उत्तराखण्ड में छिडी बहस हरदा की राह पर त्रिवेन्द्र?

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ग्यारह माह में ही शुरू हो गई बगावत!
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में हरदा के शासनकाल में पार्टी के ही दिग्गज नेताओं ने बगावत का बिगुल बजाकर कांग्रेस को हमेशा के लिए बॉय-बॉय कर भाजपा का दामन थाम लिया था और भाजपा के टिकट पर एक पूर्व विधायक को छोडकर सभी ने विधानसभा चुनाव में जीत का परचम लहराया था। भाजपा को मिले प्रचंड बहुमत के बाद भाजपा हाईकमान ने त्रिवेन्द्र रावत को मुख्यमंत्री की कमान सौंप दी तो मुख्यमंत्री ने मंच से ही ऐलान कर दिया था कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस के तहत काम करेगी। प्रचंड बहुमत मिलने से डबल इंजन की सरकार के मुखिया के सामने पार्टी नेताओं को दायित्व दिये जाने का शुरू से ही बढा दबाव देखने को मिला लेकिन मुखिया ने पार्टी नेताओं व विधायकों को दायित्व बांटने के लिए जहां अपने कदम आगे नहीं बढाये वहीं मंत्री मंडल में खाली पडी दो सीटों केा भी भरने के लिए मुख्यमंत्री चुप्पी साधे हुए हैं। पार्टी के कुछ मंत्री भी दबी जुबान में इस बात पर अपनी नाराजगी दिखा रहे हैं कि सरकार उन्हें फ्री-हैंड काम करने नहीं दे रही और उनकी फाइलें भी शासन में धूल चाट रही हैं? एकाएक भाजपा सांसद रमेश पोखरियाल निशंक के आवास पर हुई बडी चाय पार्टी से प्रदेश की राजनीति में एक नया भूचाल मचा हुआ है और शंका उठ रही है कि कहीं भाजपा के चंद मंत्री व विधायक बगावत का झंडा उठाने के लिए खाका तो नहीं बना चुके? अब बहस छिडी हुई है कि कहीं हरदा की राह पर ही तो राज्य के मुखिया नहीं चल रहे जिससे पार्टी के अन्दर बगावती तेवर देखने को मिलने शुरू हो गये हैं? कुछ समय से खानपुर से भाजपा विधायक भी अपनी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। चर्चा है कि देहरादून में भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष के आगमन पर जब मुख्यमंत्री के खिलाफ पार्टी के कुछ नेताओं ने अपनी नाराजगी दिखाई थी तो उन्होंने मुख्यमंत्री को अभयदान देते हुए साफ संकेत दे दिया था कि वे प्रदेश के मुखिया बने रहेंगे। शायद यही कारण है कि भाजपा विधायकों की घुडकी का सरकार के मुखिया पर कोई असर नहीं पड रहा है और वह अपनी शैली में सरकार चलाने के लिए आगे बढ रहे हैं?
उल्लेखनीय है कि सरकार के मुखिया ने अपने साथ सलाहकारों व मीडिया सलाहकारों की जो टीम रखी हुई है उसकी कार्यशैली पर ग्यारह माह के कार्यकाल में अब तक दर्जनों बार सवालिया निशान लग चुका है मीडिया सलाहकार मीडियाकर्मियों को ही सरकार के मुखिया से दूर रखने का कुचक्र रचे हुए हैं। हैरानी वाली बात है कि राज्य में भाजपा की प्रचंड बहुमत वाली सरकार आने के बाद भी सरकार के मुखिया ने अपने आवास में सभी विधायकों की एंट्री पर बैंन लगा रखा है जिससे अधिकांश विधायकों के मन में एक बडी नाराजगी है कि आखिरकार वह पार्टी के टिकट से विधायक चुने गये है तो सरकार के मुखिया ने आखिरकार किस कारण से उनकी अपने आवास में एंट्री बंद करवा रखी है। सरकार के मुखिया ग्यारह माह में भी आवाम व पार्टी नेताओं का सम्भवतः दिल नहीं जीत पाये हैं? यही कारण है कि प्रदेश में न तो पलायन रूक पाया है न भ्रष्टाचार करने वाले किसी भी अफसर पर सरकार ने बडी कार्यवाही करने का दम दिखाया है। भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दम भरने वाली सरकार के कार्यकाल में जिस तरह से राज्य के अधिकांश जिलों में शराब पर खुलकर ओवर रेटिंग का खेल चल रहा है वह किसी से छिपा नहीं है और सरकार ओवर रेटिंग करने वाले शराब ठेकेदारों पर सख्त कार्यवाही करने में भी अब तक फिस्ड्डी साबित हुई है। सरकार के मुखिया पर भी अब हरदा की तरह आरोप लगने शुरू हो गये हैं कि वह एकल राजनीति की राह पर निकल पडे हैं और अपने चंद मंत्रियों को वह हमेशा अपने ईदगिर्द रखते हैं और कुछ मंत्रियों से वह हमेशा दूरी बनाकर चलते हैं? उत्तराखण्ड में बहस छिडी हुई है कि जिस तरह से हरदा ने अपने शासनकाल में दायित्व और मंत्री पद आखरी समय में भरा उसी तर्ज पर सरकार के मुखिया चलते हुए नजर आ रहे हैं? भाजपा के अधिकांश विधायकों को इस बात की पीडा है कि सरकार ने अभी तक उन्हें कोई भी दायित्व नहीं दिया जिससे वह 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में कैसे आवाम के बीच जा पायेंगे क्योंकि दायित्व न मिलने के कारण उनके इलाकों का विकास ही नहीं हो पा रहा है। डबल इंजन की सरकार में आधा दर्जन से अधिक विधायक ऐसे हैं जो कई बार विधायकी का चुनाव जीत चुके हैं लेकिन सरकार के मुखिया ने अभी तक खाली चली आ रही दो मंत्रियों के पद भरने के लिए कोई रूचि नहीं दिखाई जिससे पार्टी के दिग्गज विधायकों व अन्य विधायकों में सरकार के मुखिया की कार्यशैली को लेकर नाराजगी पनपने लगी है? इन दिग्गजों की यह नाराजगी आने वाले समय में बगावत का रूप न ले ले इसको लेकर उत्तराखण्ड से लेकर दिल्ली तक भाजपा के दिग्गज नेताओं की नींद उडी हुई है?

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