जलसंस्थान अल्मोड़ा में पसरा है अपार भ्रष्टाचार!

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अल्मोड़ा। भ्रष्टाचार की बात हो और अल्मोड़ा में जलसंस्थान का नाम न आए यह तो हो ही नही सकता। जलसंस्थान एक ऐसा विभाग है जो नाम का तो लोगो को पानी देने का काम करता है पर असल में इस विभाग की अंदर कई ऐसे कारनामे चल रहे है जो सुन कर पैरो तले जमीन खिसका देते है। इस विभाग में लाइन मेंन ठेके में रखे जाते है जो सुबह शाम या फिर रिसाव, नए कनेक्सन, किसी के वहाँ पानी न आने पर विभाग की तरफ से उस लाइन को ठीक करने का काम तक यह ही करते है। लेकिन भ्रष्टाचार तो तब सामने आता है जब यह पता चलता है कि विभाग द्वारा लाइन मेंन नामक व्यक्ति को कई काम का सीमित पैसा दिया जाता है। विभाग द्वारा नगर में लिकेजिंग, मरमत, सप्लाई आदि काम के लिए तीन लाख रूपये एक माह में ठेकेदार को तो दिया जा रहा है पर जो लेवर सुबह से रात तक विभाग के साथ काम कर रहे है उन्हें एक दिन का लगभग मात्र 175 रूपया ही मिल पाता है। जो की पिछले तीन माह से नही मिला है, और इन लेवरो को तो यह तक नही पता है कि उनका ठेकेदार कौन है, कहाँ का है, क्योंकि विभाग के अधिकारी ही आज तक इनको रखते या हटाते रहे है। इन संविदा कार्मियों को कई माह से पी.एफ. तक की कोई जानकारी नहीं है । जहाँ एक तरफ पूरे उत्तराखंड में एक नियम की बात कही जाती रही है वही गढ़वाल रेंज के संविदा कार्मियों को तो सरकार ने पक्का कर दिया पर कुमाऊँ के ये संविदा कर्मी आज भी ठेकीदारो के भरोसे बैठे है और वो भी उस ठेकेदार की जिसे आज तक उन लोगों देखा तक नही है। आखिर क्या कारण है कि ठेकेदार केवल कागजो में ही नजर आ रहा है जमीन में नही? यही नही ये एक विभाग इस तरह का है जिसमे जिला योजना, प्रदेश प्लान, ए आर एम, एन आर डी डब्लू पी आदि बहुत सारी करोडो की योजनाएं यहाँ बिना निविदा के अपने चेलों को दे दी जाती है। तीन माह से अल्मोड़ा नगर में कोई भी मरम्मत का कार्य नही हुआ है पर लाखो रुपयों का जाना तय है। आखिर बिना काम का रुपया क्यों दिया जा रहा है? जब कुछ होता है तो ठेकेदार तो नजर नही आता पर तब पम्प के छोटे कर्मचारी ही उसको दुरूस्त करते हैं।
अब सोचने की बात यह है कि बिना काम के लाखों रूपये विभाग किसको और क्यों बाँड़ता है? यही नही शासन ने साफ कहा है कि कोई भी पाइप लाइन रोड की ऊपर नही जाएगी बल्कि रोड से ०.6 मीटर जमीन के अंदर जाएँगी पर विभाग की ज्यादातर लाइने तो रोड की ऊपर ही जा रही है। गौर तलब है कि नियमानुसार पानी की लाइने गन्दे नालो से होकर न निकले परन्तु अल्मोड़ा मे यह एक आम बात है। प्रदेश को जहाँ बीजेपी सरकार भ्रष्टाचार मुक्त करने की बात कर रही है वही अगर एक जनपद का यह हाल है तो पूुरे प्रदेश में क्या हो रहा होगा यह कहना मुश्किल है। सरकार के पास पूरा तंत्र होने की बाद भी सरकार ठेकेदारों के हवाले से और बिना निविदा के आखिर क्यों काम करना चाहती है? क्यों सरकारी योजनाओं के पैसों का खुलासा नही होता? क्यों बिना निविदा के हि लाखो के काम को अंजाम दिया जा रहा है? क्या प्रशासन और सरकार को खुली लाइन और नालियों में पड़े पाइप नजर नही आते? क्यों प्रशासन को लिखित जनता से शिकायत चाहिए? लाखो के वेतन के बाद भी क्यों चहिए कमीशन? आखिर जनता को ही क्यों बनना पड़ता है मोहरा? क्यों नही प्रशासन खुद से इस तरह के अधिकारियो के खिलाफ कार्यवाही किया करते है? कागजो को भरना ही क्या इन विभागों का काम क्यों बन गया है? क्यों नही कोई भी इनको मिलने वाली योजनाओं के बारे में पूछता है? सरकार के बड़े बड़े वायदों को किस तरह से ठोकरों में उड़ाया जाता है यह तो कोई अल्मोड़ा जनपद से सीख ले?
