शालीनता भूलते जा रहे भारतीय युवा!

0
169

ऋषिकेश अमित सूरी-कव्वा चला हंस की चाल।जी हाँ फैशन की चकाचौंध के बीच मोजूदा दौर की युवा पीढी ग्लैमरस लुक की चाह मे भारतीय संस्कृति की तिलांजलि देने पर तुली हुई है।फेशन परेड हिप्पीनुमा लुक के पहनावे मे भी साफ झलकती हुई महसूस की जा सकती है।इस मामले मे युवतिंया युवको पर भी भारी पड़ती नजर आ रही हैं।
पूरब और पश्चिम की संस्कृति कई दशको से एक दूसरे की पूरक रही हैं।देश की नोजवान पीढी पर जहाँ पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने की होड़ मची हुई है वहीं दूसरी और समूची दुनिया को महान भारतीय संस्कृति इस कदर आर्कषित कर रही है कि वह यही के रंग मे पूरी तरह से रम जाना चाहते है।इस हाईटेक युग मे देश के युवाओ के बीच यूरोप की संस्कृति तेजी से हावी होती जा रही है।देश की अनेको मेट्रो सिटीज मे लिव इन रिलेशनशिप से मामले लम्बे अर्से तक अखबरो की सुर्खियां बटोरने के बाद जहाँ अब सामानय सी बात होकर रह गये हैं वहीं पाश्चात्य रंगो की चासनी मे अजीबो गरीब परिधानो के जरिए अपना स्वछंद अंदाज दिखाकर अपने फ्रेंडस सक्रिल मे छा जाने की के लिए युवाओ की फेशन परेड लगातार तेजी से जारी रहकर समाज को झकझोरने मे लगी हुई है।विडम्बना देखिए सात समुन्दर पार से आये विदेशी सैलानी भारतीय संस्कृति से अभिभुत होकर योग,दर्शन शास्त्र ,वेद,उपनिषेद का पाठ पड़कर भारतीय संस्कृति के आगे नतमस्तक नजर आ रहे हैं वहीं देश की नोजवान पीढी अपने ही संस्कृति और संस्कारों को पेरों तले रोंदने पर तुली हुई है।तीर्थ नगरी की बात करें तो फेशन परेड मे यहाँ का युवा वर्ग पर भी महानगरों की आबोहवा का असर दिखाई देने लगा है ,जबकि रोचक तथ्य यह है कि अनेको विदेशी बालाओं ने पिछले कुछ वर्षो मे भारतीय संस्कृति को ही नही अपनाया बल्कि अपने जीवन साथी के रूप मे भी परम्पराओ की रुड़ियो को तोड़ते हुए जीवन साथी के रूप मे भी भारतीय युवको संग विवाह रचाकर नव जीवन की शुरूवात की है।वैदिक रीतियों सहित यहाँ के युवाओ को चुनकर अपने नवजीवन के सपने बुनने मे रुचि दिखाई हैं।यह तमाम शादियाँ कामयाब भी रही है।जबकि शुरूवात मे गोरी बहू को देखकर परिवार वालों की त्योरिंया चड़ी हुई थी।इन सबके बीच वैदिक मंत्रोचारण और गंगा के सानिध्य तले विदेशी युवा भी भारतीय परम्पराओ के अनुसार अग्नि के सात फेरे लेकर विवाह सूत्र मे बंधते रहे हैं।बेहराल भारतीय युवाओ पर हावी होती पश्चमी सभ्यता और विदेशियो द्वारा अपनाई जा रही भारतीय संस्कृति ने वर्ष 1970 मे मनोज कुमार द्वारा निर्देशित पूरब और पश्चिम फिल्म की पटकथा को सही मायनों समाज के भीतर चरितार्थ कर रखा है।

LEAVE A REPLY