किसके सहारे मिलेगी सत्ता!
चुनाव में किस विकास कार्य को लेकर जनता के बीच जायेगी डबल इंजन सरकार?
देहरादून। उत्तराखण्ड में कुछ माह बाद विधानसभा चुनाव होने है और अभी से ही दिल्ली में बैठे भाजपा के कुछ बडे राजनेताओं के माथे पर बल पडने शुरू हो गये हैं कि आखिरकार विधानसभा चुनाव में पार्टी सरकार के किस विकास कार्य को लेकर आवाम के बीच जायेगी? उत्तराखण्ड के अन्दर सरकार को लेकर चार साल से आवाम के बीच चली आ रही नाराजगी और कोरोना काल में सरकार का इस बीमारी से लडने में फिस्ड्डी साबित होना भाजपा के दिग्गज नेताओं के लिए एक चिंता का विषय बन गया है और इसी को लेकर चंद राष्ट्रीय नेताओं ने उत्तराखण्ड में तीन दिन तक डेरा डालकर जब भाजपा नेताओं की नब्ज टटोली तो नेताओं के माथे पर एक बडी शिकन बन गई और उसी को लेकर उनके मन में एक चिंता का भाव बन गया है कि राज्य के अन्दर जिस तरह से सरकार के पास चुनाव में जाने के लिए अपना एक विकास कार्य गिनवाने का भी जज्बा नहीं है तो ऐसे में विधानसभा चुनाव आखिर किसके बल पर भाजपा जीत पायेगी?
उत्तराखण्ड में सत्ताधारी भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं ने तीन दिन राज्य में डेरा डाल कर भाजपा नेताओं की नब्ज टटोलने आये थे लेकिन सत्ताधारियों के जबरदस्त धड़ेबंदी से राष्ट्रीय नेताओं के भी पसीने छुड़ा दिये? भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बीएल सन्तोष व राज्य प्रभारी राज्यसभा सांसद दुष्यंत कुमार गौतम संदेश लेकर आये थे कि कार्यकर्ताओं को चुनाव के लिये तैयार किया जाये। सत्ता में कैसे बना रहे उसके विभिन्न कार्यक्रम तैयार किये जायें। मंत्रियों व संगठन के लोग पूरे राज्य का दौरा कर कार्यकर्ताओं की टोह लें। 2022 से पहले मुख्यमंत्री को भी चुनाव लड़ाना हैं। इस सबके बावजूद कोर कमेटी की बैठक से लेकर कार्यकर्ताओं व विधायकों-मंत्रियों से हुई राष्ट्रीय नेताओं की गुफ्तगू में दोनों नेताओं के पसीने छुड़ा दिये? शिकायतों के दौर से लेकर सरकार व विधायकों की कार्यप्रणाली को लेकर भी जिस प्रकार की बातें सामने आयी हैं। उससे पसीना छूटना लाजमी भी था। पहले चार साल भाजपा हाईकमान ने प्रदेश का सबसे फिस्ड्डी नेतृत्व थोंप दिया और अब चुनावी वर्ष में सबसे अनुभवहीन मुख्यमंत्री थोंपकर अपना ही सरदर्द बढ़ाया हैं? वर्तमान मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत की बार-बार फिसलती जुबान व अटपटे बयान उन्हें स्वतः ही कमजोर बनाने में लगे हैं। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी बुरी तरह राज्य से ओझल सी होती तो दिख रही है लेकिन भाजपा के अपने नेताओं की ही लापरवाई कांग्रेस को सत्ता में वापसी ला सकती है? कांग्रेस के पास हरीश रावत जैसा चाणक्य नेता है जो अकेला ही राज्य में कांग्रेस की नैया पार लगाने में सक्षम है। वही भाजपा के पास सत्ता होते हुये भी कोई प्रदेश व्यापी नेता नही है? पूर्व मुख्यमंत्री व हरिद्वार सांसद निशंक केंद्र में मंत्री होने के चलते राज्य में अपना मन नही लगा रहे हैं। ऐसे में सत्ताधारी भाजपा के पूरे पांच साल के कार्यकाल के बाद भी ऐसी कोई उपलब्धि नही है जिसको लेकर पुनः जनता के बीच जाया जा सके? दोनों मुख्यमंत्रियों की कार्यप्रणाली ऐसी रही कि कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश है। अफसरशाही पूरे वक्त हावी रही है। मंत्रियों व विधायकों को भी अपने काम कराने के लिये कई बार धरने तक कि धमकी देनी पड़ी। राष्ट्रीय नेताओं के पहले ही चुनावी दौरे पर इतना बवंडर सामने आया इससे उनका पसीना छूटना लाजमी था। दोनों नेताओं के सामने समस्या एक ओर खड़ी हुई कि सरकार और संगठन साथ नही खड़े हैं? नये मुखिया पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के घूर विरोधी हैं तो भाजपा संगठन के नये मिखिया मदन कौशिक त्रिवेंद्र सिंह रावत खेमे के मजबूत स्तम्भ में से आते हैं। ऐसे में इस सामंजस्य को बैठाना भी राष्ट्रीय नेताओं के लिये बड़ी चुनौती है? भाजपा के सत्ता में रहते हुये बड़े नेताओं का एक दुसरे से विरोधभास लाजमी है लेकिन छोटे नेताओं में भी बड़े नेताओं के प्रति शुष्क व्यवहार भी हाईकमान के लिये बड़ा तनाव है।राज्य प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम दिल्ली के जमीन से जुड़े बड़े नेता है उन्होंने कार्यकताओं से अनुपचारिक वार्ता में भी बोल दिया। ये हाल अपने प्रदेश का करोगे तो दिल्ली जैसा हाल पैदा होगा? प्रदेश में,तुम अपने हाथों से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हों। राज्य प्रभारी की ऐसी बातों से भी ये स्पष्ट हो गया कि सत्ताधारी भाजपा के अंदरूनी हालात अच्छे नही हैं?