नगर और आस पास के दर्जनों गॉवो में पेयजल आपूर्ति समीपवर्ती 1० किमी दूर कोसी नदी से होती है। लेकिन उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद भी नगर और आस पास के क्षेत्र में बढ़ते शहरीकरण की आपाधापी में मौसम की हर ऋतू में पेयजल संकट गहराता जा रहा है। विशेषकर माह अप्रैल से सितंबर तक लगभग छ: माह तक लगातार पेयजल संकट बना रहता है।
हरीश रावत सरकार द्वारा इस समस्या के निदान के लिए ठोस कदम कोसी बैराज का निर्माण करके किया था लेकिन बैराज निर्माण के बाद भी समुचित उपाय जनता को नही मिल पाया। इन सबके लिए अगर कोई उत्तरदायी है। तो वह स्वयं पेयजल आपूर्ति विभाग जल संस्थान ज्यादा जिम्मेदार नजर आता है। क्योंकि विभाग मोटे तौर पर जो आंकलन करता है, की उसे नगर में पेयजल आपूर्ति हेतु प्रतिदिन 12 से 14 एम० एल० डी० पानी की आवयश्कता होती है। जो कि सीमित संशाधन के माध्यम से मात्र 7 से 8 एम०एल०डी० ही मिल पाता है। और जिम्मेदार अधिकारी इसी बात का उदाहरण देकर पेयजल संकट से अपना पल्ला झाड़ लेते है। जबकि गौर करने वाली बात है। कि राज्य गठन से पूर्व उत्तर प्रदेश के समय में अल्मोड़ा नगर एवं आस पास के क्षेत्र में लगभग 2०० से 25० पब्लिक नल (स्टैंड पोस्ट) लगे हुए थे। जिनसे प्रात: एवं सायकाल दो से तीन घंटे पानी की आपूर्ति होती थी।
आज वह घटकर 2० से 25 के बीच में ही सिमट कर रह गई है। जो पब्लिक नल आज के समय में नदारद है। उसका कोई भी लिखित विवरण विभाग के पास नही है। विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि राज्य गठन के बाद से ही गायब स्टैंड पोस्ट रखूखदार सफेदपोश एवं अधिकारियो के घर में अवैध रूप से लगे हुए है। जिन पर विभाग राजनीतिक दबाव के कारण कोई कार्यवाही नही करता है और वही विभाग जरूरत के अनुसार जो पानी मांग करते है उस की कोई भी गणना में स्टेंड पोस्ट के पानी को नही गिना जाता है। जो कि बहुत ही दुर्भाग्य का विषय है। विभाग अपनी भूमिगत पेयजल लाइनों के कारण कोई भी उच्चस्तरीय जाँच से भी बच जाता है। क्योंकि इन अवैध संयोजन का कोई भी धरातलीय परिक्षण नही हो सकता है।

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