कोरोना-टीकाकरण में भी सरकार पर फिस्ड्डी का दाग!
देहरादून(मुख्य संवाददाता)। उत्तराखण्ड के इतिहास में पहली बार भाजपा को राज्यवासियों ने यह सोचकर प्रचंड बहुमत की सरकार दी थी कि राज्य विकास के पथ पर तेजी से आगे बढेगा लेकिन उनकी यह सोच धडाम हो गई क्योंकि चार साल तक राज करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने प्रदेश में सत्ता राजशाही अंदाज में चलाई। वह उत्तराखण्ड में अपने आपको राजा समझकर शासन चलाते रहे और उनके शासनकाल में अगर किसी ने भी भ्रष्टाचार, घोटाले व अफसरों की हिटलरशाही के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की तो राजाओं की तरह उस आवाज को दबाने के लिए उन्होंने उन्हें सलाखों के पीछे पहुंचाया। त्रिवेन्द्र अध्याय समाप्त होने के बाद जब तीरथ सिंह रावत को सत्ता सौंपी गई तो उन्होंने कोरोना काल में राज्यवासियों को भगवान भरोसे छोड दिया और उसी का परिणाम रहा कि कोरोना काल में राज्य के अन्दर हजारों इंसानों को आकाल मौत के मुंह में जाना पडा। भले ही सरकार के मुखिया हर पायदान पर शून्य नजर आ रहे हों लेकिन मौजूदा दौर में वे सोशल मीडिया के सहारे अपना चेहरा चमकाने के मिशन में लगे हुये हैं इतना ही नहीं राज्यवासियों ने तो अब यह सवाल भी दागने शुरू कर दिये हैं कि नये निजाम का इकबाल अभी तक राज्य के अन्दर शून्य ही दिखाई दे रहा है क्योंकि उन्होंने अपने अब तक के कार्यकाल में राज्य के विकास के लिए एक भी ऐसा फैसला नहीं लिया जिससे कि राज्यवासियों के मन में नये मुखिया की कार्यशैली को लेकर एक विश्वास बन सके कि वह अब राज्य के स्वास्थ्य ढांचे को ऊंचाई तक पहुंचाने के लिए कोई बडा ऐलान करेंगे? मुख्यमंत्री ने अपने तीन माह के कार्यकाल में राज्यवासियों के लिए ऐसा कोई करिश्मा करके नहीं दिखाया जिससे कि कहा जा सके कि तीरथ के इकबाल से राज्य में एक नयापन दिखना शुरू हो गया है?
उल्लेखनीय है कि 2017 के विधानसभा चुनावों में राज्य की सत्ता में कमल वृहत् रूप से खिला। केद्र में मोदी सरकार व उनके भाषणों से प्रभावित होकर दुर्गम पहाडों में भी बच्चे बच्चे की जुबान पर केवल मोदी ही मोदी था। जनता को लगा की राज्य व केंद्र में एक ही दल की सरकार होगी तो राज्य दिन दुगनी गति से विकास करेगा। लेकिन आज भी राज्य में विकास बिना दौडे ही हाप रहा है। कभी सत्ता त्रिवेंद्र को तो कभी तीरथ को, लेकिन जनता की सुध लेने वाले कद्दावर नेताओं ने भी घृतराष्ट्र का रूप अपना रखा है? कुछ माह बाद रणसिगा गरजेगा,उससे पहले गाँव की पंगडंडियो मे खादी की चहल-पहल दिखाई देने लगी है। कोरोना महामारी को भुनाने के लिए कोई भी दल पीछे नहीं है। सत्ता दल जहाँ त्रिवेंद्र व तीरथ सरकार के गुणगान कर रही है तो वही अन्य दल भी सत्ता सीन सरकार को कोस रही है। आज भी स्वास्थ्य सेवाएँ राम भरोसे ही चल रही है, करोड़ों रुपये लागत के भवन तो बन गये है लेकिन विभागों को कोई जानकारी नहीं होने के कारण ये भवन हस्तांतरित होने से पहले ही खंडहरों में तब्दील होते जा रहे है? स्वयं राज्य के मुख्यमंत्री के पास स्वास्थ्य महकमा भी है लेकिन वे भी अकुशल शासक की तरह ही है। राज्य में कोरोना की पहली लहर की रफ्तार धीमी रही लेकिन दूसरी लहर ने राज्य की विकास नामक व्यवस्था की मिट्टी मलीत कर दी, अब तो राज्य वासी कहने लगे है कि वे खुद शर्मसार है लेकिन सरकार आप लाचार क्यों है, जबकि आपके पास तो बहुमत से ज्यादा के विधायक है। लेकिन सत्ता के गरूर में चूर मुखिया केवल अपने हितों को साधने मे ही मशगूल हैं?
इस बार मोदी-मोदी का जादू बंगाल हारने के बाद फीका पड़ गया है? अब तो राज्य में व्यापक रूप से कमल खिल पायेगा यह और तो संघ व भाजपा को करना है क्योंकि अन्य दल की तरह हर विधायक सूबे का मुखिया बनने का सपना पाले हुए हैं? ऐसे में सरकार 2022 की वैतरणी पार कर पायेगी कहना बहुत जल्दबाजी होगी। यदि विकास का पैमाना सोशल मीडिया में अपने कथित विकास से होकर गुजरता है तो उसमें तीरथ व उनकी सरकार पीछे नहीं है? उत्तराखण्ड का यह भी एक बडा सच है कि आज भी दूरस्थ क्षेत्रों में सरकार दवा तक उपलब्ध नहीं करा पायी है तो ये असत्य की पराकाष्ठा पर तैयार भ्रामक प्रचार के साधन सत्ता की कुर्सी चढाने में नाकाम ही है। अभी भी तीरथ के पास कुछ ओवर शेष व विकटे भी हाथ पर है,जो राज्य के हित में उचित फैसले लेने के लिए हो सकते हैं, शुरू कर देना चाहिए तभी पार्टी की साख व स्वयं मुख्यमंत्री की साख सुरक्षित रह सकती है? नहीं तो राजनीति में कई चाणक्य आये और बिना हवा के ही उड गये,इस पर भी नजरें इनायत करना पडेगा क्यों कि सत्ता की कुर्सी बार-बार नही मिलती ये भी मुखिया खूब समझते ही होगे?
