कांग्रेस मुक्त अभियान पर मोहर लगाएंगे हरदा!

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असम-पंजाब के बाद अब उत्तराखण्ड की बारी?
अमन वर्मा
देहरादून। सियासी हलकों अगर उठापठक न हो तो ऐसा प्रतीत होता है कि ‘‘कुछ मजा सा नहीं आ रहा है…’’। ऐसा इसलिए भी है कि आम जनता को भी सियासी सरगर्मियां अब भाने लगी है। वर्ष 2017 में जब उत्तराखण्ड के चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला था और कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था तो इस हार का केन्द्र बिंदु तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत बने थे। हरदा को एक समय पर उत्तराखण्ड की राजनीति चाण्कय कहा जाता था लेकिन वर्ष 2017 में उत्तरखण्ड चुनाव में मिली करारी हार ने संभवतः हरदा से यह उपाधि भी छीन ली? कांग्रेस हाईकमान ने हरदा को सेफ साइड रखने के लिए उन्हें पहले असम और बाद में पंजाब की कमान सौंपी। इन जिम्मेदारियों का निर्वाहन को बखुबी निभाते हुए हरदा ने कांग्रेस को पहले असम में हराया और पंजाब में तो कैप्टन अमरिंदर जैसा मजबूत सतंभ ही उखाड़ दिया? अब एक बार फिर कांग्रेस हाईकमान ने हरदा को उत्तराखण्ड चुनाव की कमान सौंप दी है जिसको लेकर उत्तराखण्ड कांग्रेस में भी एक भारी असंतोष देखने को मिल रहा है। हरदा के स्थाई समर्थक तो उनके साथ नजर आ रहे है लेकिन विरोधी पक्ष अपने मोर्चे पर अटल नजर आ रहा है। हालांकि अब राजनीति के जानकार भी अब यह मान रहे है कि उत्तराखण्ड की राजनीति में हरदा का वो प्रभाव नहीं रहा जो कभी हुआ करता था। वहीं अब इस बात को लेकर भी चर्चाएं तेज हो चली है कि जिस प्रकार से हरदा के नेतृत्व में कांग्रेस को असम और पंजाब में पिछड़ी थी, ठीक उसी प्रकार से उत्तराखण्ड में भी कांग्रेस को फिर से हाशिए पर जाने को मजबूर होना पड़ेगा? एक समय पर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया था। मौजूदा परिपेक्ष को देखते हुए तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानों अब हरीश रावत भाजपा के इस अभियान पर मोहर लगा रहे है?
एक समय था जब लोग कहते थे कि हरीश रावत ही कांग्रेस के एक जमीनी नेता है। वहीं अब लोग कहने लगे है कि हरीश रावत तो सिर्फ सोशल मीडिया के नेता ही रह गए है। हालांकि अपने सोशल मीडिया के माध्यम से वह अपने राजनीतिक तीर छोड़कर बड़े-बड़े मुकाम हासिल कर रहे है लेकिन सोशल मीडिया को ढाल बनाकर चुनाव नहीं जीते जाते, उसके लिए मैदान में उतरना पड़ता है? हरीश रावत ने कुछ समय पूर्व प्रेशर पॉलिटिक्स का कार्ड खेलते हुए एक ट्वीट किया था। इस ट्वीट को लेकर उत्तराखण्ड की राजनीति में एक बड़ा भूचाल देखने को मिला। गनीमत यह रही कि इस भूचाल को शांत पार्टी हाईकमान ने शांत कर दिया और संभवतः जो हरदा को चाहिए था वह उन्हें हासिल हो गया। अब यह यह साफ हो गया है कि उत्तराखण्ड में आगामी चुनाव कांग्रेस हरदा के मार्गदर्शन में ही लड़ेगी। सवाल उठ रहे है कि हरदा के मार्गदर्शन मेें तो कांग्रेस असम में भी चुनाव लड़ी थी और उसे करारी हार मिली थी। पंजाब में चली सियासी उठापठक को शांत करने में भी हरदा नाकाम साबित हुए और कैप्टन अमरिंदर जैसा कांग्रेस का मजबूत स्तंभ पार्टी से अलग हो गया। इन उदाहरणों को मद्देनजर रखते हुए उत्तराखण्ड के विधानसभा चुनाव की कमान कांग्रेस ने हरदा को देकर कहीं कोई गलती तो नहीं कर दी?

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