तो क्या अब सुलगने लगी

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सीएम के खिलाफ बगावत की चिंगारी?
सलाहकारों की भीड में कहीं उलझ गये मुखिया!
मुख्यमंत्री बनने की चाहत में एक मंत्री का बडा खेल!!
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड का इतिहास रहा है कि जब भी किसी राजनीतिक दल का नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुआ है तो उनके अपनों ने ही उन्हें कुर्सी से हटाने के लिए चक्रव्यूह रचा। उत्तराखण्ड में प्रचंड बहुमत से आई भाजपा जीती तो मुख्यमंत्री बनने की दौड में सतपाल महाराज, त्रिवेन्द्र सिंह रावत व प्रकाश पंत का नाम आगे आया और चंद दिनों की माथापच्ची के बाद आखिरकार भाजपा हाईकमान ने संघ पृष्ठभूमि से जुडे त्रिवेन्द्र ंिसंह रावत को मुख्यमंत्री की कमान सौंप दी थी। हाईकमान के आदेश का कोई आगे आकर खुलकर विरोध तो नहीं कर पाया लेकिन पर्दे के पीछे से पार्टी के कुछ बडे नेता व संघ से जुडे चंद पदाधिकारी भी सरकार के मुखिया को अपनी रडार पर ले आये। मुख्यमंत्री के खिलाफ पार्टी के कुछ विधायकों व बडे नेताओं में किस कदर नाराजगी पनप रही थी इसका नमूना भाजपा हाईकमान की दून में हुई बैठक में भी देखने को मिल गया था लेकिन उनके कडक रूख के चलते कोई भी बडा नेता मुख्यमंत्री के खिलाफ सीधी बगावत नहीं कर पाया था। लम्बे समय से आशंकाआंे का दौर चल रहा था कि मुख्यमंत्री के खिलाफ पार्टी के कुछ मंत्रियों व विधायकों में बगावत की चिंगारी सुलग रही है? इसकी छाया उस समय देखने को मिल गई जब पार्टी के पन्द्रह विधायकों ने सीएम के सामने अपनी नारजगी प्रकट की। वहीं पार्टी के कुछ बडे नेता भी दिल्ली में एक बडे नेता से हेमवती नन्दन बहुगुणा के नाम का डाक टिकट जारी कराने को लेकर मिले लेकिन कहीं न कहीं मुखिया को लेकर भी बडे राजनेता से अपने दिल का दर्द बयां किया है? ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या सलाहकारों की भीड में मुख्यमंत्री कितना उलझ तो नहीं गये कि वह कडक निर्णय भी लेने से बच रहे हैं? आशंकाओं का दौर है कि एक मंत्री की निगाह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लगी हुई है और वह कुछ मंत्रियों व विधायकों को आगे करके खुद सत्ता की कमान अपने हाथों में लेने के लिए व्याकुल है?
उत्तराखण्ड में त्रिवेन्द्र सिंह रावत को जब भाजपा हाईकमान अमित शाह ने मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी तो उसके बाद से ही आशंका पनपने लगी थी कि भविष्य में उनके खिलाफ बगावत की चिंगारी जरूर सुलग सकती है? मुख्यमंत्री अपनी कार्यशैली से राज्य को आगे बढाने के लिए आये और उन्होंने भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का ऐलान भी किया लेकिन कहीं न कहीं उन्हें भ्रष्टाचारियों के खिलाफ सख्त एक्शन लेने से रोकने का भी पार्टी के अन्दर के लोगों ने सम्भवतः कोई खेल खेला जिसके चलते सार्वजनिक हो चुके कुछ भ्रष्टाचारियों पर मुख्यमंत्री ने कार्यवाही करने के लिए अपनी कलम आज तक नहीं चलाई? इससे राज्य में भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावे पर ग्रहण लग रहा है और ऐसी आशंका भी है कि सरकार के मुखिया कहीं न कहीं अपने सलाहकारों की फौज में इतना उलझ गये हैं कि वह भ्रष्टाचारियों पर नकेल लगाने के लिए आगे नहीं आ पा रहे हैं? त्रिवेन्द्र सिंह रावत को सत्ता संभाले एक साल का समय हो गया है लेकिन राज्य में अभी तक डबल इंजन की सरकार का इकबाल आवाम को देखने को नहीं मिल पाया? वहीं भाजपा के चंद मंत्री व काफी विधायक भी इस बात को लेकर नाराज है कि पूर्व सरकार में हुये भ्रष्टाचार के मामलों की हुई जांचों में भी अफसर कोई कार्यवाही करने को तैयार नहंी है जिससे उन्हें आवाम के बीच अपनी छवि बचाना एक बडी चुनौती बना हुआ है। आखिरकार जिसका डर भाजपा के दिग्गज नेताओं को सता रहा था उसका ट्रेलर कल सीएम के सामने पन्द्रह विधायकों ने कर ही दिया और जिस तरह से उन्होंने अपनी नाराजगी और दर्द बयां किया वह कहीं न कहीं इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि पार्टी के अन्दर सीएम के खिलाफ बगावत की चिंगारी सुलगने लगी है?

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