धामी के काम से सारे सर्वे फेल

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किरन शर्मा
देहरादून(संवाददाता)। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की लोकप्रियता के चलते प्रदेश के सभी नेता धराशाही है। उत्तराखण्ड के पहले निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिनके काम से ब्यूरोक्रेसी व जनता दोनों सन्तुष्ट हैं। भले ही धामी को काम करने के लिए अभी समय कम मिला हो लेकिन धामी ने कम उम्र व कम समय मे अपनी गम्भीरता व कार्यशैली से सभी का दिल जीता है। आज कुछ मीडिया चौनल हरीश रावत की लोकप्रियता को बढ़ा कर दिखा रहे हैं। इन सर्वे वालों से पूछों की जो नेता राज्य में मौजूद ही नही, जिसे उसकी पार्टी में ही सर्वस्वीकार्यता नही मिल हो वो जनता को कैसे स्वीकार्य हो सकता है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सभी को साथ लेकर काम करते नजर आ रहे हैं वही कांग्रेस की जूतमपैजार सड़कों पर है। जो हालात कांग्रेस के 2०16 में हरीश रावत के मुख्यमंत्री रहते उत्तराखण्ड में हुए थे आज वैसे ही हालात उनके प्रभारी रहते पंजाब कांग्रेस के हो गए हैं। स्थापित पुराने नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे नेता ही कांग्रेस को धूल चटाने में लग गए हैं। वो ही हालात 2०16 से अब तक कांग्रेस के बने हुए हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की लोकप्रियता ही है कि निर्दलीय हो या कांग्रेसी विधायक लगातार भाजपा का दामन थाम रहे हैं। दिल्ली के चौनल बोल रहे है। हरीश रावत मजबूत नेता बनकर उभरे हैं। जिस नेता को उसके आलाकमान ने ही दोयम दर्जे का घोषित कर दिया हो वो युवा मुख्यमंत्री से अव्वल कैसे हो सकता है। एक ओर प्रधानमंत्री से लेकर देश के रक्षा मंत्री व पार्टी अध्यक्ष मुख्यमंत्री धामी की पीठ थपथपाते हैं वही दूसरी और कांग्रेस के नेता पंजाब प्रकरण के कारण हरीश रावत से दूरियां बना रहे हैं। प्रदेश में ही प्रीतम सिंह,किशोर उपाध्याय, रणजीत रावत,संजय पालीवाल जैसे दिग्गज कांग्रेसी खुलकर हरीश रावत के सामने खड़े हैं। ऐसे हालातों में धामी जैसे सर्वस्वीकार्य नेता के सामने हरीश रावत का अनुभव छोटा साबित हो रहा है। हरीश रावत बात पहाड़,नदी,नाले व गदेरों की बात करते हैं तो चुनाव लडऩे व अपने परिवार के लिए पहाड़ से दूर हरिद्वार में मैदान तलाशते हैं। हरीश रावत को कभी भी उनके कुमाऊं क्षेत्र ने स्वीकार नही किया उन्होंने कोई बड़ा चुनाव अपने गृह क्षेत्र से नही जीता है। 2०17 में भी दो-दो जगह से स्वयं चुनाव लडऩे के बाद भी हरीश रावत को हार का मुख देखना पड़ा था। दोनों ही चुनाव मैदानी क्षेत्र से लड़े थे। जिस व्यक्ति को पहाड़ हो या मैदान दोनों क्षेत्र की जनता स्वीकार नही कर रही है। उसे कौनसी क्षेत्र की जनता के आधार पर नेता गिना जा रहा है। वही धामी को राज्य में निवास करने वाले सैनिकों के परिवार हों या नौकरी की तलाश में पलायन को मजबूर हुए युवा, अब सबका विश्वास मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी में ही हैं। हरीश रावत ने मुख्यमंत्री रहते भी नौकरियों के आदेश को घुमाए रखा वही पलायन पर कोई ठोस नीति नही बनाई। अब इसी मुद्दे पर वो धामी सरकार को घेरने का मन बना चुके थे लेकिन तेजतर्रार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 22००० से ज्यादा नौकरियों के आवेदन निकाल कर हरीश रावत के मनसूबों पर पानी फेर दिया है। धामी की दिल्ली पकड़ की मजबूती भी जनता ने देख ली हैं। वही कामों को अटकाने की अधिकारियों की आदत पर कड़ा पहरा बैठा दिया है। पटवारी,तहसीलदार से लेकर जिलाधिकारी तक कि जवाबदेही तय कर दी गयी है। मंत्रियों को अपने क्षेत्र में दौरे बढ़ाने व अधिकारियों के कामों की लगातार समीक्षा करने पर जोर दिया है। जिला समितियों की बैठकों में विपक्ष ने विधायकों के भी प्रस्तावों को जिस दरियादिली से पास किया जा रहा है वो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ही दूरगामी सोच है। जिसकी सफलता प्रत्यक्ष दिखाई देती है। जनता धामी-धामी कर रही है। भाजपा के दिग्गज भी मुख्यमंत्री की कार्यशैली की प्रशंसा कर रहे हैं। विपक्ष के कई नेता खुलकर भाजपा सरकार के नए मुखिया की तारीफ कर रहे हैं।

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