दफन होगा एनएच-74 घोटाला!

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अब सेंथिल की रिपोर्ट भी जायेगी कचरे में?
तो क्या एनएच अफसरों के नाम निकालने की हो गई ‘तैयारी’
देहरादून। उत्तराखण्ड में सरकार के मुखिया भ्रष्टाचार पर जीरो टोलरेंस का दम भरते आ रहे हैं लेकिन चंद माह के कार्यकाल में ही जीरो टोलरेंस के दावों की राज्य में हवा निकल चुकी है? प्रदेश के इतिहास में हुए सबसे बडे एनएच-74 घोटाले को बेपर्दा करने वाले कुमांऊ कमीशनर को सरकार ने पद से हटाकर खुला संदेश दे दिया है कि एनएच-74 घोटाला अब जल्द ही राज्य में हुए और घोटालों की तरह दफन कर दिया जायेगा? कुमांऊ कमीशनर को हटाने के बाद अब यह आशंका भी उठने लगी है कि शायद अब सेंथिल की रिपोर्ट को भी कचरे के डिब्बे में डाल दिया जायेगा? इसके पीछे नितिन गडकरी का एनएच-74 में शामिल चंद अफसरों के नाम एफआईआर से बाहर निकालने को बनाया गया दबाव माना जा रहा है? कुमांऊ कमीशनर को पद से हटाने के बाद कहीं न कहीं सरकार ने उच्च न्यायालय में एनएच-74 के अफसरों के नाम एफआईआर से बाहर निकालने के लिए सारा खाका तैयार कर लिया है और अब तो यह आशंका भी उठ रही है कि कहीं सरकार न्यायालय में यह शपथ पत्र न दे दे कि पूर्व कुमांऊ कमीशनर की रिपोर्ट पर उन्हें भरोसा नहीं है इसलिए एफआईआर को निरस्त किया जाये जिसके बाद सरकार मामले की जांच सीबीसीआईडी या किसी अन्य एजेंसी से करा सके?
गौरतलब है कि उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार से लडने के तो बडे-बडे दावे किये जा रहे हैं लेकिन हैरानी वाली बात है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आगे आने वाले चंद अफसरों को ही सरकार निशाना बनाकर उन्हें पदों से हटाने के लिए तेजी के साथ आगे आ रखी है जिससे राज्य में त्रिवेंद्र सरकार पर सवाल उठ रहे हैं और सोशल मीडिया में भी ईमानदार अफसरों को हटाये जाने पर सरकार को कटघरे में खडा किया जा रहा हैैै। उच्च न्यायालय में दाखिल एनएच-74 के घोटाले को लेकर पीआईएल दाखिल की गई तो न्यायालय के आदेश पर पूर्व कुमांऊ कमीशनर डी. सेंथिल पांडियन को जांच सौंपी गई तो उन्होंने इस मामले से पर्दा उठाते हुए लगभग सौ करोड रूपये का घोटाला पकडा था और आधा दर्जन छोटे-बडे अफसरों को भी इस घोटाले में दोषी पाया था जिसके बाद सरकार ने आधा दर्जन अफसरों पर गाज गिराई थी और मामले की जांच सीबीआई को सौंपने के लिए पत्र लिखा था। सरकार के पत्र लिखते ही केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत को पत्र लिखकर मामले की जांच सीबीआई से ना कराने को कहा था इस पर सरकार सहम गई और उन्होंने मामले की जांच सीबीआई के बजाए राज्य की एजेंसी से ही कराने का मन बना लिया। हैरानी वाली बात है कि नितिन गडकरी ने जिन अफसरों के मनोबल कम होने की बात कही थी उन्होंने उच्च न्यायालय में उत्तराखण्ड सरकार को ही चैलेंज कर दिया और एनएच-74 घोटाले में दर्ज एफआईआर से अपने नाम हटवाने की याचिका दायर की जिस पर न्यायालय ने सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। नितिन गडकरी के सख्त रूख के चलते आखिरकार सरकार ने घोटाला उजागर करने वाले पूर्व कुमांऊ कमीशनर डी. सेंथिल पांडियन को पद से हटा दिया जिससे कहीं न कहीं सरकार अब एनएच-74 के उन अफसरों के एफआईआर से नाम निकालने के लिए आगे आ जायेगी जिसको लेकर नितिन गडकरी नाराज दिख रहे थे? अब सवाल उठता है कि क्या जिस तरह से डी. सेंथिल पंाडियन को कुमांऊ कमीशनर के पद से हटाया गया क्या उसी तर्ज पर एनएच-74 के घोटाले की रिपोर्ट भी सरकार कचरे के डिब्बे में डाल देगी? अब तो यह आशंका भी उठ रही है कि कहीं सरकार न्यायालय में यह शपथ पत्र न दे दे कि पूर्व कुमांऊ कमीशनर की रिपोर्ट पर उन्हें विश्वास नहीं है इसके चलते एफआईआर को निरस्त किया जाये और उसके बाद सरकार इस पूरे मामले की जांच सीबीसीआईडी या अपनी किसी शाखा से करायेगी?
चर्चाएं तेज हैं कि डी. सेंथिल पांडियन को हटाना ही कहीं न कहीं एनएच-74 घोटाले की जांच को दफन करना सरकार का गोपनीय मिशन हो सकता है? अब नये कुमांऊ कमीशनर के लिए भी बडी चुनौती होगी कि वह पूर्व कुमांऊ कमीशनर की रिपोर्ट को उच्च न्यायालय में झूठा साबित करने के लिए शपथ पत्र दाखिल करेंगे या फिर वह सेंथिल की जांच को ही सही ठहराने का साहस दिखाने के लिए आगे आयेंगे? हालांकि इस घोटाले का हश्र भी राज्य में हुए अन्य घोटाले की तरह होने के आसार दिखाई देने लगे हैं?

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