उत्तराखण्ड की नदियों को खतरा

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देहरादून। उत्तराखण्ड के पहाड़ों से निकलने वाली छोटी बड़ी नदियां आज जिस तेजी के साथ सूखने लगी है, वह पहाड़ पर एक बड़ा ग्रहण लगाती हुई दिखाई दे रही है। नदियों का लगातार सूखना उत्तराखण्ड वासियों के लिए शुभ संकेत नहीं है। अगर इसी तेजी से पहाड़ की नदियां सूखती रही तो वहां के लोगों को पानी के एक बड़े आकाल का सामना करना पड़ सकता है। ऐसा नहीं है कि उत्तराखण्ड की नदियों के सूखने की समस्या एक दिन में पैदा हुई हो बल्कि लंबे समय से पर्यावरण में हो रहे बदलाव के चलते तेजी के साथ पहाड़ में कुछ नदियां सूखती जा रही है। ग्लोबल वार्मिंग के कहर से शायद उत्तराखण्ड भी अब अछूता नहीं रहा जिसके कारण यहां की नदियों का सूखना निरंतर जारी है। एक अनुमान के अनुसार उत्तराखण्ड की लगभग दो दर्जन नदियां सूख चुकी है। इन नदियों के सूखने से इनके अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा गया है।

जी हां जो उत्तराखंड के पहाड़ो और यहाँ की जीवनदायनी नदिया है वो सुख रही है तेज़ी से सूखने वाली नदियों की संख्या एक दो नहीं बल्कि दो दर्जन से ज्यदा है |उत्तराखंड में नदियां लगातार सूखती जा रही हैं। पर्यावरणीय असंतुलन एसा है कि एक दशक में नदियों में पानी का जल स्तर सिर्फ 10 फीसदी रह गया है। अकेले देहरादून की ही 8 नदियां सूख चुकी हैं। आने वाले समय में अगर इसी रफतार से नदियों के जल स्तर में कमी आती जायेगी तो एक दिन पहाड़ में पीने के पानी का संकट पैदा हो जायेगा।

पहाड़ों की खूबसूरती पर नदियां चार चांद लगा देती हैं। पहाड़ में प्रकृृति ने अपना खजाना खोला हुआ है। इस खूबसूरती को निहारने और इस शुद्ध वातावरण को महसूस करने के लिए लोग उत्तराखंड के पहाड़ों मंे आते हैं। लेकिन अब इन खूबसूरत पहाड़ों और घाटियों के बीच बहने वाली नदियांे पर नजर लग गई है। नदियां सूख रही है। जिन नदियों के बहने से पहाड़ की खूबसूरती बढ़ती थी वही सूखी नदियां पहाड़ पर एक धब्बे जैसी नजर आ रही है।

उत्तराखंड की करीब 20 नदियां में जल स्तर सिर्फ 10 फीसदी ही रह गया है। कई नदियां तो पूरी तरह सूख चुकी हैं। कई नदियां बरसाती नालों में बदल चुकी है। विशेषज्ञों ने उत्तराखंड की नदियों पर जो रिसर्च की है उनके परिणाम बहुत भयानक दिखाई दे रहे हैं। अकेले देहरादून जिले की ही 8 नदियां सूख चुकी हैं।

इनमें से भितरली, रिस्पना, कालीगाड़, खेतू, सौंग, बिंदाल, सवर्णा और मालडुंग नदी सूख चुकी हैं। इनमें से ज्यादातर नदियों में पानी सिर्फ बरसात के मौसम में ही आता है। वो भी शहर भर की गंदगी को हरिद्वार में मां गंगा तक पंहुचाने का ही काम करती है।

मां गंगा की पवित्र जल धारा है।गंगा की जल धारा में आंचमन करने, आस्था की डुबकी लगाने देश और दुनिया से लाखों श्रद्धालु आते हैं। लेकिन किसी को नहीं पता कि जिन स्थानीय नदियों का अस्तित्व खत्म हो रहा है वो जल धारायें भी गंगा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। एसे ही अगर नदियां सूखती रही तो एक दिन मां गंगा की इस जल धारा को सूखने में भी समय नहीं लगेगा।

उत्तराखंड की नदियों के सूखने की समस्या एक दिन में ही पैदा नहीं हुई। इसके पीछे लंबे समय से पर्यावरण में हो रहे बदलाव एक बड़ा कारण हैं। जानकारों और वैज्ञानिकों की माने तो नदियों में पानी दो कारणों से आता है। पहला ग्लेशियरों के पिघलने से और दूसरा बारिश से। लेकिन वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में पाया है कि ग्लेशियरों में जो बर्फ गिरा करती है उसकी मात्रा में कमी आई है। पहले जो ग्लेशियर बर्फ से लकदक रहा करते थो वो गर्मी के कारण पिघल रहे हैं। इस कारण ग्लेशियर से नदियों में आने वाले पानी की मात्रा में कमी आ रही है। एक बात और सामने आई है कि पहले ग्लेशियरों में सिर्फ बर्फ गिरा करती थी लेकिन अब वंहा पर बर्फ के बजाय बारिश गिर रही है। इसलिए ग्लेशियरों से एक साथ पानी नदियों में आ जाता है। जबकि बर्फ पिघलने के कारण साल भर नदियों में पानी की पूर्ती सीधे तरीके से प्रभावित हो रही है। दूसरा कारण है की बारिश का नदियों में पानी आता है। लेकिन देखने में आ रहा है कि साल भर होने वाली बारिश की मात्रा तो लगभग उतनी ही है। हां बारिश के ट्रेंड में बदलाव जरुर हो गया है। अब कम समय में ज्यादा पानी बरसने से वो बह जाता है और जमीन के भीतर नहीं जा पा रहा है।

वैज्ञानिकों राजेन्द्र डोभाल की माने तो इस दिशा में अब लंबी बहस चल रही है। दुनिया भर में रिसर्च हो रही है। कौन से ग्लेशियर और कौन सी नदी का पानी कहां जा रहा है। उस पर रिसर्च का दायरा बड़ गया है। अब वैज्ञानिकों ने ये पता करने में महारत हासिल कर ली है कि किसी ग्लेशियर और नदी का पानी यदी कहीं गायब हो रहा है। और किसी दूसरी जगह पर वो पानी मिल रहा है तो पता चल जाता है कि इस पानी का सोर्स कहंा पर है।

पहले जो बारिश थोड़ी थोड़ी होती थी तो पानी रिसकर जमीन के नीचे जाता था। ग्राउंड वॉटर लेवल बढ़ता था। यही पानी कहीं न कहीं नदियों में पानी की कमी को पूरा करता था। लेकिन अब कम समय में एक साथ ज्यादा बारिश होने से रिसकर जमीन के भीतर जाने वाली प्रक्रिया बाधित हुई है।

सवाल है कि आखिरकार राज्य की सूख रही नदियों पर सरकार कब बड़ा चिंतन करेगी और उन्हें एक बार फिर पानी से लकदक करने की दिशा में वैज्ञानिकों के साथ मिलकर कोई बड़ी योजना तैयार करेगी, जिससे कि पहाड़ों की खूबसूरती में लग रहे ग्रहण पर विराम लगाया जा सके। उत्तराखण्ड की पहचान ही लहलहाती नदियों से है और अगर इनके सूखने का सिलसिला इसी तेजी से चलता रहा तो उत्तराखण्ड के लिए यह काफी घातक हो सकता है।

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