कुर्सी के लिए फर्जी मुकदमें लिखने के माहिर हुये चंद पुलिस अफसर

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देहरादून(संवाददाता)। उत्तराखण्ड जैसे शांतप्रिय राज्य के लोगों ने कभी भी सपने में यह नहीं सोचा था कि जिस राज्य को वह अपनी शहादत पर बना रहे हैं वहां के ही कुछ पुलिस अफसर कुर्सी पर बने रहने के लिए सत्ता के कुछ नेताओं के हाथों की कठपुतली बनकर उनकी नजरों में विलेन बने लोगों पर वह एक साजिश के तहत बडे से बडे मुकदमें लिखने के लिए आगे आ जायेंगे? उत्तराखण्ड में कहने को तो पुलिस को मित्र पुलिस का तमका दिया गया है लेकिन राज्य के कुछ आईपीएस व पीपीएस अफसरों ने जिस तरह राज्य के कुछ पॉवरफुल राजनेताओं के इशारे पर मीडिया से लेकर कुछ लोगों के खिलाफ फर्जी मुकदमें लिखकर उन्हें जेल भेजने की साजिशें रची और इन साजिशों का हश्र उच्च न्यायालय में तार-तार हुआ उसके बावजूद भी सरकारों ने फर्जी मुकदमें दर्ज कराने वाले आईपीएस अफसरों पर आज तक कोई कार्यवाही करने का साहस क्यों नहीं किया यह उनकी सत्ता चलाने की निष्ठा पर हमेशा एक सवालिया निशान लगाता रहा है? त्रिवेन्द्र राज में ईमानदारी का ढोल पिटने वाले राजधानी के पूर्व पुलिस कप्तान अरूण मोहन जोशी ने जिस तरह से सरकार के इशारे पर कुछ पत्रकारों के खिलाफ राजद्रोह जैसे फर्जी मुकदमें लिखने की पुलिस के कुछ अफसरों के साथ बडी साजिश रची और इस साजिश पर जिस तरह से उच्च न्यायालय नैनीताल ने हंटर चलाकर उसे खारिज किया उसके बाद से ही यह बहस भी छिड गई कि पुलिस के कुछ आईपीएस व पीपीएस अफसर कुर्सी पर बने रहने के लिए राज्य के अन्दर कुछ भी करने को तैयार हैं? चंद पॉवरफुल नेताओं के इशारे पर फर्जी मुकदमें लिखने की साजिश रचने वाले कुछ पुलिस अफसर अब उत्तराखण्ड के लिए एक घातक बनते जा रहे हैं और यह सवाल भी खडा होने लगा है कि फर्जी मुकदमें लिखने वाले पुलिस के कुछ अफसर कहीं उत्तराखण्ड को पंजाब व कश्मीर की तर्ज पर युवा पीढी को सिस्टम के खिलाफ उग्र करने का षडयंत्र तो नहीं रच रहे? उत्तराखण्ड में अगर फर्जी मुकदमें साजिश के तहत लिखने वालों पर अगर सरकार ने सख्त रूख अपनाने का मन न बनाया तो उत्तराखण्ड में पुलिस के कुछ और अफसरों के हौसले बुलंद हो जायेंगे जो उत्तराखण्ड की आवाम के लिए घातक होगा?
