कुछ एक्स सीएम की कुर्सी खा गये सलाहकार
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड़ का इतिहास रहा है कि जब भी सरकारों के मुखिया ने अपने शासनकाल को बेहतर चलाने के लिए कुछ सलाहकारों को अपनी टीम में शामिल किया तो उन्हें यह भरोसा रहा कि उनके सलाहकार उन्हें सही सलाह देकर सरकार को सही दिशा में ले जाने के लिए आगे बढ़ेंगे। हालांकि राज्य के कुछ एक्स सीएम के चाटुकार सलाहकारों और चंद ओएसडी ने अपने हितों के लिए ऐसा खतरनाक खेल खेला था कि उनके आकाओं की कुर्सी कब उनके हाथों से फिसल गई यह उन्हें भी पता नहीं चल पाया और उसके बाद वह मुख्यमंत्री बनने के लिए हमेशा तडफडाते रहे लेकिन दुबारा मुख्यमंत्री बनने की उनकी चाहत कभी भी पूरी नहीं हो पाई जिसको लेकर राज्य के गलियारों में हमेशा यही बहस छिडती आ रही है कि उत्तराखण्ड में सलाहकारों का इतिहास बहुत घातक रहा है। उत्तराखण्ड के अन्दर यह भी बहस चल रही है कि राज्य के मुख्यमंत्री को भी ऐसे सलाहकारों पर अपनी रडार लगानी होगी जो उन्हें सही दिशा में आगे बढने से रोकने का कोई न कोई ऐसा प्रपंच रच रहे हैं जिससे उनकी बेदाग छवि को धूमिल किया जा सके? उत्तराखण्ड के अन्दर अब सोशल मीडिया पर भी यह सवाल खडे हो रहे हैं कि राज्य के मुखिया को चाहिए कि वह सलाहकारों की सलाह पर चलने के बजाए खुद अपने कुछ वफादार अफसरांे पर भरोसा करें जो उन्हें इस बात से रूबरू करायें कि किस रास्ते पर चलते हुए सरकार बेदाग होकर आगे बढ़ती रहेगी?
उत्तराखण्ड जब बना तो सबसे पहले मुख्यमंत्री के रूप में ताज पहनने वाले स्व0 नित्यानंद स्वामी ने शुरूआती दौर में तो बेहतर सरकार चलाई लेकिन उनके कुछ सलाहकारों ने उन्हें ऐसी सलाह देने का दौर शुरू किया था जिस पर चलते हुए वह आवाम और पार्टी की नजरों में किरकिरी बनते चले गये और कुछ समय बाद ही उन्हें इस बात का इल्म भी नहीं रहा कि कब उनके हाथों से राज्य की सबसे बडी कुर्सी छीन गई थी। राजनीति के महापंडित रहे स्व0 नारायण दत्त तिवारी ने सरकार चलाने के दौरान कभी भी अपने सलाहकारों पर भरोसा नहीं किया था क्योंकि उन्हें इस बात का इल्म था कि सलाहकार हमेशा मुख्यमंत्री को सिर्फ हसीन सपने दिखाने के लिए ही आगे रहते हैं और राज्य के अन्दर धरातल पर क्या चल रहा है इससे वह उन्हें रूबरू कराने के लिए आगे नहीं आते जिसके चलते मुख्यमंत्री को वो सच पता ही नहीं चलता जो आवाम सरकार को दिखाना चाहती है। राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए खूब साजिशों के खेल हुये थे लेकिन वह अपनी कुशल राजनीति से पांच साल सत्ता पर काबिज रहने में सफल हुये थे। वहीं राजनीति में कडक मिजाज रखने वाले रिटायर्ड मेजर जनरल भुवन चंद खण्डूरी के चंद सलाहकार और एक ओएसडी ने उस दौर में वो खेल खेलने शुरू किये थे जिसके चलते बेदाग सरकार चलाने वाले खण्डूरी भी आवाम से लेकर पार्टी के कुछ नेताओं की आंखों में खटकते रहे थे और इन सलाहकारों और ओएसडी के द्वारा खेले गये खेल के चलते उनके खिलाफ पार्टी के अन्दर बगावत हुई और उन्हें पद से हटना पडा था।
खण्डूरी के बाद रमेश पोखरियाल निशंक को सत्ता की कमान मिली लेकिन उनके शासनकाल में भी कुछ सलाहकारों ने ऐसा प्रपंच रचना शुरू किया था कि कुछ समय के भीतर ही उस समय के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के खिलाफ एक बडा माहौल तैयार होता चला गया और कुछ मुद्दों को लेकर उत्तराखण्ड से लेकर देश के सर्वोच्च न्यायालय में एक मामला इतना उछला कि उससे सियासत में एक नया भूचाल मचा था और उसी के चलते रमेश पोखरियाल निशंक पर उंगलियां उठनी शुरू हो गई थी? निशंक के दौर में भी कुछ सलाहकारों ने उन्हें ऐसी सलाह देने का खेल खेला कि उसके चलते उनके हाथों से भी मुख्यमंत्री की कुर्सी फिसल गई थी और उसके बाद आज तक कभी भी उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन होने का मौका नहीं मिल पाया। वहीं कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुुगुणा ने जब सरकार की कमान संभाली तो उस दौर में भी उनके कुछ सलाहकारों और चंद ओएसडी के कारण उन पर सवालिया निशान लगने शुरू हो गये थे और चंद अफसर उस दौर में ऐसे थे जो अपने आपको खुद सरकार समझकर आवाम को अपनी हिटलरशाही दिखाने से बाज नहीं आये थे और उसी के चलते वह आवाम से लेकर पार्टी के काफी नेताओं की रडार पर आते रहे और एक समय बाद आखिरकार उन्हें भी मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटना पड गया था। विजय बहुगुणा के बाद हरीश रावत को सत्ता की कमान मिली तो उनके कुछ सलाहकारों ने उत्तराखण्ड के अन्दर जो भौकाल दिखाना शुरू किया उसे देखकर आवाम के मन में हरीश रावत शासनकाल को लेकर सवालिया निशान लगने शुरू हो गये थे। कुछ सलाहकारों ने उन्हें जिस रास्ते पर आगे चलाया उसको लेकर हरीश रावत भी अपने इन सलाहकारों के कारनामो की वजह से अपनी किरकिरी कराते रहे और आखिर में जब उनका एक स्टिंग सामने आया तो उसने सबकुछ खत्म करा दिया था। वहीं त्रिवेन्द्र रावत के शासनकाल में भी उनके कुछ सलाहकारों और चंद ओएसडी ने उन्हें जिस रास्ते पर सरकार चलाने का ज्ञान दिया उस रास्ते पर चलते हुए वह आवाम और पार्टी की नजरों में बडी किरकिरी बनते रहे और उन्हें चार साल पूरे होने का जश्न भी नहीं मनाने दिया और उन्हें हटा दिया गया था। अब राज्य के अन्दर यह बहस चल रही है कि उत्तराखण्ड में सलाहकारों का इतिहास काफी घातक रहा है।

