सरकारी गाड़ियों पर कब लगेगी लगाम?

0
166

इतिहास में बताया गया है कि चाणक्य जब सरकारी कार्य करता था तो बत्ती जलाता था और जब घर का कार्य करता था तो उसे वंद कर देता था।लेकिन यह इतिहास की बात है।आज उत्तराखंड के मंत्री सरकारी कर्मचारी और अधिकारी नया इतिहास बना रहे है।राजकीय वाहनों का निजी कार्यो में उपयोग कर रहे है।परिवार सहित सैर सपाटा करते दिखाई देते है। फर्जी बिल बना फर्जी यात्रा दिखा करोडो रुपये का चुना राज्य को लगा रहे है।ऐसा कहे की सरकारी वाहनों का जमकर दुरपयोग कर रहे है।
लालबत्ती लगाने पर तो अब बिराम लगता दिखाई दे रहा है लेकिन अफसर नेतावो की इस ब्यवस्था पर भी बिराम लगाया जाना जरुरी है।भय भूख और भ्रस्टाचार के खात्मे का संकल्प के साथ राज्य में त्रिबेन्द्र रावत के नेतृत्व में नई सरकार का आगाज हुवा है।अब देखना होगा की सरकार इस मामले जिसमे अकेले राज्य को लाखो का चूना निजी कार्यो में सरकारी वाहनों का प्रयोग कर जो पीछे के दरवाजो से हर माह लग रहा है ।इसे रोकने में कितनी कामयाब हो पाती है या फिर पूर्ब की भांति बदस्तूर यह ब्यवस्था जारी रहेगी।

एक गाड़ी एक अधिकारी मंत्री

वीआइपी कल्चरल ख़त्म करने को लेकर केंद्र सरकार के फैसले के बाद गाडियो में लगने वाली लालबत्ती तो अब एक मई से नहीं दिखेगी।लेकिन आवाज तेज हो गई है कि एक और ब्यवस्था जिसमे “एक अफसर” एक गाड़ी “एक मंत्री”एक गाड़ी को भी किया जाना जरुरी है। क्योकि आये दिनों देखा गया है कि अफसर के बिना ही सरकारी वाहन इनके बच्चों और पत्नियो को लेकर सड़को पर दौड़ती रहती है।क्या यह गाड़ियां इनको निजी कार्यो के लिए लिए दी गई है ? जिसपर अंकुश लगाना पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में बहुत आवश्यक है।

अफसर एक गाड़ी अनेक क्यों

इस परिपाटी के पनपने का कारण अनेक है लेकिन कुछ समय से ऐसी एक ब्यवस्था बन गई है जिसमे अधिकारी मंत्री के पास कई कई बिभाग होते है और हर बिभाग से अलग अलग गाड़ी भी ले ली जाती है। जबकि वह ब्यक्ति एक है बिभाग भी उनको इस फायदे से बंचित नहीं रखना चाहते। साहब के एक आदेश पर नियमो की परवाह किये बिना खुश करने के उद्देश्य से सरकारी वाहन को बेवजह इनके घरो में बाल बच्चों को घुमाने फिराने के लिए खड़ी करवा देते है। तेल से लेकर ड्राइबर तक बिभागो की जिम्मेदारी होती है।खामियाजा बित्तीय भार के साथ राज्य को उठाना पड़ता है।इस गलत ब्यवस्था के कारण हर महीने ख़जाने को लाखो रुपये अतरिक्त चपत लगती है। हैरानी यह है सरकारी गाड़िया तो ठीक बहार से महंगी दरो पर गाड़ियां लेकर साहब की चाटुकारिता की जाती है।उत्तराखंड में कई अधिकारी ऐसे है भी है जो सिर्फ सरकारी कार्य के लिए ही वाहन लेते है निजी कार्यो में कभी भी सरकारी वाहनों का प्रयोग भी नहीं करते। लेकिन शासन और बिभागो के सूत्र बताते है की अधिकांश अधिकारियो मंत्री ऐसे भी है जो की कुत्ते से लेकर बिल्ली तक सरकारी वाहनों में घुमाकर अपनी शान समझते है।यह सब जानने के बाद भी कोई बोलने से हिम्मत नहीं जुटा पता। यही नहीं सरकारी वाहनों से पकडे जाने के खतरे से बाख़िब इन् अफसरों ने एक और नई तरकीब सरकारी धन को ठिकाने लगाने की निकाली है जो हैरान कर देने वाली है। जिस बिभाग का अतरिक्त चार्ज है उससे सरकारी नहीं प्राइवेट वाहन लिया जाता है। जिसका बिल भुगतान प्रति माह सरकारी खजाने से होता है ऐसी गाड़िया सभी अफसर मंत्रियो के घरो की शोभा बढ़ा रही होती है।और इनकी इस मिलीभगत के कारण लाखो का बित्तीय भर अतरिक्त राज्य पर पड़ता रहता है। ऐसा अधिकारियो मंत्री की जुगलबंदी से ही होना संभव है ।इस ब्यवस्था पर रोक लगनी जरुरी है।आये दिनों यह देखने को मिलता है की अफसर नेता की सरकारी गाड़ी किसी अफसर मंत्री की बीबी को घुमाती फिरती है। कभी साब के बच्चों को लाती है।इसे क्या कहेगे जब सरकारी वाहन बिना अफसर नेता के कभी सब्जी मंडी की दुकानों,रोज स्कूलों के गेट के आगे तो कभी किसी पिकनिक स्थल पर खड़े दिखाई देते है तो यही लगता है की इसमे कोई अधिकारी होगा। लेकिन ऐसा होता नहीं ।राज्य के अधिकाश अफसर नेताओ के बच्चों को इन्ही सरकारी वाहनों से ढोया जाता है।जबकि ऐसा नहीं किया जा सकता है।परंतु इनकी हनक ही है की देखने के बाद भी सभी की आँखे बंद रहती है।इस राज्य में यह नई परिपाटी चल पड़ी है की एक अफसर एक नेता के पास अनेक बिभाग होते है तो फिर ब्यवस्थाये भी उन्ही के हिसाब से ले ली जाती है।शासन के सूत्र बताते है की शासन के अला अफसर छोटा हो या बड़ा सभी के एक वाहन नहीं अनेक है जिस भी बिभाग का मुखिया चार्ज मिलता है सुबिधायें भी उसके जिम्मे उस बिभाग से अन्य ब्यवस्थाओ के आलावा गाड़ी मय ड्राइबर ले ली जाती है।

LEAVE A REPLY