मजिस्ट्रेट जांच बनेगी गले की ‘फांस’

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सत्रह सालों में ऐसी जांच का क्या हुआ हश्र?
जान की कीमत बारह लाख
देहरादून। उत्तराखण्ड का जन्म हुए सत्रह साल से अधिक का समय हो गया है और जब भी राज्य में कोई बडा हादसा या दुर्घटना हुई तो उसके बाद सरकारों ने घटना की मजिस्ट्रेट जांच कराने के आदेश दिये लेकिन इन जांचों का हश्र आज तक क्या हुआ यह सबको पता है? अब प्रकाश पांडे की मौत पर सरकार ने मजिस्ट्रेट जांच के आदेश तो दे दिये लेकिन यह जांच सरकार के गले की फांस बन सकता है क्योंकि जो ट्रांसपोर्टर चीख-चीखकर देश के प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और उनके ओएसडी को लेकर अपनी नाराजगी दिखा रहा था उसके चलते कैसे कोई अफसर इस जांच को अंजाम तक पहुंचा पायेगा यह एक बडा प्रश्न सरकार की जांच पर भी खडा हो गया है और यह बात उठने लगी है कि क्या इंसान की कीमत बारह लाख रूपये है। जैसे कि सरकार ने प्रकाश पांडे की मौत के बाद उसके परिजनों को बारह लाख मुआवजा देने की घोषणा की है।
उल्लेखनीय है कि प्रकाश पांडे ने जब कृषि मंत्री सुबोध उनियाल के जनता दरबार में देश के प्रधानमंत्री व उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री के खिलाफ अपनी नाराजगी दिखाई थी तो उसे भाजपा प्रदेश कार्यालय से बाहर कर दिया गया था। वहीं प्रकाश पांडे ने खुद वीडियो बनाकर उसने मुख्यमंत्री के ओएसडी उर्वादत्त भट्ट के खिलाफ अपनी नाराजगी दिखाई जिससे कांग्रेस भी सरकार के खिलाफ हमलावर हुई कि प्रकाश पांडे की मौत की जिम्मेदार सरकार है। सरकार ने इस मामले की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिये हैं लेकिन यह जांच उसके लिए भी गले की फांस बन सकता है क्योंकि जब प्रकाश पांडे ने जहर खाया था तो किसी प्रशासनिक अधिकारी ने उसका मरने से पूर्व बयान भी दर्ज किया होगा ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिन राजनेताओं के खिलाफ प्रकाश पांडे ने अपनी नाराजगी जाहिर की थी क्या उनके नाम मजिस्ट्रेट जांच में अंकित करने का साहस जांच अधिकारी कर पायेंगे? यह सबको मालूम है कि अगर कोई आत्महत्या कर अपने सुसाईड नोट में किसी का नाम पीडित करने के रूप में लिखता है तो उस पर आईपीसी के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज कर कार्यवाही होती है ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या प्रकाश पांडे की मौत में भी मजिस्ट्रेट जांच के बाद किसी भी राजनेता के खिलाफ आईपीसी के तहत मुकदमा दर्ज हो पायेगा? यह यक्ष सवाल राज्य के गलियारों में बार-बार गूंज रहा है।

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