हुजूर! अब तो चश्रु खोलिये

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मुख्य संवाददाता
देहरादून। कभी कभी किसी का अत्यधिक ‘नम्र होना भी स्वयं का लिए घातक सिद्द होता हैÓ यह कहावत राज्य के मुख्यमंत्री पर इन दिनों चरितार्थ हो रही है? उत्तराखंड में नवनियुक्त हुये गढवाल सासंद से मुख्यमंत्री बने तीरथ सिंह रावत जो अपने सौम्य व्यवहार से जनता के दिलों में राज कर रहे थे क्यों कि अपने प्रदेश अध्यक्ष के पद से लेकर राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी अहम पद के बाद भी बेदाग व जनता के बीच मजबूत पकड रही। लेकिन जैसे ही मुख्यमंत्री की कुर्सी में बैठने का मौका मिला वैसे ही वे राज्य की कुछ अफसरों के मकडजाल में ऐसे फंस गये जहां से वह बाहर नहीं निकल पा रहे हैं? यही कारण है कि राज्यवासियों के मन में प्रचंड बहुमत की सरकार के प्रति तिनकाभर भी भाव देखने को नहीं मिल रहा है जिस कारण कहीं न कहीं भाजपा हाईकमान के माथे पर जरूर बल पड रहे होंगे क्योंकि माह बाद ही विधानसभा के चुनाव होने हैं और सरकार को लेकर आवाम की नाराजगी भाजपा के लिए घातक सिद्ध हो सकती है? सवाल यह भी उठ रहे हैं कि आखिरकार मुख्यमंत्री राज्य के सिस्टम को सही दिशा में ले जाने के लिए कब अपने चश्रु खोलेंगे?
त्रिवेंद्र से सत्ता लेकर तीरथ को अपने राजनीतिक जीवन को सिद्ध करने का इससे अच्छा समय नही था, जबकि जनता का अटूट संबंध और विश्वास उन्हें सत्ता के शीर्ष पर पहुँचाने का आर्शीवाद देता रहा है,वे नागपुर व दिल्ली के महानुभावों के समक्ष अपने को सिद्ध कर सकते थे लेकिन कुछ मठाधीश उन्हें एक कदम आगे बढाकर दो कदम पीछे खिंचने में भी गुरेज नहीं कर रहे हैं? अभी तक के कार्यकाल में तीरथ कोई जबरदस्त मास्टर स्ट्रोक नही लगा पाये हैं, जिसकी की जनता को आशा थी,आज भी पूर्व की भांति अफरशाही हावी है? एककाद अपवादों को छोड़ दिया जाय तो अधिकांश जिलाधिकारी जनता के फोन तक नही उठा रहे हैं और न ही समय पर अपने कार्यालयों पर आ रहे है,जिले के सभी विभागों में कर्मचारियों ने भी यही रूख इख्तिहार किया हुआ है, जिससे फरियादी ठगा सा है। तीरथ सरकार को बचे हुए माह में अपने चश्रु खोलने होगे जो उनके भविष्य के लिए भी तो शुभ होगे तथा भाजपा के प्रति पनप रहे असंतोष को भी विराम मिलेगा? यदि यही अफरशाही यूँही खिलखिलाती रही तो 2०22 तीरथ व भाजपा हाई कमान को बंगाल की तरह जनता तारे दिखाने में भी पीछे नहीं रहेगी? जिन सलाहकारों की ताबड़तोड़ नियुक्ति की जा रही है, स्वयं मुख्यमंत्री को उनके इतिहास खंगालने पडेंगे कि राज्य में उनका क्या योगदान है,अभी तक जिनको भी सलाहकार की भूमिका में तीरथ ने तराशा है वे बाहर से अवश्य सोना है लेकिन अंदर से पीतल ही है? मुख्यमंत्री को अपनी गुप्त शाखाओं पर भी विश्वास करना होगा तथा कान मजबूत भी रखने होगे। तभी जनता के बीच बेहतर संवाद स्थापित हो सकता है।
राज्य के इतिहास में यही देखा गया है कि जनता ने मुखिया को दूसरा मौका स्वयं नही दिया है ये बात मुखिया भी बखूबी जानते होगे। अभी तक के विकास के लिए पंडित तिवारी, खण्डूरी व हरीश रावत को भी जनता ने दूसरा मौका नही दिया है, जबकि इन्होने राज्य के लिए बहुत कुछ कर दिखाया,फिर तो मुखिया तीरथ सिंह रावत पहले पायदान पर भी खडे नही हो सकते हैं, जिन्हें विफल करने के लिए उनके ही सिपाहसलार ही कोई कसर नहीं छोड रहे है? 2०22 के चुनावों में भाजपा में मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा या तीरथ के नेतृत्व में ही राज्य में चुनाव लडा जायेगा यह कहना जल्दबाजी ही होगी,लेकिन आम जनता के बीच इस पर भी चर्चा अधिक हो रही है। मुख्यमंत्री को कुछ फैसले अपने विवेक पर लेने होगे,भ्रष्ट अधिकारियों को बाहर का रास्ता दिखाना होगा तथा सूचना तंत्र को मजबूत करने के लिए खाका खींचा जाना चाहिए जो मुख्यमंत्री को गुमराह कर करोडों अरबों रुपये का खेल जनता की छाती पर मूँग दलकर लूट रहे है?

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