हरदा को सिर्फ अपनी चिंता!

0
91

प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड कांग्रेस के कद्दावर नेता माने जाने वाले हरीश रावत को राज्य बनने के बाद क्या नहीं दिया यह किसी से छिपा नहीं है। केन्द्र में मंत्री बनाने से लेकर उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री के रूप में कांग्रेस हाईकमान ने उनकी ताजपोशी की लेकिन राज्य के अन्दर हरीश रावत लम्बे समय से अपने आपको ही समूची कांग्रेस मानकर अपनी ब्रान्डिंग करने के मिशन में आगे बडे हुये हैं? विधानसभा चुनाव से पूर्व उन्होंने अपने आपको मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कराने को लेकर जोर अजमाईश की और इस जोर अजमाईश में उन्होंने अपने कुछ करीबियों को भी पर्दे के पीछे से शामिल किया था जो उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा बनाये जाने के लिए मीडिया में हरदा की पैरवी करते हुए दिखाई दिये। अब राज्य में विधानसभा चुनाव खत्म हुये और अभी नतीजों का पिटारा ईवीएम में भले ही कैद है लेकिन हरीश रावत ने खुद को मुख्यमंत्री बनाये जाने को लेकर जिस तरह से शुरूआती दिन से ही दहाड़ लगानी शुरू की उसके पीछे-पीछे उनके चंद समर्थक नेताओं ने भी उन्हें राज्य कांग्रेस का कद्दावर नेता बताकर उन्हें मुख्यमंत्री बनाये जाने की पैरवी का शोर मचा दिया। उत्तराखण्ड के राजनीतिक पहलुओं पर अगर गौर किया जाये तो उससे साफ झलक जायेगा कि हरदा को समूची कांग्रेस की नहीं सिर्फ अपनी ही चिंता सता रही है?
उत्तराखण्ड के अन्दर हरीश रावत कांग्रेस के वो बडे चेहरे हैं जिसका इकबाल कांग्र्रेस हाईकमान वर्षों से मानती आ रही है और यही कारण है कि जब केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी तो उत्तराखण्ड कोटे से हरीश रावत को मंत्री बनाया गया था लेकिन उन्होंने अपने मंत्री कार्यकाल में उत्तराखण्ड के लिए ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे वह राज्यवासियों को अपने कामों की उपलब्धियां गिना सकते? कांग्रेस हाईकमान ने हरीश रावत को हमेशा उत्तराखण्ड के अन्दर पहले पायदान पर रखा और पूर्व में कांग्रेस की सरकार के दौरान उन्हें हाईकमान ने मुख्यमंत्री की कुर्सी भी सौंपी थी लेकिन हरीश रावत ने जिस तरह से सत्ता चलाई और पार्टी के ही कुछ नेताओं को हाशिये पर रखने के लिए रात-दिन एक किया उसी का परिणाम रहा कि हरीश रावत के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे सतपाल महाराज ने भाजपा का दामन थाम लिया था और हरीश रावत जब एकल राजनीति पर सत्ता चलाने लगे तो कांग्रेस के ही नौ पूर्व विधायकों ने विधानसभा बजट के दौरान हरीश रावत सरकार के खिलाफ बगावत कर सरकार का तख्ता पलट कर दिया था। हरीश रावत के खिलाफ कांग्रेस के पूर्व नौ विधायकों की बगावत के बाद यह बात भी साफ हुई थी कि हरीश रावत ने पार्टीे के कुछ पूर्व विधायकों के सामने ऐसी चुनौती खडी कर दी थी जिसके चलते पूर्व विधायकों ने बगावत का झंडा उठाकर भाजपा का दामन थाम लिया था। इस बगावत के बाद हरीश रावत का अपने ही विधायकों की खरीद-फरोख्त को लेकर हुये स्टिंग ने तो उत्तराखण्ड से लेकर दिल्ली तक की राजनीति में हलचल मचा दी थी और इस मामले में सीबीआई ने भी हरीश रावत के खिलाफ मामला दर्ज किया था जो कि अभी तक फाइलों में कैद है। हरीश रावत ने अपनी सत्ता के दौरान जिस तरह से राजपाठ चलाया उसको लेकर राज्य की जनता हरदा के शासनकाल को लेकर बेहद नाराज दिखाई दी लेकिन इसके बावजूद भी हरदा दम भरते रहे कि राज्य में एक बार फिर वह कांग्रेस की सरकार बनायेंगे। कांग्रेस हाईकमान हरदा पर कितना भरोसा करता था यह 2०17 में उस समय भी देखने को मिला था जब हरदा ने दो विधानसभा से चुनाव लडने के लिए अपने कदम आगे बढाये थेे। हरदा के चेहरे पर लडे गये विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को एक बडी हार का जहां सामना करना पडा वहीं खुद पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अपनी दोनो विधानसभा सीटों पर हार गये थे उसके बाद पार्टी के अन्दर बडा भूचाल मचा था कि अगर कांग्रेस हाईकमान हरदा के चेहरे पर चुनाव न लडती तो कांग्रेस का इतना बुरा हश्र न होता? 2०17 में कांग्रेस को आवाम की नजरों में विलेन बनाने वाले हरीश रावत पिछले एक डेढ़ साल से फिर राज्य के अन्दर सक्रिय हुये और उन्होंने समूची कांग्रेस को साथ लेकर चलने के बजाए खुद एकल राजनीति की ओर फिर अपने कदम बढाये जिससे कांग्रेस के अन्दर लम्बे समय से गुटबाजी का दौर पर्देे के पीछे और पर्दे के सामने भी खुलकर दिखाई दे रहा था? हरीश रावत ने तो फिर से राज्य के अन्दर अपने आपको समूची कांग्रेस मानकर राजनीति करनी शुरू की और कांग्रेस प्रदेश प्रभारी को भी कटघरे में खडा करते हुए उन्हें हटवाने की राह पर अपने कदम आगे बढाये थे जिससे यह मामला कांग्रेस हाईकामन के पास दिल्ली तक भी पहुंच गया था? विधानसभा चुनाव में जहां कांग्रेस के अन्दर परिवारवाद के खिलाफ आवाज उठ रही थी वहीं हरीश रावत ने कांग्रेस हाईकमान के सामने फिर आपने आपको पॉवरफुल साबित करने के लिए अपनी बेटी को हरिद्वार से विधानसभा का चुनाव लडवाने के लिए उम्मीदवार बनवाया और खुद भी वह लालकुंआ से चुनाव मैदान में उतरे। विधानसभा चुनाव खत्म होते ही हरीश रावत के मन में फिर मुख्यमंत्री बनने की लालसा जागी और उन्होंने कांग्रेस में यह कहकर हलचल मचा दी कि या तो वह मुख्यमंत्री बनेंगे या फिर वह घर में बैठेंगे उनके इस बयान से कांग्रेस के अन्दर फिर घमासान मचा। बहस यह भी चली की हरीश रावत को जब पंजाब की कमान सौंपी गई तो वहां भी पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ पार्टी के विधायकों ने बडी बगावत कर दी थी और कांग्रेस को एक बडा नुकसान हुआ था। यहां भी हरीश रावत पार्टीे की बगावत रोकने में असफल हुये थे इसलिए कांग्रेस के अन्दर अब यह भी बहस चल रही है कि आखिरकार कब तक कांग्रेस हाईकमान हरीश रावत की जिद के आगे घुटने टेकता रहेगा?

LEAVE A REPLY