भ्रष्टाचारियों की आंखों में चुभते संजीव!

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सरकारी विभागों में संजीव चतुर्वेदी के किस्से उफान पर
भ्रष्टाचार से लडने का सबसे बडा हथियार बन सकते हैं संजीव चतुर्वेदी?
आखिर कब तक विजिलेंस लेखपाल, पटवारी-कानूनगों को दबोचती रहेगी?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। कितना बडा मजाक है कि एक ओर तो डबल इंजन की सरकार के मुखिया राज्य में भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दम भर रहे हैं और प्रदेश में सुशासन लाने की हुंकार लगा रहे हैं लेकिन भ्रष्टाचार से हमेशा जंग लडने वाले आईएफएस अफसर संजीव चतुर्वेदी को वह विजिलेंस चीफ की कुर्सी पर आसीन करने से डर रही है? दिल्ली व हरियाणा सरकारों में भ्रष्टाचार के बडे-बडे मामलों को बेनकाब करने वाले संजीव को सरकार व सरकारी अफसर ईमानदार बताने के लिए तो मंच से ही ऐलान कर रहे हैं लेकिन राज्य को दीमक की तरह चाट रहे भ्रष्टाचारियों पर नकेल लगाने के लिए संजीव को आगे करने से सरकार अभी तक डरती हुई नजर आ रही है और यही कारण है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ दो सरकारों मंे अपने नाम का डंका बजा चुके संजीव से सरकार के कुछ बडे राजनेता इतने घबराये हुए हैं कि उन्हें वन विभाग में फूल पत्तीयों की रिसर्च करने के लिए तैनात किया हुआ है ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार भ्रष्टाचार से जंग लडने के लिए कितनी गम्भीर है? हालांकि उत्तराखण्ड के कुछ सरकारी दफ्तरों में संजीव हीरो के रूप में दिखाई दे रहे हैं और छोटे कर्मचारियों व अधिकारियों का भी मानना है कि अगर संजीव जैसे अफसर को चीफ विजिलेंस की कुर्सी पर बिठा दिया जाये तो राज्य में बडे-बडे भ्रष्टाचार करने वाले अफसर सलाखों के पीछे होंगे जिन पर सत्रह सालों में आज तक विजिलेंस ने हाथ डालने की हिम्मत तक नहीं दिखाई?
उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचारियों में नकेल लगाने के लिए विजिलेंस का गठन हो रखा है लेकिन इतिहास गवाह है कि सत्रह साल बीत जाने के बाद भी विजिलेंस को अगर कोई भ्रष्टाचारी नजर आया तो सिर्फ पटवारी, कानूनगो, लेखपाल व छोटे-मोटे अधिकारी। उत्तराखण्ड के अन्दर ऐसा नहीं है कि शासन व पुलिस विभाग में सभी अफसर ईमानदारी से अपनी नौकरी को कर रहे हों। राज्य में भ्रष्ट अफसरों की लम्बीचौडी फौज भी खडी है और उन्होंने भ्रष्टाचार से अकूत दौलत बना रखी है लेकिन विजिलेंस जैसी निष्पक्ष शाखा ने भी आज तक किसी बडे अफसर पर भ्रष्टाचार व भ्रष्टाचार से कमाई गई अकूत दौलत की छानबीन करने के लिए अपने कदम आगे नहीं बढाये जिससे राज्य में विजिलेंस जैसी शाखा सिर्फ छोटे कर्मचारियों पर नकेल लगाने तक ही सीमित होकर रह गई है। गजब बात तो यह है कि जो सरकार भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का डंका पीट रही है उसे इस बात का भी इल्म है कि पूर्व सरकार में जिन चंद राजनेताओं व अफसरों ने भ्रष्टाचार व घोटाले किये थे उनकी फाइलें शासन में कैद हैं लेकिन इन भ्रष्टाचारियों पर सरकार ने कभी भी आगे बढकर कोई भी कार्यवाही करने का साहस नहीं किया जिससे राज्य में भ्रष्टाचार पर कार्यवाही करने के दावे सिर्फ जुमले से ज्यादा कुछ दिखाई नहीं दे रहे। सरकार को ईमानदार छवि के अफसरों से क्यों मोह नहीं है यह उसकी कार्यशैली पर अब सवाल खडे करने लगा है। कुछ माह पूर्व जब तेज तर्रार आईपीएस अभिनव कुमार को उत्तराखण्ड लाने के लिए सरकार ने गृह मंत्रालय को पत्र लिखा तो उससे उन भ्रष्टाचारी अफसरों की नींद उड़ गई थी जो इस राज्य में अभी भी ईमानदारी का चोला ओढे हुए हैं? चंद भ्रष्ट अफसरों की आंखों में अभिनव कुमार किरकिरी बन गये और सरकार ने उन्हें उत्तराखण्ड न लाने का फैसला तत्काल कर गृह मंत्रालय को पत्र लिखा कि उन्हें अब अभिनव की जरूरत नहीं है। कितनी गजब बात है कि उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार से लडने के लिए सरकार बिहार मॉडल को तो अपनाने के लिए आगे आ गई लेकिन दिल्ली व हरियाणा जैसे बडे राज्यों में विजिलेंस चीफ के पद पर तैनात रहने वाले आईएफएस संजीव चतुर्वेदी को डबल इंजन की सरकार चीफ विजिलेंस की कुर्सी पर बैठाने से आज तक डरी हुई है? संजीव चतुर्वेदी सरकार व अफसरों की नजर में तो ईमानदार अफसर हैं लेकिन ईमानदार अफसर को विजिलेंस चीफ के पद पर तैनाती नहीं देंगे यह सरकार की कैसी भ्रष्टाचार से लडने की जीरो टॉलरेंस रणनीति है? संजीव चतुर्वेदी ने भी सीएम के सामने इस बात का खुलासा किया था कि राज्य की विजिलेंस ने आज तक पटवारी कानूनगो व लेखपाल से आगे बढकर अपनी जांच को कभी भी आगे बढाने का साहस नहीं किया और यहां तक कह दिया था कि जुमलों से भ्रष्टाचार कम नहीं हो सकता। अब तो कुछ सरकारी विभागों के छोटे अधिकारी व कर्मचारी भी संजीव चतुर्वेदी को भ्रष्टाचार से लडने का बडा हीरो मान चुके हैं और उनका मानना है कि अगर संजीव चतुर्वेदी को चीफ विजिलेंस की कुर्सी पर बिठा दिया जाये तो राज्य में उन बडे भ्रष्टाचारियों के चेहरे बेनकाब हो जायेंगे जो सत्रह सालों से ईमानदारी का चोला पहने हुए हैं?

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