अस्पताल है या कसाई खाना?

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कपिल मल्होत्रा
अल्मोड़ा- महिला सशक्तिकरण की बात आज देश में हर जगह हो रही है महिलाओं को घर का मुखिया भी सरकार ने बनाया हैं। सरकार ने राशन कार्ड में भी अब मुखिया महिलाओं को बनाया गया है। अल्मोड़ा में एक मात्र महिला चिकित्सालय होने के बाद भी नगर में गर्भवती महिलाओं को सुविधाए नहीं मिल पा रही है। अगर आप किसी को जानते है तो आपका काम हो पाएगा नहीं तो आपको प्राइवेट अस्पताल का पता खुद ही बता दिया जाएगा। अगर आप गरीब है तो फिर आपका कोई खैरख्वाह कोई नहीं। आठ माह तक आपको कुछ नहीं बताया जाएगा सब ठीक हैं कहाँ जाता हैं और नौवें माह में आपको इतना डराया जाएगा कि आप उनकी कही बात मानो या फिर उनके द्वारा बताए गए प्राइवेट अस्पताल में जाओ तो कुछ बात बन पाएगी। यही नहीं कुछ दिन पहले एक गांव से आई महिला का बच्चा तो हो गया पर उसे ब्लड के नाम पर बहुत डराया गया और तो यह तक कह दिया गया अगर ब्लड का इंतजाम नहीं कर सकते तो यहाँ से चले जाओ। क्या लोग सरकार को रक्त दान इस लिए करके देते है कि जरूरत मंद को भी ये दौड़ाते रहे ? क्या वो व्यक्ति जो रक्त दान करता है वह रक्त दान इसलिए करता है कि जरूरत मंद को भी ये लोग रक्त देनेे की जगह परेशान करें ? महिला अस्पताल में कार्य करने वालो की भाषा को सुनकर लगता है कि कही हम इन से कोई अहसान तो नहीं करवाने को कह रहे है या इनको इनके काम के हट कर तो कुछ नही करा दिया। इस अस्पताल से ज्यादा केस तो निजी अस्पताल में होते है। सरकार के लाखों रुपयों के बाद भी अल्मोड़ा में महिलाओं को कोई सुविधा नहीं मिलना यह भी एक नाकामी ही होगी। हर सरकार में अल्मोड़ा जनपद के नेता उच्च पदों पर होते हुए भी इस बारे में बस कोरी नीतियां ही बनी। आज भी यहाँ उचित सुविधा के नाम पर बस कागजों का पेट ही भरा जा रहा है। शर्म तब आती है जब कोई कार्यवाही होने लगे तो सब आंदोलन की धमकी देने लगते है। लाखों रुपये कमाने के बाद भी कोई जनता के हित की बात नहीं करता, बस बात होती है तो सुख सुविधाओं की। कहाँ चले जाते है जीतने के बाद वो लोग जो पहले तक इन मुद्दों पर रोज बोला करते थे। जो खुद भी भुक्त भोगी रहे होते है। क्या हो जाता है सत्ता में आते ही? इन सब लोगों को वो चाहे कांग्रेस के लोग हो या फिर बीजेपी सब को सांप क्यों सूंघ जाता है। क्या उस मातृ शक्ति के लिए कोई अधिकार नहीं है किसी का? क्यों नहीं सरकार अपने मानकों और अपने सभी संस्थानों को एक करके उस गरीब एक जगह ही सब मुहैया करा देती? जब लोग बिना किसी स्वार्थ के रक्त दान करते है तो फिर उस समय क्यों परेशान किया जाता है जब दूर से आए लाचार मरीज को उसकी जरूरात होती हैं? सरकार द्वारा कई योजनाओं की शुरुआत तो की गया है पर इनके लिए यहां जनता को इतना नचाया जाता है कि थक के वो मना ही कर देना है। आखिर ये जाना जरूरी है कि ब्लेड बैंक तो अल्मोड़ा में एक ही सरकारी है, पर सरकारी अस्पताल में मरीज को रक्त के लिए लगातार दौड़ाया जाता पर प्राइवेट अस्पताल में जा के क्या होता है कि वो सब अपने आप कहाँ से कर लेते है? लोगों द्वारा दिया गया रक्त कही बाजार में बिकता तो नही हैं जो सरकारी अस्पताल में रोज रक्त दान के बाद भी रक्त की कमी रहती है? तो रक्त कहाँ जाता हैं इसका भी खुलासा जरूरी हो जाता हैं।

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