जायका में बडे घोटाले की आ रही ‘बदबू’

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सुनो मान्यवर सुनो,
आवाम की आवाज
भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस तो जांच पर खामोशी क्यों?
जायका प्रोजेक्ट उत्तराखंड के एक हजार करोड़ के सॉफ्ट लोन को आईएफएस अधिकारियों ने किस तरह ठिकाने लगाया? इसका जिक्र हम पिछले दो संस्करणों में कर चुके है..इस बारे में एक और मजेदार जानकारी और ले लीजिए, जायका प्रोजेक्ट में हर्बल पौधों और वानिकी के लिए जिन पांच सौ वन पंचायतों को चुना गया था वहां अभी नर्सरियां भी पूरी तरह से तैयार नही हुई उनकी मार्केटिंग के लिए पहले दिन से 48 हजार रु प्रतिमाह पर सभी फारेस्ट डिवीजनों में मार्केटिंग अधिकारी रख दिये गए जिसमे हर साल 70.20 लाख का खर्चा आरहा है और अभी तक दो करोड़ से ज्यादा की रकम पानी की तरह बहा दी गयी है,रपबं के आईएफएस अधिकारी महोदय ये बताये कि माल तैयार नही अभी पैदा भी नही हुआ और आप तीन सालों से मुफ्त की तनख्वाह बांटे फिर रहे हो,वो भी कर्जे के पैसों से! कमाल की बंदरबांट हो रही है! हर फॉरेस्ट डिवीजन में एक फील्ड एफएनजीओ 18 हजार रु महीने में रखा हुआ है इस बन्दे का क्या काम है?क्यों तनख्वाह दी जा रही है? कोई जवाब देही नही है, मान्यवर महोदय, हम फिर ध्यान देने को कह रहे है जापान से हमे सॉफ्ट लोन मिला है जिसे आने वाले वक्त में हमे ब्याज सहित चुकाना है अगर ऐसे ही कर्जे को उड़ाना था तो इस राज्य का भविष्य क्या होगा?वन अधिकारी ट्रांसफर हो जाएंगे, मंत्री आएंगे और चले जायेंगे कर्ज तो सरकार पर है प्रदेश की जनता पर है चुकता रहेगा, मान्यवर महोदय, आईएफएस रिटायर हो गए उन बुजुर्गो का यहां क्या काम करोड़ो की रकम उनकी तनख्वाह उनमे बांट दी,कंसल्टेंट्सी में करोड़ो रु फूंक डाले कोई पूछने वाला नही, बरहाल फैसला आपको करना है कि क्या जीरो टोलरेंस की सरकार इस तरह के भ्रष्टाचार में आंख मूंदे बैठी रहेगी?

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