देहरादून(संवाददाता)। बेशक उत्तराखंड में भाजपा हाई कमान ने मुखिया तो बदला,सत्ता तीरथ को सौपी, लेकिन वे भी हालातों को बदल पाने मे फिसडी साबित ही हुए है। तीरथ को ऐसे समय पर जिम्मेदारी संभाली है जब राज्य में कोरोना रूपी बहुरूपिये की दूसरी लहर ने राज्य को अपने आगोश में ले लिया। सत्ता चलाने में अनुभवहीन के चलते तीरथ उचित फैसले नही ले पा रहे हैं, जिसका खामियाजा राज्य की जनता को भुगतना पड़ रहा है? संघ व उनके सलाहकारों द्वारा जो सलाह दी जा रही है, उसमें वे उलझते चले जा रहे है। रहस्यमय सलाहकारों की सलाह पर सरकार चलाने की कोशिशें धड़ाम हो रही है और जो रही कसर बची थी उसे कोरोना की दूसरी लहर ने पूरी कर दी। पहली लहर में पहाड़ बचे हुए थे,लेकिन इस बार लचर स्वास्थ्य सेवाओं के चलते हालात बेकाबू है,ऐसे में तीरथ के पास रहस्यमय सलाहकारों की सलाह पर चलने की मजबूरी है। यह हालात तब है जब राज्य में चुनाव बिगुल बजने में कुछ ही माह शेष बचे है।
राज्य इस समय विकट परिस्थितियों से गुजर रहा है। कोरोना महामारी के चलते पहाडों की आर्थिकी की कमर पूरी तरह से टूट चुकी है, दूसरे साल भी चार धाम यात्रा व हेमकुण्ड की यात्रा बंद है। तो वही असमय हो रही बारिश के चलते आ रही प्राकृतिक आपदाओं ने भी सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें उभार दी है,और ये लकीरें अवश्य ही तीरथ को और ज्यादा बैचेन कर रही है। पहाड़ों के चौपट हुए व्यवसायों के लिए तीरथ सरकार अभी तक कोई आर्थिक पैकेज की घोषणा भी नहीं कर पायी है। भाजपा हाई कमान ने पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत को बदलने के फैसले को भी तीरथ जनता के बीच फैले असंतोष को भी नहीं पाट सके है? उत्तराखण्ड पहला राज्य है जहाँ पर जनता की शिकायतों पर भाजपा हाईकमान ने मुखिया को बदलने का फैसला सम्भवतः लिया था? चुनाव में मात्र कुछ माह का समय रह गया लेकिन कोरोना काल में जिस तरह से सरकार मरीजों को आईसीयू बैड, वैल्टीनेटर, आक्सीजन सिलेण्डर दिलाने में फेल साबित हुई उसने कहीं न कहीं भाजपा व आरएसएस के माथे पर बल डाल दिये हैं?
