देहरादून(संवाददाता)। एसोसिएशन ऑफ सेल्फ फाइनेंस इंस्टिट्यूट अध्यक्ष डॉ सुनील अग्रवाल ने प्रदेश में उच्च शिक्षा की स्थिति पर गंभीर प्रश्न उठाए है और उनके समाधान की मांग की है।
यहां हाथीबड़कला स्थित इंस्टीटयूट के कार्यालय में पत्रकारों से रूबरू होते हुए डॉ अग्रवाल ने कहा प्रदेश सरकार द्वारा इस माह दो अगस्त से स्कूलों और कॉलेजों को खोलने की घोषणा की गई थी लेकिन अभी तक कॉलेजों के संबंध में कोई एसओपी े. जारी नहीं हुई इससे घोषणा की गंभीरता का पता लगता है। डॉ अग्रवाल ने विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाया है। उन्होंने कहा हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के जिम्मेदार अधिकारी छात्रों के समस्याओं के समाधान से बच रहे हैं।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की कुलपति किसी से मिलती नहीं है कुलसचिव जो विश्वविद्यालय के मुख्य कर्ताधर्ता होते हैं अपने आपको अधिकार हीन बताते हैं और स्वयं निर्णय लेने से बचते हैं ऐसे में छात्रों की समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता है एक उदाहरण के रूप में गढ़वाल विश्वविद्यालय में दो अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त संस्थान है उन संस्थानों में बीएड छात्रों के प्रवेश के वेरिफिकेशन के लिए विश्वविद्यालय की टीम गठित होती है विश्व विद्यालय की टीम के अनुमोदन के बाद छात्रों के परीक्षा फॉर्म भरे जाते हैं वर्तमान सत्र के प्रथम सेमेस्टर के परीक्षा फॉर्म भरने की तिथि पूर्व में समाप्त हो चुकी है लेकिन विश्वविद्यालय द्वारा उक्त दोनों कॉलेजों के द्वारा लगातार कई बार वेरिफिकेशन टीम भेजने के अनुरोध के बावजूद टीम अभी तक नहीं भेजी गई है।
उन्होंने कहा कि परीक्षा फॉर्म भरने की तिथि निकल चुकी है कॉलेजों के अनुरोध पर विश्वविद्यालय ने छात्रों के परीक्षा फॉर्म भरने के लिए सिर्फ डेढ़ दिन का समय दिया कनेक्टिविटी ना होने के कारण कुछ छात्र फॉर्म नहीं भर सके विश्वविद्यालय द्वारा परीक्षा फॉर्म भरने के लिए रूपये 35०० लेट फीस लगा दी गई इसके उपरांत भी अगर विश्वविद्यालय की टीम उनके छात्रों का वेरिफिकेशन जब तक नहीं करेगी तब तक उन छात्रों का रिजल्ट डिक्लेअर नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली का खामियाजा छात्रों और कॉलेजों को भुगतना होता है और सारे आरोप कॉलेजों के ऊपर लगाए जाते हैं इसी तरह से श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय की स्थापना हुए 1० वर्ष हो चुके हैं लेकिन अभी तक विश्वविद्यालय में पूर्णकालिक स्टाफ का अभाव है और अधिकतर स्टॉफ डेपुटेशन पर है सरकार द्वारा ऐसी स्थिति में भी गढ़वाल विश्वविद्यालय से संबद्ध कॉलेजों को श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय में शिफ्ट करने की बात की जाती है बिना स्टाफ के जो कॉलेज विश्वविद्यालय के साथ एफिलिएटिड है और उन्हीं को संभालना विश्वविद्यालय को भारी पड़ता है तो बिना परमानेंट स्टाफ की नियुक्ति के कॉलेजों की शिफ्टिंग की बात बेमानी है जब भी कोई कॉलेज नया कोर्स स्टार्ट करता है तो विश्वविद्यालय की टीम द्वारा निरीक्षण करके संस्तुति कर दी जाती है।
उन्होंने कहा कि कॉलेज में प्रवेश आरंभ हो जाते हैं विश्वविद्यालय द्वारा परीक्षाएं भी करवा दी जाती हैं लेकिन मान्यता का पत्र वर्षों तक लटका रहता है विश्वविद्यालय की टीम द्वारा संस्तुति के बाद वर्षों तक संबद्धता प्रमाण पत्र जारी ना होना समझ से परे है कॉलेजों की संबद्धता प्रमाण पत्र न होने का सबसे बड़ा खामियाजा छात्रों को छात्रवृत्ति ना मिलने के रूप में होता है क्योंकि समाज कल्याण विभाग द्वारा कॉलेजों के संबद्धता का प्रमाण पत्र मांगे जाते हैं दोष फिर कॉलेजों पर लगाया जाता है जिन लोगों की वजह से प्रमाण पत्र मिलने में वर्षों लग जाते हैं उनके ऊपर ना कोई आरोप लगता है न कोई कार्यवाही होती है हर कोई अपनी जिम्मेदारी से बचता है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों के अधिकारी हो या सरकारी अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से बचते हुए किसी भी मामले में सारा दोष कॉलेज पर डाल देते हैं उन्होंने प्रश्न खड़ा किया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा तीन दिन पूर्व नई शिक्षा नीति के घोषणा के एक वर्ष पूर्ण होने पर बहुत बड़ी उपलब्धि बताया अभी तक उक्त शिक्षा नीति का कोई पार्ट इंप्लीमेंट नहीं हुआ है और जब तक नीति सिर्फ ड्राफ्ट के रूप में है तब तक उसके प्रभाव को कैसे जाना जा सकता है।
