सरकार के नाक-कान फेल!

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आतंक-माओवाद पर खुफिया एजेंसियां धड़ाम
देहरादून। उत्तराखण्ड में सरकार के नाक-कान माने जाने वाली खुफिया एजेंसियांे का काम सिर्फ राजनेताओं की गतिविधियों पर केन्द्रित होकर रह गया है और उनका आतंकवाद व माओवाद पर नजर रखने का जज्बा वर्षों से ही चारो खाने चित हो चुका है ऐसे में खुफिया विभाग की लम्बीचौडी फौज पर सरकार हर माह लाखों रूपये क्यों खर्च कर रही है यह समझ से परे है। खुफिया एजेंसियां सिर्फ चंद बंग्लादेशियों व बिना वीजा के रह रहे चंद विदेशियों को पकडकर ही अपने आपको बलवान समझने में लगी हुई है। उत्तराखण्ड में अगर खुफिया एजेंसियों का मिशन आतंकवाद व माओवाद पर नकेल लगाने का होता तो बार-बार माओवादी सरकार व पुलिस महकमें को खुली चुनौती देने के लिए आगे नहीं आते। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब राज्य की खुफिया एजेंसियों का नेटवर्क ही धडाम हो रखा है तो वह आतंकवाद पर नकेल लगाने के लिए किस रणनीति के तहत काम कर रही होगी इसका अंदाजा अपने आप लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर कहा जाये तो उत्तराखण्ड में सरकार के नाक-कान फेल ही दिखाई दे रहे हैं जिससे माओवादियों के हौसले रात-दिन बुलंद होते जा रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड में खुफिया एजेंसियों का नेटवर्क तो लम्बा चौडा बना हुआ है और खुफिया एजेंसियों का एक कार्यालय तो इतना हाईटेक बनाया गया है कि वहां किसी को भी अन्दर जाने से पहले सुरक्षा का घेरा पार करना पडता है। खुफिया एजेंसियों का नेटवर्क आतंकवाद व माओवाद को लेकर ही फेल नहीं हो रहा बल्कि दर्जनों बार सरकार के खिलाफ बगावत करने वालों के बारे में भी प्रदेश की खुफिया एजेंसियों को भनक तक नहीं लग पाई थी जिसके चलते चंद पूर्व मुख्यमंत्रियों को अपनी कुर्सी तक गवानी पड गई थी और उसके बाद से ही सवाल उठ रहे थे कि आखिरकार खुफिया की लम्बी चौडी फौज को राज्य में किस बात के लिए तैनात किया गया है? खुफिया के चंद कर्मचारियों को राजनीतिक हालात पर नजर रखने के लिए तैनात किया जाता है और वह इस बात का पता लगाने में जुटे रहते हैं कि कहीं सरकार के खिलाफ विरोधी या पार्टी के लोग बगावत का झण्डा तो नहीं उठा रहे लेकिन उत्तराखण्ड के तीन-तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के खिलाफ पार्टी के ही लोगों ने बगावत की लेकिन खुफिया एजेंसियों को इसकी भनक तक नहीं लग पाई थी वहीं जब कांग्रेस के कद्दावर नेता सतपाल महाराज ने भाजपा का दामन थामा था तब भी खुफिया एजेंसियों का नेटवर्क फेल हो गया था। सरकार ने कभी भी खुफिया एजेंसियों केा इस बात के लिए कटघरे में खडा नहीं किया कि कैसे उन्हें इस बात का इल्म नहीं हो पाता कि सरकार के खिलाफ कौन-कौन राजनेता बगावत का झण्डा उठाये हुए है। उत्तराखण्ड में त्रिवेन्द्र सरकार ने जब से पदभार संभाला है तब से पार्टी के ही कुछ नेता सरकार के मुखिया के खिलाफ पर्दे के पीछे रहकर अपना गेम प्लान तैयार करने में लगे हैं लेकिन खुफिया एजेंसियां शायद अभी इस खतरे को नहीं भाप पा रही है और वह पूर्व की भांति अपने कामकाज को अंजाम देने में लगी हुई है। उत्तराखण्ड में आतंकवाद व माओवाद का खतरा हमेशा सिर पर खडा रहता है लेकिन खुफिया एजेंसियां इनके नेटवर्क को भेदने के बजाए खमोशी से अपने दूसरे मिशन मंे लगी रहती है जिससे माओवादियों ने एक बार फिर राज्य में सिर उठाना शुरू कर दिया है।

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