उत्तराखण्ड मे “पलायन ” का दर्द झेलने को विवश हैं युवा

0
241

ऋषिकेश अमित सूरी-पलायन उत्तराखण्ड के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रो तक ही सीमित नही है बल्कि धार्मिक एवं पयॆटन नगरी ऋषिकेश का युवा भी यहां ओधोगिक इकाईयों के ठप्प होने की वजह है लगातार पलायन का दर्द झेल रहा है।
देश आजादी के सत्तर सालो का वक्त गुजर जाने के बावजूद ओधोगिक इकाईयों के नाम पर ऋषिकेश की झोली बस खाली की खाली ही है ।दिलचस्प बात यह है कि उत्तराखण्ड आन्दोलन के दोरान कयास लगाये जाते थे कि नवोदित राज्य का गठन हुआ तो निश्चिततोर पर देवभूमि के दिन बहुरेगें ओर अनेकों ओधोगिक ईकाइयां यहां स्थापित होंगी ।लेकिन राज्य गठन के 17 वर्ष पूणॆ होने के बावजूद ओधोगिक इकाईयों के नाम पर संत नगरी वनवास झेल रही है ।कहावत है पहाड़ का पानी ओर पहाड़ की जवानी कही पहाड़ के काम नही आते।यह कहावत तीर्थ नगरी पर भी सटीक बेठती है ।यहां गंगा मैली, दूषित ओर प्रदूषित हो ही चुकी है तो वही दूसरी ओर उधोग धंधे भी सिमट चुके हैं ।यहां यह भी बताना लाजमी है कि कुछ वर्षो पूर्व तक ऋषिकेश से सटे ढालवाला क्षेत्र को ओधोगिक इकाईयों के लिए पहचाना जाता था।लेकिन धीरे -धीरे वो तमाम ओधोगिक ईकाईयां जो ढालवाला की शान होती थी दम तोड़ गई ।इससे पूर्व नब्बे के दशक में आई डी पी एल फैक्ट्री पहले ही डायलिसिस पर जा चुकी थी जोकि अब पूरी तरह से ही केन्द्र सरकार द्वारा बंद करा दी गई है।इन सबके बीच एम्स निमाणॆ पर ही स्थानीय युवाओं की नजरें टिकी थी लेकिन देश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान में भी रोजगार की संजीवनी से युवा महरूम रह गये।मोजूदा हालात में सिमटते कारोबार के बीच किसी नई ओधोगिक इकाई के स्थापित होने की कोई सभांवना फिलहाल तो नजर नहीं आ रही ऐसे में यहां भी पलायन को थाम पाना चुनौतीपूणॆ जरूर नजर आ रहा है ।ऐसे मे निगाहे पूरी तरह से त्रिवेन्द्र रावत सरकार पर हैं।आने वाले समय मे उत्तराखण्ड की डबल इंजन वाली सरकार किसी नये विजन के साथ यहाँ रोजगार के नये संसाधन जुटा पाने मे कोई ऐतिहासिक पहल करती है या फिर उत्तराखण्ड की पूर्व सरकारो की तरह ही टी एस रावत सरकार भी इस मामले मे लकीर की फकीर साबित होती है यह फिलहाल अभी भविष्य के गर्भ मे है।

LEAVE A REPLY