एन एच-74 घोटाला बना त्रिवेन्द्र के गले की फांस!

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सरकार की अनुभवहीनता से भाजपा की ‘किरकिरी’
देहरादून। उत्तराखण्ड में राजधानी निर्माण घोटाला, सिडकुल का जमीन घोटाला, उद्यान घोटाला, कोल्ड स्टोर घोटाला, बिजली मीटर ट्रांसफार्मर घोटाला, दवा खरीद घोटाला, भू-उपयोग परिवर्तन घोटाला, छात्रवृत्ति घोटाला, बीज घोटाला, बोरा घोटाले की गूंज उत्तराखण्ड में खूब गूंजी और सरकारों ने हुंकार लगाई की घोटालेबाजांे को बक्शा नहंी जायेगा लेकिन सभी घोटाले उत्तराखण्ड सरकारों ने ऐसी कब्रगाह में दफन करके रख दिये जिन्हें आज तक कोई भी सरकार निकाल नहीं पाई। वहीं अब एनएच-74 के घोटाले पर केन्द्र सरकार व उत्तराखण्ड सरकार के बीच शह-मात का खेल शुरू हो गया है। केन्द्रीय परिवहन मंत्री ने घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपे जाने के लिए पत्र लिखने पर उत्तराखण्ड सरकार को कटघरे में खडा करते हुए मामले की जांच राज्य की एजेंसी से ही कराने की हुंकार लगाई है और यहां तक चेताया है कि अगर ऐसा न हुआ तो उन्हें उत्तराखण्ड के बारे में सोचना पडेगा? केन्द्रीय परिवहन मंत्री की इस ललकार से कहीं न कहीं उत्तराखण्ड सरकार की अनुभवहीनता सामने आ गई है? अब त्रिवेन्द्र सरकार के लिए एनएच-74 घोटाला गले की फंास बन गया है और अगर उसने इस मामले से अपने हाथ पीछे खींचे तो उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस के किये गये वायदों की आवाम के सामने हवा निकल जायेगी? आशंकायें हैं कि उत्तराखण्ड सरकार परिवहन मंत्री के अल्टीमेटम वाले पत्र की छाया से भी घबराई हुई है और वह इस घोटाले को भी किसी कब्रगाह में दफन करने के लिए अपना कोई नया पैतरा भी चल सकती है?
उत्तराखण्ड में हुए एनएच-74 घोटाले में जब कुमांऊ कमीशनर ने अपनी जांच को आगे बढ़ाया तो सौ करोड़ से ज्यादा का घोटाला सामने आया तो सरकार ने चंद अफसरों को निलम्बित करने के बाद आनन-फानन में इस मामले की जांच सीबीआई से कराने का ऐलान कर दिया था। ऐसे में सवाल खडे हो रहे हैं कि आखिरकार सीएम के सलाहकार क्या ऐसी सलाह दे रहे हैं जिससे त्रिवेन्द्र रावत हाईकमान के सामने अनुभवहीन साबित हो सके? अगर सलाहकारों को सलाह देनी थी तो केदारनाथ के रिडवल्पमेंट में हुए हजारों करोड के घोटाले की जांच सीबीआई से कराने की हरी झण्डी दिलानी चाहिए थी लेकिन जल्दबाजी में एनएच-74 की जांच सीबीआई से कराने का खत लिखवा दिया जिसमें सारे गुनाहगार उत्तराखण्ड के ही हैं?
