ड में देवी-देवताओं के वास हैं और देश विदेश से हर साल लाखों श्रद्धालु देवभूमि के अन्दर सभी धामों में अपनी आस्था दिखाकर वहां माथा टेकते हैं लेकिन पच्चीस साल से उत्तराखण्ड के अन्दर पनपता आ रहा भ्रष्टाचार का रावण मरता हुआ नजर नहीं आ रहा? भ्रष्टाचार के बडे दानव जिस दिन शिकंजे में फसेंगे उस दिन उत्तराखण्ड एक नई पहचान बनाता हुआ दिखाई देगा और जिस उत्तराखण्ड को बनाने की चाहत हजारों आंदोलनकारियों ने अपने मन में पाली थी वह चाहत उनकी पूरी हो जायेगी। उत्तराखण्ड के अन्दर भ्रष्टाचार करने वाले बडे-बडे मगरमच्छों को कैद नहीं किया जा रहा इसलिए आवाम के मन में यही सवाल पनपते आ रहे हैं कि आखिरकार भ्रष्टाचार करने वाले बडे-बडे मगरमच्छ कब तक आजाद धुमते रहेंगे? भ्रष्टाचारियों को पकडने के लिए बनाई गई विजिलेंस के पास बडे-बडे भ्रष्टाचारियों को सीधे पकडने की पॉवर ही नहीं है और इसी के चलते भ्रष्टाचार करने वाले बडे-बडे मगरमच्छ आज भी खुलेआम धूम रहे हैं और छोटे-छोटे भ्रष्टाचारी ही सलाखों के पीछे पहुंच रहे हैं। उत्तराखण्ड के अन्दर एक बहस चली हुई है कि अगर राज्य के अन्दर लोकायुक्त का गठन हो जाये तो पच्चीस सालों से पनप रहे भ्रष्टाचार के रावण का जरूर अंत हो जायेगा? हालांकि मुख्यमंत्री ने अपने शासनकाल में भ्रष्टाचारियों के खिलाफ एक बडा संग्राम शुरू किया हुआ है लेकिन यह भी सच है कि अभी भी भ्रष्टाचार के बडे-बडे मगरमच्छ आजाद हैं?
उत्तराखण्ड को पच्चीस सालों से भ्रष्टाचार के दानव अपनी जकड मंे लिये रहे और उन्होंने 20-20 मैच की तर्ज पर भ्रष्टाचार का जो खेल खेला उससे राज्य की जनता के मन में भ्रष्टाचारियों को लेकर बडा आक्रोश पनपता रहा लेकिन भ्रष्टाचार के रावणों की इस फौज का सामना करने के लिए राज्य की जनता साहस नहीं जुटा पाई और यही कारण रहा कि भ्रष्टाचारी और घोटालेबाजों ने उत्तराखण्ड को दीमक की तरह चाट-चाटकर खोखला करना शुरू किया हुआ है? उत्तराखण्ड को भ्रष्टाचारियों से आजादी दिलाने के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का हंटर चल रहा है लेकिन इसके बावजूद भी भ्रष्टाचारियों के रावणों की फौज इतनी विशाल दिखाई दे रही है कि उस फौज का संहार करने के लिए मुख्यमंत्री को अपना तीसरा नेत्र खोलकर उन पर शिंकजा कसना शुरू कर दिया है। उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने की दिशा में एक ऐसा ऑपरेशन चलाया जा रहा है जिन्हांेने सफेदपोश की आड में भ्रष्टाचार से दौलत कमाने का खेल खेला और उन भ्रष्ट अफसरों को भी आवाम के बीच बेनकाब करने का प्लान तैयार हो गया है। बता दें कि कुछ पूर्व मुख्यमंत्रियांे के कार्यकाल में भ्रष्टाचार और घोटालों का जो तांडव मचाया था उनके चेहरे भी राज्य की जनता के सामने शीशे की तरह साफ हो जायें इसके बाद ही उत्तराखण्ड आदर्श राज्य बनने की राह पर आगे खडा हुआ दिखाई देगा? अराध्य का कार्य सिर्फ जनहित तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि ऐसी असुरी शक्तियों का संहार करना भी होता है न सिर्फ व्यक्ति विशेष के लिए बल्कि जनता के लिए हानिकारक होते है। कामना सिर्फ इतनी ही कर सकते है कि जिस प्रकार से प्रभु श्रीराम ने असुरों का संहार किया था ठीक उसी प्रकार से उत्तराखण्ड की लोकप्रिय मुख्यमंत्री इस राज्य के राजनीतिक असुरों का भी संहार करने के लिए आगे बढना पढ रहा है ताकि जिस विकास पथ पर वे राज्य आगे बढ़ा रहे, उस यात्रा में बाधा न आए।
उल्लेखनीय है कि देश के प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचारमुक्त भारत विजन के लिए मुख्यमंत्री ने भी उत्तराखण्ड के अन्दर भ्रष्टाचारियों और घोटालेबाजों का तीन साल से संहार करने का जो सिलसिला शुरू कर रखा है उससे उत्तराखण्ड के अन्दर अब ऐसे शैतानों को पुष्कर का डर इतना विशाल बैठ गया है कि वह भ्रष्टाचार करने से तौबा करने लगे हैं क्यांेकि उन्हें इस बात का इल्म हो चुका है कि मुख्यमंत्री तो पारदर्शिता के साथ ही सरकार चलायेंगे ऐसे में उनके भ्रष्टाचार करने के मनसूबे उनके राज मंे तो अब पूरे नहीं हो पायेंगे। हालांकि राज्य के अन्दर यह बहस भी चलती आ रही है कि राज्य बनने के बाद से ही भ्रष्टाचार करने वाले बडे-बडे मगरमच्छ इतने पॉवरफुल हैं कि उन पर फंदा डालने के लिए सरकारें भी दबंगता के साथ आगे नहीं बढ पाई और इसी के चलते राज्य के अन्दर हर सरकार के कार्यकाल में एक सशक्त लोकायुक्त के गठन को लेकर आवाज उठती आ रही है लेकिन हैरानी वाली बात है कि सरकारें आखिरकार लोकायुक्त के नाम से ही क्यों घबरा रही है जिसके चलते उसका गठन करने पर हमेशा सरकार खामोशी साध लेती है?