उत्तराखण्ड में आज तक कांग्रेस व भाजपा की सरकारें दम भरती आ रही है ं कि वह पारदर्शिता के साथ सत्ता चलाती हैं और वह राज्यभर में अपना गुणगान इस तरह से करती आई हैं मानो उनके शासनकाल में भ्रष्टाचार व घोटाले की गूंज कभी गंूजी ही न हो? कांग्रेस व भाजपा सरकारों में देखने को मिलता रहा कि पुलिस के कुछ अफसर कुर्सी पर बने रहने के लिए कुछ पॉवरफुल नेताओं के इशारे पर कुछ भी कर गुजरने को तैयार हुये और वह कुछ फिल्मों के पुलिस अफसरों की तर्ज पर काम करते हुए दिखाई दिये जिससे हमेशा यही बहस रही कि फिल्मों में तो कुछ पुलिस अफसरों को सत्ता के इशारे पर कुछ भी करने को लेकर दृश्य फिल्माये जाते हैं? हालांकि यह भी सच है कि फिल्मों की तर्ज पर कुछ पुलिस अफसर जिस तरह से कुर्सी पर बने रहने के लिए कर गुजरने को तैयार दिखते रहे उसी तर्ज पर उत्तराखण्ड के कुछ आईपीएस व पीपीएस अफसर भी पीछे नहीं रहे? सत्ता के चंद पॉवरफुल नेताओं के इशारे पर राज्य में चंद आईपीएस अफसरों ने एक बडी साजिश के तहत जिस तरह से नेता की आंखों में खटकने वाले व्यक्ति के खिलाफ संगीन से संगीन धाराओ में मुकदमें लिखने में एक मिनट की भी देरी नहीं की वह हमेशा इस बात को जन्म दे गया कि अगर किसी ने कोई तिनकाभर भी अपराध नहीं किया और वह किसी राजनेता की आंख में खटक गया तो उसके खिलाफ राजनेता के इशारे पर कुर्सी की लालसा में कुछ पुलिस अफसर उसे लुटेरा, साजिशकर्ता, डकैत बनाने से भी पीछे नहीं हटेंगे? ऐसे ही कुछ मामले उस समय देखने में आये जब पत्रकार उमेश कुमार ने निशंक राज में एक बडे भ्रष्टाचार का खुलासा किया तो सरकार ने उमेश कुमार के खिलाफ मुकदमों की बौछार करने के लिए उत्तराखण्ड से सेवानिवृत्त हुये आईजी जीएस मार्तोलिया को आगे किया और उन्होंने पत्रकार पर संगीन मुकदमें दर्ज करने का रिकार्ड बनाया और उन पर ढाई हजार रूपये का ईनाम तक घोषित कर दिया था। वहीं त्रिवेन्द्र राज में जब उमेश कुमार ने अवैध खनन से लेकर मुख्यमंत्री आवास में एंट्री कराने को लेकर भ्रष्टाचार के खेल को नेस्तानबूत किया तो पुलिस के चंद बडे अफसरों ने उन पर फर्जी मुकदमें दर्ज कराने के लिए कोई कसर नहीं छोडी और उमेश कुमार ने भी इन अफसरों पर सीधा मोर्चा खोला था कि उन्होंने त्रिवेन्द्र रावत के इशारे पर फर्जी मुकदमें दर्ज किये थे? इतना ही नहीं त्रिवेन्द्र रावत का जब झारखंड प्रकरण में नाम उछला और यह मामला उफान पर आया तो राजधानी के पूर्व पुलिस कप्तान अरूण मोहन जोशी ने त्रिवेन्द्र रावत के इशारे पर उमेश कुमार व चंद पत्रकारों के खिलाफ साजिश के तहत फर्जी राजद्रोह का मुकदमा दर्ज कराया और इस साजिश में उनके साथ राजधानी के एक-दो पुलिस अफसर भी पर्दे के पीछे से शामिल रहे। त्रिवेंद्र के इशारे पर अरूण मोहन जोशी ने अपनी वर्दी की गरिमा को तार-तार करते हुए इस राजद्रोह मे ंएक और पत्रकार का नाम शामिल कर उसे षडयंत्र के तहत रात्रि में अपनी लम्बी चौडी पुलिस टीम से गिरफ्तार करवा लिया था और खुद उस पत्रकार के साथ कप्तान ने दरिंदगी का तांडव किया था और यह भी दहाड लगाई थी कि मुख्यमंत्री के खिलाफ लिखने का अंजाम क्या होता है? सवाल यह खडे हो रहे हैं कि क्या उत्तराखण्ड बनाने वाले आंदोलनकारियों ने इसलिए अपनी शहादत दी थी कि पुलिस के कुछ अफसर चंद राजनेताओं के इशारे पर किसी भी निद्रोष को वह बडे से बडा अपराधी बना सकते हैं?

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