तो क्या भगवान का भी पलायन?

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देहरादून। बात बड़ी भी है और छोटी भी पर बड़ा गंभीर मुद्दा है पलायन का। गाँव खाली, सड़के खाली, और देवभूमि उत्तराखंड की राजनीति भी खाली। अभी कुछ रोज पहले प्रमुख संवाददाता देवभूमि के सड़क मार्ग से गुजर रहे थे, तभी सड़क मार्ग पर किनारे बने एक छोटे से मंदिर पर निगाह पड़ी, आस्था जाग्रत हुई, तो भगवान के दर्शन हेतु गाड़ी रोक मंदिर जा पहुंचे। श्रद्धापूर्वक जब मंदिर के अंदर झाँका तो मंदिर खाली था, ना मंदिर में भगवान मिले ना दिया बत्ती के निशान, ये देखकर प्रमुख संवाददाता भौचक रह गए और फिर राजधानी देहरादून की तरफ देख नमस्कार कर चल दिये।
बात अभी भी पल्ले नहीं पड़ी तो खुलकर समझा देते है। राज्य का पर्वतीय भूगोल सिकुड़ चुका है। पलायन की तीव्र रफ्तार का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आज कई पहाड़ी गांवों में मतदाता ही नहीं हैं। कुमाऊं के चंपावत जिले के 37 गांवों में कोई युवा वोटर ही नहीं है। वहां सारे वोटर 60 साल की उम्र पार कर चुके हैं। बुजुर्ग आबादी भी गिनी चुनी है। अनुमान है कि पिछले 17 वर्षों में करीब 32 लाख लोगों ने अपना मूल निवास छोड़ा है। युवा वोटरों की किल्लत से जूझ रहे गांवों के मुकाबले शहरों में युवा वोटरों की संख्या बढ़ रही है।
एक नजर:
उत्तराखंड में कुल ग्राम पंचायतः 7,555
कुल गांवः 16,793
अब तक खाली गांवः 3,000
सड़क सुविधा से वंचित गांवः 5,000
युवा वोटरों की किल्लत से जूझ रहे गांवों के बनिस्पत शहरों में युवा वोटरों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस समय करीब 75 लाख मतदाताओं में से 56 लाख ऐसे वोटर हैं जिनकी उम्र 50 साल से कम है। इनमें से करीब 21 लाख लोग 20-29 के आयु वर्ग में हैं और करीब 18 लाख 30-39 के वर्ग में हैं।
साफ है कि युवा आबादी गांवों से कमोबेश निकल चुकी है। बेहतर शिक्षा, बेहतर रोजगार और बेहतर जीवन परिस्थितियों के लिए उनका शहरी और साधन संपन्न इलाकों की ओर रुख करना लाजिमी है। पहाड़ों में फिर कौन रहेगा. गांव तेजी से खंडहर बन रहे हैं, रही सही खेती टूट और बिखर रही है। कुछ प्राकृतिक विपदाएं, बुवाई और जुताई के संकट, कुछ संसाधनों का अभाव, कुछ माली हालत, कुछ जंगली सुअरों और बंदरों के उत्पात और कुछ शासकीय अनदेखियों और लापरवाहियों ने ये नौबत ला दी है। पहाड़ों में जैसे तैसे जीवन काट रहे लोग अपनी नई पीढ़ी को किसी कीमत पर वहां नहीं रखना चाहते. चाहे वे किसान हों या साधारण कामगार या फिर सरकारी कर्मचारी जैसे शिक्षक डॉक्टर या किसी अन्य विभाग के कर्मचारी।
पहाड़ी जीवन को गति देने के लिए, उसमें नई ऊर्जा भरने के लिए और गांवों को फिर से आबाद करने के लिए होना तो ये चाहिए था, कि सरकारें बहुत आपात स्तर पर इस पलायन को रोकती। दुर्गम इलाकों को तमाम बुनियादी सुविधाओं से लैस कर कुछ तो सुगम बनाती। खेत हैं लेकिन बीज नहीं, हल, बैल, पशुधन सब गायब। स्कूल हैं तो भवन नहीं, भवन हैं तो टीचर कम, पाइपलाइनें हैं तो पानी कम, बिजली के खंभे हैं तो बिजली नहीं। अस्पताल हैं तो दवाएं उपकरण और डॉक्टरों का टोटा, ये किल्लत भी जैसे पहाड़ की नियति बन गई है। ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में पलायन इन 16 वर्षों की ही समस्या है। काफी पहले से लोग रोजीरोटी के लिए मैदानों का रुख करते रहे हैं। एक लाख सर्विस मतदाता इस राज्य में है, यानी जो सेना, अर्धसैनिक बल आदि में कार्यरत है। ये परंपरा बहुत पहले से रही है, युवा भी अपने अपने वक्तों में बाहर ही निकले हैं। लेकिन अगर वे इतने बड़े पैमाने पर गांवों के परिदृश्य से गायब हुए हैं तो ये सोचने वाली बात है कि क्या वे सभी उस सुंदर बेहतर जीवन को हासिल कर पाएं होंगे जिसकी कामना में वे अपने घरों से मैदानों की ओर निकले होंगे। इस मूवमेंट का, उसके नतीजों का अध्ययन किया जाना अब नितांत जरूरी है। पलायन के इस दंश को मंदिर और भगवान भी भुगत रहे है जहां दिया बात्ति करने वाले भी नहीं बचे है और अप्राकृतिक रूप से देवभूमि की आस्था के देव गायब होने लगे है। जब गणो का पलायन सरकार रोक नहीं पायी तो देवो का भी पलायन कैसे रोकेगी, उत्तराखंड की अभूतपूर्व राजनीति।

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