उल्लेखनीय है कि वक्त से पहले ही त्रिवेंद्र सरकार के दावों की पोल खुलने लगी है। सुशासन की कलई तो पहले दिन से खुल रही थी , अब भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टालरेंस’ का दावा भी दम तोड़ता नजर आने लगा है। बीते दो महीने में सरकार ने जो एकमात्र दमदार एक्शन लिया, उसकी भी केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गड़करी ने हवा निकाल दी है। बता दें कि लगभग तीन सौ करोड़ रुपये के एनएच-74 घोटाले में त्रिवेंद्र सरकार ने छह पीसीएस अफसरों को निलम्बित कर सीबीआई से जांच की सिफारिश की थी। इसके बाद से प्रदेश के कुछ सफेदपोशों और दर्जनों अधिकारियों की सांसें अटकी हुई हैं। दरअसल हाईकोर्ट के आदेश पर हुई कुमाऊं कमिश्नर की जांच में एनएच-74 व एनएच-125 के चौड़ीकरण में बड़े खेल का खुलासा हुआ। शुरूआत में तो यह मामूली अनियमितताओं ओर हेराफेरी का मामला माना जा रहा था, लेकिन जैसे-जैस जांच बढ़ती रही तो परत दर परत यह घोटाला भी बढ़ता चला गया। पहले सौ, फिर सवा सौ और फिर दो सौ करोड़ का आंकड़ा पार कर अब अनुमान तीन सौ करोड़ रुपये से भी ऊपर जा पहुंचा। दरअसल घोटाला मुआवजे की रकम का है। एनएच चौड़ीकरण में जो भूमि अधिग्रहित हुई, उसमें कृषि भूमि को अकृषि व व्यवसायिक आदि दिखाकर कई गुना अधिक मुआवजे का भुगतान लिया गया। इसके लिए बड़े पैमाने पर सरकारी अभिलेखों में हेराफेरी की गई, राजस्व रिकार्ड बैक डेट में बदले गए। जाहिर है पटवारी से लेकर कलेक्टर तक की मिलीभगत और बिना राजनैतिक संरक्षण के यह संभव नहीं रहा होगा। भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टालरेंस’ का दावा करने वाली त्रिवेंद्र सरकार के लिए पहले ही ‘पायदान’ पर यह मामला लिटमस टेस्ट की तरह था, सो सरकार ने आधा दर्जन पीसीएस अफसरों को सस्पेंड किया और सीबीआई जांच की सिफारिश की थी लेकिन चर्चा है कि पांच अप्रैल को केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने उत्तराखण्ड सरकार को पत्र लिखकर कहा कि यह पूरा मामला उत्तराखण्ड से जुडा हुआ है और वह इसकी अपनी एजेंसी से जांच करायें क्योंकि उत्तराखण्ड में एनएच को बहुत काम करने हैं ऐसे में सीबीआई जांच से उनका मनोबल टूटेगा इसलिए वह इस मामले की जांच अपनी सरकारी एजेंसी से करायें अन्यथा उन्हें उत्तराखण्ड के बारे में सोचना पडेगा? नितिन गडकरी का खत में उत्तराखण्ड के बारे में सोचने का शब्द लिखना त्रिवेन्द्र सरकार के लिए खतरे की घंटी है? चर्चाएं हैं कि इस मामले में जो भी घोटाला हुआ है उसके तार राज्य के कुछ अफसरों व सफेदपोशों से जुडे हुए हैं और अगर त्रिवेन्द्र सरकार ने इस घोटाले की जांच अपनी सरकारी एजेंसी से कराने का भी दम भरा तो यह तय है कि कुछ सफेदपोश व चंद बडे अफसर भी बेनकाब हो सकते हैं ऐसे में त्रिवेन्द्र सरकार के लिए एनएच-74 का घोटाला उनके गले की फांस बन गया है? आशंकायें यह भी उठ रही है कि जैसे उत्तराखण्ड मंे पिछले 16 सालों से घोटाले और भ्रष्टाचार की गूंज तो बहुत गूंजी लेकिन राजधानी निर्माण में हुए हजारों करोड के घोटाले से लेकर बडे-बडे घोटाले सरकार की फाइलों में दफन होकर रह गये और अब एनएच-74 का घोटाला भी अगर कब्रगाह में दफन हो गया तो इसमें कोई आश्चर्य वाली बात नहीं होगी।

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