फिर दहाडे माओवादी

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देहरादून/अल्मोड़ा। उत्तराखण्ड सरकार के मुखिया ने डीजीपी व खुफिया विभाग के चीफ को माओवादियों पर नकेल लगाने व उनके खिलाफ ऑपरेशन चलाने का फरमान जारी किया था जिसके बाद डीजीपी ने हुंकार लगाई थी कि माओवादियों के खिलाफ राजस्व इलाकों में भी सर्च ऑपरेशन चलाया जायेगा वहीं पुलिस अफसरों ने पहाडों के चंद जनपदों में पुलिस थाने खोलने का दावा किया। वहंी अल्मोडा में एक बार फिर माओवादियों ने सरकार के खिलाफ दहाड़ लगाई है और उन्होंने एक राजकीय इंटर कालेज में सरकार के खिलाफ पोस्टर लगाते हुए दावा किया है कि वे नेपाल से नहीं आये हैं और यहीं के है तथा उत्तराखण्ड को नशामुक्त राज्य बनाने के लिए संघर्ष करते रहेंगे।
प्रदेश में जिस तेजी के साथ एक के बाद एक वारदात को अंजाम दे माओवादियों ने ये साफ कर दिया है कि उनमें कानून का कितना डर है? अगर धरातल की बात करे तो वो बता रही है कि माओवादी किस तरह बेलगाम हो चुके है और वो जहां भी चाहते है वहां पर लाल फतवें को जारी कर देते है लेकिन शासन प्रशासन किसी को भी कानों कान भनक तक नहीं पाती है और ये इस छोटे से प्रदेश के लिये शुभ सकेंत नहीं है। जिस तरह से छत्तीसगढ़ राज्य के सुकमा में हुये हमले में 24 जवान शहीद हो गये थे और पूरे देश में इसके खिलाफ गुस्सा देखा गया तथा सुरक्षा दावों पर कई सवाल खड़े हुये तो क्या उत्तराखण्ड़ में भी क्या सुकमा टू के इंतजार में बैठा है खुफियां तंत्र या शासन प्रशासन? माओवादी बेलगाम होके कुमाउ में एक के बाद एक वारदात को अंजाम दे गायब हो जाते है और किसी को कानों कान भनक भी नहीं लग पाती है। आज जिस तरह से माओवादियों में पोस्टर चस्पा कर ये ऐलान कर दिया कि वो नेपाल के नहीं यहां के है और अपनी बात को रखा है अगर जल्द ही इन पर लगाम नहीं लगी तो इसके परिणाम बेहद ही घातक हो सकते है? कुछ माह पूर्व ही प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुये है और चुनावों के समय जिस बुलन्द आवाज में भाजपा के नेताओं ने सुशासन और अपराध मुक्त वातावरण का नारा दिया और बहुत लम्बी लम्बी बाते कहीं थी उन बातों में कितना दम है और आवाम को कितना बेखौफ माहौल मिल रहा है इस बात को जनपद अल्मोड़ा में एक के बाद एक माओवादियों की दस्तक अपने आप ही ब्यान कर रही है और जिस तरह से वो जनता को विद्रोह की राह पर ले जाने का कार्य करने में लगे हुये है अगर जल्द ही सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो कही ऐसा न हो जाये कि इतनी देरी हो जाये कि जनता माओवादियों के कहने पर चलने लगे और मामला हद से आगे निकाल जाये? ऐसा नहीं है कि ये कोई पहली बार माओवादियों ने अंगारे उगले हो, अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटेंगे तो इस बात का इल्म हो जायेंगा कि माओवादियों के हौसले कितने बुलन्द है और सुरक्षा की बाते करने वालो नौकरशाहों के दावों में कितना दम है, माओवादियों की दबंगता का तो उसी समय ऐहसास पूरे प्रदेश को हो गया था जब उन्होंने एक सरकारी वाहन को आग के हवाले कर दिया था ओर सरकार विरोधी नारो के लाल फतवे जारी किये थे, उससे पहले भी वो पहाड़ की वादियों में अपना जहर फैला चुके है और कई बार जनता को विद्रोह की राह पर चलने की हुंकार भर चुके है लेकिन आज तक खुफियां तंत्र से लेकर कोई भी नौकरशाह इनतक नहीं पहुंच सका है और इनके हौसले आये दिन आसमां छुते जा रहे है और जनता को खौफ के माहौल में जीने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

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