मनचाहे जिलों में तैनात होने की दिखा रहे ‘जिद्द’
डीएम-कप्तानों के तबादलों में भी सरकार की धबराहट?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में खादी व खाकी का गठजोड किसी से छिपा नहीं है? शासन, प्रशासन व पुलिस के काफी अफसर अपनी मनचाही पोस्टिंग पाने के लिए हमेशा खादी की शरण में जाते हुए दिखाई देते आ रहे हैं और उन्हीं के आश्ीर्वाद से वह मनचाही कुर्सी हासिल करने मिशन में हमेशा सफल होते आये हैं? अब तीरथ रावत सरकार 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए जिला व पुलिस प्रशासन में काफी समय से बदलाव करने का खाका तैयार करने में लगी हुई है लेकिन ऐसा आभास हो रहा है कि मानो इन तबादलों को अंतिम रूप देने में सरकार के अन्दर एक घबराहट बनी हुई है जिसके चलते वह इन तबादलों को हरी झण्डी नहीं दे पा रही है? उत्तराखण्ड के गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है कि मनचाहे जिलों में तैनाती पाने के लिए कुछ आईएएस व आईपीएस अफसरों ने अपनी जिद्द को पूरी करने के लिए प्रदेश के कुछ खादीधारी व चंद बाबाओं की शरण ले रखी है और वह जिस तरह से इनकी परिक्रमा करने में जुटे हुये हैं उससे सवाल खडे हो रहे हैं कि आखिरकार पोस्टिंग पाने का पैमाना अफसर की काबिलियत होना चाहिए या फिर खादीधारी व बाबाओं की शरण में रहने वाले कुछ अफसरों को ही महत्वपूर्ण जनपदों में तैनाती करने का प्रसाद मिलता रहेगा? अगर उत्तराखण्ड में तैनाती का यही पैमाना रहा तो कुछ खादीधारी व चंद बाबाओं के एक हुकुम पर ही उनके चहेते अफसर कुछ भी कर गुजरने को हमेशा आगे खडे हुये दिखाई देंगे? बहस छिड रही है कि अगर राज्य के पॉवरफुल कुछ अफसरों ने अपनी मनचाही पोस्टिंग ही पानी है तो फिर सरकार के तबादले करने का क्या औचित्य रह जायेगा यह आसानी से समझा जा सकता है?
उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड की प्रचंड बहुमत की त्रिवेन्द्र सरकार में चार साल तक शासन, प्रशासन व पुलिस महकमें के कुछ अफसर मनचाही तैनाती पाने के मिशन में हमेशा सफल होते रहे और उन्होंने कुछ राजनेताओं के इशारे पर वो सबकुछ किया जो गुलाम बनकर वो कर सकते थे? हैरानी वाली बात तो यह थी कि चार साल तक राज्य के अन्दर शासन, प्रशासन व पुलिस के चंद अफसर कुछ बडे राजनेताओं के एक इशारे पर कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते थे और उन्होंने अपनी कुर्सी बचाये रखने के लिए वो सबकुछ किया जिसे कभी भी सही नहीं आका जा सकता? उत्तराखण्ड जैसे छोटे राज्य में दर्जनों अफसर सिर्फ महत्वपूर्ण कुर्सी पाने के लिए अपने रैंक की मर्यादा को कुछ खादीधारी व चंद बाबाओं की चौखट पर गिरवी रखते आ रहे हैं जिससे ऐसे अफसरों की वजह से राज्य के अन्दर दर्जनों बार लोकतंत्र के बजाए राजशाही का नजारा देखने को मिलता रहा? अब राज्य की कमान तीरथ सिंह रावत के हाथों में है और वह अब तक शासन, प्रशासन व पुलिस महकमें की ओवररॉलिंग करने में सफल होते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं जिससे सोशल मीडिया पर यही बहस चल रही है कि सिर्फ चेहरा बदलने से क्या भाजपा उत्तराखण्ड में दुबारा सत्ता में आने का सपना देख रही है? चर्चाएं यहां तक हैं कि सरकार ने विधानसभा चुनाव को देखते हुए कुछ जिलों में डीएम व पुलिस कप्तानों को बदलने के लिए मंथन शुरू किया हुआ है लेकिन कुछ जिलों के पुलिस कप्तान अपनी कुर्सी बचाये रखने के लिए एडी-चोटी का जोर लगा रहे हैं और चर्चाएं तो यहां तक हैं कि चंद पुलिस कप्तान कुछ खादीधारियों व चंद बडे बाबाओं की शरण में चरणवंदना कर उनकी परिक्रमा कर रहे हैं? हैरानी वाली बात है कि कुछ आईएएस अफसर इस बात पर अडे हुए हैं कि उन्हें किस जनपद में डीएम के पद पर तैनाती दी जाये और कुछ आईपीएस अफसर अपने चंद खादीधारी व एक दो बडे पुलिस अफसरों के सहारे बडे जिलों में तैनात होने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं? सबसे हैरानी वाली बात है कि जहां त्रिवेन्द्र राज में पुलिस के चंद कप्तान अपने जनपदों में मिठाई के डिब्बे लेकर आने वाले इंस्पैक्टरों व दरोगाओं को अपना आशीर्वाद देते आ रहे हैं उसी तर्ज पर तीरथ राज में भी चंद जिलों में पुलिस कप्तानों का मिठाई प्रेम सरकार को कब दिखाई देगा यह सरकार के तंत्र पर सवालिया निशान लगा रहा है? छोटे से प्रदेश में भी अगर कुछ डीएम व पुलिस कप्तानों के तबादले करने के लिए सरकार को लम्बा मंथन व चिंतन करना पड रहा है तो उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य के अन्दर सरकार तबादलों को लेकर भी किस तरह से घबराहट में है?
