गच्च से बैठे और भच्च से गिर गये क्या?

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देहरादून। उत्तराखंड का दुर्भाग्य ये है की नेताओ और राजनीति हिलोरे भी मारती है और हिचकोले भी खाती है। सत्रह सालो में सिर्फ एक मुख्यमंत्री विकास और विश्वनीयता का प्रतीक रहा बाकी नेता अपने रिपोर्ट कार्ड मे फिस्सड्डी ही रहे, चाहे काँग्रेस हो या भाजपा दोनों ही प्रमुख दल के आलाकमान उत्तराखंड के मुख्यमंत्री चुनने मे फेल ही रहे? कोई भी टिकाऊ, भरोसेमंद, ईमानदार, और विश्वसनीय मुख्यमंत्री ना चुन पाया। इसे तो इस राज्य का दुर्भाग्य ही माना जाए?
वर्तमान मुख्यमंत्री पर भी कुर्सी से रिहाई के लिए चीख पुकार करते विधायको का एक बड़ा समूह पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद रमेश पोखरियाल निशंक के दरबार जा पहुचा और खेवनहार निशंक से मदद की गुहार चाय पार्टी के दौरान लगा डाली? निशंक का मतलब होता है, “जिन्हे किसी बात की शंका और भय ना हो”! अब अगर इतने विधायको का समूह चीख चिल्ला रहा है, तो इसे वर्तमान मुख्यमंत्री का विधायको के प्रति नकारत्मक टोलरेंस ही माना जा रहा है। अब निशंक क्या इन लाचार विधायको के खेवनहार बन पाएंगे, ये तो आने वाला वक्त तय करेगा।
भाजपा के आलाकमान को अब तय करना चाहिए की मजबूत, सुशील, उपयुक्त एवं टिकाऊ भरोसेमंद कौन सा नेता है, जो आने वाले लोकसभा चुनाव और ये बार बार के विद्रोह से उनकी नैया पार लगा सके? फिर से पुनः ऐसा ना हो कि गच्च से बैठे और भच्च से भरभरा जाए। त्रिवेन्द्र रावत अगर राजनैतिक रूप से परिपक्व होते तो शायद ये स्थिति ना आती, उन्होने अपने इर्द गिर्द ऐसे लोग नियुक्त कर दिये जो सिर्फ बतोलों की घुट्टी बना कर पिलाने के महारथी है, चाहे उनके मीडिया सलाहकार हो उनके थिंक टैंक सिपेसलाहकारो की फौज, जो सिर्फ सत्ता की मौज ले रहे है उनका मुद्दो और उत्तराखंड जनता से कोई लेना देना नहीं है?
उन जैसे सिपेसलाहकारो लिए तो कुछ शब्द हैः-
फूलो से जग आसान नहीं होता है..
रुकने से पग गतिमान नहीं होता है..
है नाश जहां निर्मम वही होता है..
तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो…
पग-पग में गति आती है,छाले छिलने से..
तुम पग-पग पर जलती चट्टान धरो…
मै ठुकरा सकू तुम्हें भी हँसकर..
जिससे तुम मेरा मन मानस पाषाण करो
जब संगत बुरी हो और मती भ्रष्ट हो जाए तो “डाकू रत्नाकर” बनते है और जब मार्गदर्शक और संगत अच्छी हो तो डाकू भी रत्नाकर से वाल्मीकी बनते है। उत्तराखंड को एक ऐसे ही वाल्मीकी की जरूरत है, जो इतिहास रचे अच्छाई, सच्चाई और कर्मठता से कार्य करने के लिए पंडित नारायण दत्त तिवारी जैसा उदाहरण हो।

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