गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने को लेकर सर्द हवाओं में सुलगने लगे पहाड़!

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प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड का जन्म होने के बाद से ही प्रदेश की स्थाई राजधानी को लेकर राज्य के अन्दर एक अलख जलती हुई नजर आ रही है लेकिन यह अलख सरकार को कभी भी दिखाई नहीं दी और न ही क्षेत्रीय दल ने इस ओर सरकार को कोई अल्टीमेटम देने के लिए अपने कदम आगे बढाये जिससे सरकार भी गैरसैंण के दर्द से अपने आपको अंजान रखने लगी। सत्रह साल बाद भी प्रदेश को स्थाई राजधानी न मिलना राज्य सरकारों पर एक बडा सवाल खडा कर गया और यह बात भी उठने लगी कि जब राज्य की पूर्व सरकार ने स्थाई राजधानी को लेकर दीक्षित आयोग का गठन कर उसकी रिपोर्ट हासिल की थी तो फिर उस रिपोर्ट पर अमल करने के लिए किसी भी सरकार ने आज तक अपने कदम आगे क्यों नहीं बढाये। सर्द हवाओं में जिस तरह से गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाये जाने को लेकर पहाड़ सुलगने लगे हैं उसकी तपिश का आभास 2019 में सरकार को हो सकता है?
पिछले लम्बे समय से राज्य में कांग्रेस व भाजपा पहाड की जनता को गैरसैंण के मुद्दे पर अपनी ओर आकृषित करती रही हैं लेकिन सत्ता हासिल करने के बाद किसी भी सरकार ने गैरसैंण में स्थाई राजधानी बनाये जाने को लेेकर कभी भी कोई मंथन करने के लिए अपने कदम आगे बढाये हों यह आज तक देखने को नहीं मिला। उत्तराखण्ड की पूर्व हरीश रावत सरकार ने भी गैरसैंण में स्थाई राजधानी बनाये जाने को लेकर आवाम के सामने बडे-बडे दावे किये और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष भी गैरसैंण में राजधानी बनाये जाने को लेकर आगे खडे हुए हमेशा दिखाई देते थे लेकिन हरीश रावत ने अपने कार्यकाल में कभी भी गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाये जाने केा लेकर ईमानदारी से कोई पहल नहीं की और सिर्फ गैरसैंण में पिकनिक मनाने के लिए एक सत्र आयोजित कर उस पर करोडो रूपये खर्च करने का काम जरूर किया था जिसको लेकर हरीश रावत सरकार पर हमेशा उंगलियां उठी थी कि आखिरकार जब गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाये जाने का उसका कोई मन नहीं है तो फिर एक सत्र कराकर गैरसैंणवासियों की भावनाओं के साथ वह क्यों खिलवाड़ करती रही। हैरानी वाली बात है कि जब भाजपा विपक्ष में थी तो वह खुलकर ऐलान करती थी कि वह राज्य में उनकी सरकार आई तो वह गैरसैंण को राजधानी बनायेंगे। क्षेत्रीय दल गैरसैंण के मुद्दे पर ही पहाडों में चुनाव लडते रहे हैं लेकिन उन पर भी पहाड़ की जनता विश्वास करने के लिए कभी आगे नहीं आई जिसके चलते क्षेत्रीय दल का पहाडों में भी अस्तित्व खत्म होता चला गया और यह बात उठी कि आखिरकार गैरसैंण की लडाई लडने के लिए कौन मजबूत इरादे लेकर मैदान में उतरेगा। उक्रांद ने कभी भी गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाये जाने को लेकर बडी लडाई लडने का जज्बा मन में नहीं पाला और यही कारण है कि उक्रांद आपस में ही मनमुटाव के चलते अपना वजूद खोता चला गया। उत्तराखण्ड में भाजपा की सरकार सत्ता में आई तो पहाड़ की जनता को एक आशा की किरण दिखाई दी थी कि राज्य में जल्द स्थाई राजधानी की घोषणा गैरसैंण के रूप में कर दी जायेगी लेकिन हैरानी वाली बात है कि भाजपा की डबल इंजन की सरकार भी गैरसैंण के मुद्दे पर खामोश दिखाई दे रही है और सरकार के मुखिया भी स्थाई राजधानी गैरसैंण में हो इसको लेकर चुप्पी साधे हुए हैं और बस यही बयानबाजी चल रही है कि सरकार के मन में गैरसैंण को लेकर जो भावना है वह समय आने पर सबको दिखाई दे जायेगी। सत्रह सालों से भले ही गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाये जाने का मुद्दा शांत रहा हो लेकिन सर्दी के इस मौसम में भी गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाये जाने के मुद्दों को लेकर पहाड़ तपने लगे हैं और इसकी तपिश सरकार को भले ही अभी दिखाई न दे रही हो लेकिन यह तय है कि गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाये जाने का मुद्दा अब पहाडों में उसी तरह से उठने लगेगा जैसे राज्य बनाये जाने के लिए वर्षों पूर्व सड़कों पर आन्दोलनकारियों द्वारा आन्दोलन शुरू कर दिया गया था। भले ही अभी मुट्ठीभर लोग गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाये जाने को लेकर आन्दोलन कर रहे हों लेकिन इस बात में भी कोई शंका नहीं है कि आने वाले समय में यह आन्दोलन एक बडा रूप लेकर सरकार के सामने बडा संकट खडा कर सकता है।

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